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अनलॉक-1 । नोएडा-दिल्ली सीमा पर जाम।फ़ोटो साभार: ट्विटर/अक्षय

अनलॉक-1 : क्या सरकार ने कोरोना से हार मान ली है?

देश में जिस तेज़ी से मामले बढ़ रहे हैं, और अब जिस तरह से लोगों को घरों से निकलने की छूट मिल रही है, उससे कोरोना वायरस के नए मरीज़ों की संख्या में और तेज़ी आएगी और उसी हिसाब से गंभीर मरीज़ों की संख्या भी बढ़ेगी। इसी आशंका के बीच अब जब क़रीब हर रोज़ रिकॉर्ड पॉजिटिव मामले आ रहे हैं तो अनलॉक-1 की घोषणा क्यों की गई?
नीरेंद्र नागर

आज 1 जून से लॉकडाउन ख़त्म होने की उलटी गिनती शुरू हो रही है। सरकार ने इसे अनलॉक-1 का नाम दिया है जो 30 जून तक चलेगा। इस दौरान कनटेनमेंट ज़ोन यानी वे इलाक़े जहाँ पिछले 28 दिनों में कोविड-19 का एक भी मरीज़ मिला था और जहाँ अब भी बीमारी फैलने की आशंका है, उन इलाक़ों को छोड़कर बाक़ी सारे देश में लोगों को बिना पास या परमिशन के कहीं भी आने-जाने की छूट मिल गई है। कुछ बंदिशें अब भी रहेंगी लेकिन मोटे तौर पर अब हम अपने घरों में क़ैद रहने के लिए बाध्य नहीं हैं।

घरों से निकलने की छूट मिलना एक ख़ुशख़बरी होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कि हर आदमी इस ख़बर से ख़ुश है। अब भी ऐसे लाखों लोग हैं जिनको लगता है कि यह छूट ख़तरनाक हो सकती है, ख़ासकर तब जबकि हर रोज़ कोविड-19 के हज़ारों नए मरीज़ मिल रहे हैं। अगर ताज़ा आँकड़ा देखें तो कल ही क़रीब 9 हज़ार नए मरीज़ों की शिनाख़्त हुई जिनको मिलाकर देश में कोरोना के कुल मामले 1.90 लाख के आसपास पहुँच गए। ऐसे में अगर सरकार ने लोगों को बाहर निकलने की पूरी छूट दे दी तो क्या इससे कोरोना पीड़ितों की संख्या और तेज़ी से नहीं बढ़ेगी? क्या सरकार आने वाले दिनों में इतनी बड़ी संख्या में कोरोना मरीज़ों को सँभाल पाएगी, उनका इलाज करवा पाएगी? अगर नहीं तो क्यों वह लोगों को बेखटके निकलने की छूट दे रही है? क्या यह सच है जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि उद्योग जगत के दबाव में उसने कोरोना मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देने का फ़ैसला कर लिया है?

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ऐसे सवाल बहुत सारे लोगों के ज़ेहन में आ रहे हैं और हो सकता है, उनमें आप भी हों। अगर हैं तो आपकी आशंकाएँ बेबुनियाद नहीं हैं। कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी कोरोना के ख़िलाफ़ सरकारी रणनीति की शुरू से आलोचना कर रहे हैं और स्थिति के बेक़ाबू होने की आशंका जता रहे हैं। लेकिन क्या स्थिति इतनी ही विकट और भविष्य वैसा ही भयावह है जैसा कि उनको लग रहा है? क्या सरकार बिना सोचे-समझे फ़ैसले कर रही है? नीचे हम इसी की जाँच करेंगे।

1.90 लाख केस लेकिन गंभीर मामले कितने? 

ऊपर हमने कोरोना पीड़ितों की बढ़ती संख्या की बात की। आज की तारीख़ में यह आँकड़ा 1.90 लाख के आसपास है। लेकिन क्या आपने ध्यान दिया कि वह संख्या कोरोना मरीज़ों की नहीं है? यह कल तक भारत में कोरोना संक्रमण के जितने मामले मिले हैं, उन सबका टोटल है। यह आँकड़ा कहता है कि भारत में कल तक कोरोना के 1.90 लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी है। ध्यान दीजिए, 1.90 लाख की इस संख्या में सारे-के-सारे मरीज़ नहीं हैं; क्योंकि इनमें से क़रीब आधे - 91 हज़ार के आसपास -  तो ठीक होकर घर जा चुके हैं। यानी भले ही टीवी चैनल, अख़बार और वेबसाइटें ‘कोरोना मामले 2 लाख के क़रीब पहुँचे’ का शोर मचाकर आपको डरा रहे हों, आज की तारीख़ में वास्तविक मरीज़ों की संख्या उसकी आधी है यानी कुल 93 हज़ार।

आप कह सकते हैं, यह 93 हज़ार की संख्या भी कोई कम नहीं है। मानते हैं, परंतु क्या ये 93 हज़ार लोग अस्पतालों में दाख़िल हैं और अपनी मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं? आपमें से कई ऐसा ही सोचते होंगे। मगर यह सच नहीं है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा और शायद ख़ुशी भी कि इनमें से क़रीब 75 हज़ार लोग उतने ही स्वस्थ हैं जितने कि आप। हाँ, कुछ को हल्का-फुल्का ज़ुकाम हो सकता है। लेकिन वे सब कुछ ही दिनों में ठीक होने वाले हैं। मैं यह इसलिए कह पा रहा हूँ कि कोरोना के कुल पीड़ितों में से 80% ऐसे हैं जिनको या तो कोई लक्षण ही नहीं होते हैं या बहुत मामूली लक्षण होते हैं।

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18 हज़ार ही अस्पताल में भर्ती

अब बचे 18 हज़ार। ये वे बीमार हैं जो अस्पताल में भर्ती हैं, कुछ सामान्य बेड पर हैं, कुछ ऑक्सिजन पर, और कुछ आइसीयू में। इनमें से कितने मरीज़ों की हालत सीरियस है, इसका आँकड़ा मेरे पास नहीं है क्योंकि भारत सरकार इस तरह की दैनिक जानकारी अभी दे नहीं रही है। लेकिन यदि विश्व के मामलों के आधार पर अंदाज़ा लगाया जाए तो दुनिया में अभी कोरोना के जितने सक्रिय मामले हैं (क़रीब 31 लाख), उनमें से केवल 2% (53 हज़ार) गंभीर हालत में हैं। यदि भारत में भी गंभीर मरीज़ों की वही दर है जो दुनिया के बाक़ी देशों में है तो कल तक जो 93 हज़ार चिकित्साधीन मरीज़ थे भारत में, उनमें से कोई 1860 मरीज़ गंभीर हालत में होंगे। यानी इन 18 हज़ार में से भी जो फ़िलहाल अस्पताल में भर्ती होंगे, 16 हज़ार से ज़्यादा आज नहीं तो कल स्वस्थ होकर सकुशल घर पहुँचेंगे।

अब फिर से कल के आँकड़े पर नज़र दौड़ाएँ। एक तरफ़ है कोरोना के कुल मामले (यानी अब तक के सारे मरीज़ों की संख्या जिनमें ठीक हो चुके मरीज़ों की संख्या भी है)=1.90 लाख। दूसरी तरफ़ गंभीर मरीज़ों की संख्या=1860*। 

दूसरे शब्दों में सारे भारत में आज कोरोना वाइरस से पीड़ित लोगों में गंभीर हालत में केवल 1860* लोग हैं। क्या यह संख्या डराती है उस तरह जिस तरह 1.90 लाख की संख्या डराती है?

मैं जानता हूँ कि अभी बात ख़त्म नहीं हुई है। आप पूछ सकते हैं कि अभी गंभीर मरीज़ों की संख्या 2 हज़ार के पास है लेकिन जिस तेज़ी से मामले बढ़ रहे हैं, और अब जिस तरह से लोगों को घरों से निकलने की छूट मिल रही है, उससे नए मरीज़ों की संख्या में और तेज़ी आएगी और उसी हिसाब से गंभीर मरीज़ों की संख्या भी बढ़ेगी। ख़ुद सरकार कहती है कि अभी देश में कोरोना पीड़ितों के मामले हर 14 दिनों में डबल हो रहे हैं जो कि शुरुआत में 3 दिन में दुगुने हो रहे थे। सरकार को उम्मीद है कि डबल होने की रफ़्तार धीरे-धीरे लंबी होगी। लेकिन पिछले एक महीने के ट्रेंड से ऐसा होता दिख नहीं रहा। अगर यह रफ़्तार नहीं घटी और आने वाले दिनों में यह 14-15 के आसपास ही रही तो अगले ढाई से तीन महीनों में कोरोना पीड़ितों की संख्या 1.9>3.8>7.6>15.2>30.4>60.8>121.6 की स्पीड से 1.22 करोड़ के आसपास हो जाएगी।

1.22 करोड़ बहुत बड़ी संख्या है। देश की कुल आबादी के 1% से कुछ ही कम। क्या तब के लिए सरकार ने कोई रणनीति सोची है? या उसे लग रहा है कि कोरोना मामले इस हद तक कभी नहीं पहुँचेंगे? और यदि उसे ऐसा लग रहा है तो इसके पीछे क्या तर्क है? इसके बारे में हम चर्चा करेंगे अपनी अगली कड़ी में। 

*(ऊपर गंभीर मरीज़ों की संख्या विश्व औसत के आधार पर एक अंदाज़ा है। वास्तविक गंभीर मरीज़ों की संख्या कम-ज़्यादा भी हो सकती है।)

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