सांप्रदायिक ब्रेनवाशिंग, मीडिया का सांप्रदायिकीकरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दे रहे हैं। मुस्लिम-विरोधी नफ़रत की राजनीति और इस्लामोफ़ोबिया का असर कैसा हो रहा है, एक पत्रकार के निजी बदलाव के जरिए समाज में बढ़ती नफरत को समझिए।
वो एक आदर्शवादी युवक था। छोटे गाँव से निकलकर शहर में पत्रकारिता करने आया था। पहले-पहल उसके पास अपना कोई दोपहिया वाहन तक नहीं था- कभी किसी से साइकिल, किसी से स्कूटर लेकर वह शहर का चक्कर लगाता रहता। कुर्ता, पतलून, हवाई चप्पलों की पोशाक। संघर्ष के दिनों में एक हमउम्र मुसलमान लड़के के साथ वो रूम शेयर करके रहता था। वह ब्राह्मण था और उसके परिवार के लोग इससे सहज नहीं थे। तब वह अपने परिजनों का प्रतिकार करके कहता : "मुसलमान हुआ तो क्या? वो मेरा दोस्त है। मैं रोटियाँ सेंकता हूँ, वो सब्ज़ी तैयार करता है, हम मिल-जुलकर साथ रहते हैं।"
एक ईसाई लड़की के प्रति उसके मन में प्रेम की कोमल भावना भी थी। अपने हृदय की यह अंतरंग-कथा उसने केवल मुझ से ही साझा की थी।
एक बार एक वरिष्ठ अधिकारी पर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया, जिसे मीडिया-प्रबंधन करके दबा दिया गया। वह रोष से व्याकुल हो उठा। उसने रातोंरात पोस्टर छपवाए और पूरे शहर में चिपका दिए, इस अंदाज़ में कि सच की आवाज़ को दबाकर दिखाओ। उसके उस अभियान में मैंने भी उसका साथ दिया था। तब हम युवा थे। हमारे भीतर ईमानदारी की आग दहकती थी!
पत्रकार-वार्ताओं में जब भेंट-रुपय्या मिलता था तो हम उसे लौटा देते थे। कहते थे, "हम यहाँ रिपोर्टिंग करने आए हैं, तोहफ़ा-नज़राना लेने नहीं।" तब हम ख़ुद को भगत सिंह से कम नहीं समझते थे!
सेकुलरिज़्म से नफ़रत तक का सफर
फिर अभी बरसों बाद इधर वो मिला। पूरे बदले हुए रंग में। सत्ता की हर बेईमानी और भ्रष्टाचार में उसका समर्थक। कट्टर हिन्दू! सरकार की जय-जयकार करने वाला। बंगाल-परिणाम के बाद एक नेता को उसने 'आधुनिक-राम' कहकर सम्बोधित किया तो मुझसे रहा ना गया। मैंने उसे याद दिलाया, "क्या वो तुम ही थे, जिसने उस अफ़सर के खिलाफ़ रातोंरात शहर की दीवारों पर पोस्टर चस्पा कर दिए थे और मुझे भी अपने साथ खींच ले गए थे? लेकिन क्या अब ऐसे भ्रष्ट-तंत्र को देखकर तुम्हारा ख़ून नहीं खौलता, जिसने सबकी आवाज़ें दबा दी हैं, पत्रकारों की भी? संसाधनों की लूट और लोकतंत्र का ह्रास क्या तुम्हें उद्वेलित नहीं करता?"उसने मेरे इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया और इसके बजाय एक अलग ही राग अलापने लगा। कहने लगा, "ज़मीन पर रहता हूँ, ज़मीन को सूँघता हूँ, ज़मीन को जानता हूँ। तुम्हें हमारा राष्ट्रवाद स्वीकार नहीं तो हमें भी तुम्हारा 'बौद्धिक-मौलाना' (जी हाँ, उसने इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया था!) हो जाना स्वीकार नहीं। बंगाल में हमें अब जाकर आज़ादी मिली है, हिन्दू औरतें वहाँ पर विजय का उत्सव मना रही हैं।" मैंने उसे याद नहीं दिलाया कि एक मुसलमान के साथ परिजनों की इच्छा के विरुद्ध रहने वाले क्या तुम ही थे!
हिंदू होने की शर्त क्या?
मेरे मन में प्रश्न गूँजा कि क्या हिन्दू-जागरण की अनिवार्य शर्त झूठ, बेईमानी, फ़रेब, दमन और भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता है? क्या ऐसा सम्भव नहीं कि हिन्दू जाग्रत हो और सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता, सहिष्णुता और शुचिता का ध्वज भी देश में उसके साथ ही फहराए? क्या ये दोनों विपरीत मूल्य हैं? यह कोई छोटा-मोटा प्रश्न नहीं, वर्तमान दौर का सबसे बड़ा सवाल है।
भारत-देश में हिन्दू सुरक्षित रहें- हिन्दू क्या सभी नागरिक सुरक्षित रहें- उनके साथ न्याय हो और वो नि:संकोच अपने अधिकारों का पालन कर सकें- इसमें किसी को भला क्या आपत्ति होगी? साथ ही, आपराधिक तत्त्वों से निबटना क़ानून-व्यवस्था का काम है और रहे। किन्तु इसके लिए भ्रष्ट-तंत्र को स्वीकार करना क्या अनिवार्य शर्त है? यह सबसे बड़ा सवाल है।
मुस्लिम विरोधी नफरत क्यों?
वो अब एक शहर की बहुमंजिला इमारत में फ़्लैट लेकर रहता है। मुझे नहीं पता कौन-सी ज़मीनी हक़ीक़त के वो सम्पर्क में है। इतना ज़रूर मैं जानता हूँ कि आज तक किसी मुसलमान ने उसे खरोंच तक नहीं पहुँचाई है। इसके बावजूद एक हिन्दू के रूप में वह ग़ुस्से से भरा है। एक हिन्दू के रूप में उसका ग़ुस्सा मुसलमानों के द्वारा हिन्दुओं के साथ की गई हिंसा से ही परिभाषित होता है। अगर हिन्दू सत्ता-तंत्र के द्वारा छला जाए और शोषित-पीड़ित हो, तब उसे इतना ग़ुस्सा नहीं आता। उसके लिए हिन्दू पर अत्याचार तभी अत्याचार है, जब वह मुसलमान के द्वारा किया जाए, अन्यथा नहीं।
उसका युवोचित-आदर्शवाद आत्मचिन्तन और सजग-बौद्धिकता के अभाव में प्रौढ़ होकर क्षीण हो गया है। अब वो एक बदला हुआ व्यक्ति है। मैंने वॉट्सएप्प स्टेटस पर देखा तो हताश हो गया- वो अब अपने बच्चों को भी हिन्दू-जागरण सम्मेलनों में ले जाने लगा है! मानो अपने भीतर का विष विरासत में उन्हें भी सौंप जाना चाहता हो! पता नहीं वो उन्हें कैसा नागरिक बनाना चाहता है।
हिंदुत्व की राजनीति का अंध समर्थन!
यह उसके अकेले की नहीं, देश के असंख्य व्यक्तियों की कहानी है। आज हमारे इर्द-गिर्द ऐसे अनेक नाते-रिश्तेदार, मित्र-परिचित हैं, जिन्होंने हिन्दुत्व की राजनीति के प्रति अपने अंध-समर्थन में अपनी बुनियादी मनुष्यता, न्यायप्रियता और ईमानदारी को ताक पर रख दिया है। देश के अवचेतन में यह रोप दिया गया है कि वर्तमान में हिन्दुओं का मुसलमानों से युद्ध चल रहा है और इस युद्ध में हिन्दू-नेतृत्व का समर्थन करने के लिए आपको हर प्रकार की अनैतिकता को अनदेखा करना होगा। और अफ़सोस कि देश ने यह मान लिया है!
किन्तु ऐसी विषैली-बुनियाद पर कभी किसी ऐसे राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता, जो उन्नत हो, विकसित हो, सभ्य हो, मानवीय हो और मर्यादा-पुरुषोत्तम के उदात्त आदर्शों के अनुरूप मर्यादित हो।
मैंने अपना एक मित्र खो दिया। लेकिन उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इस देश ने एक सम्भावनाशील, ईमानदार युवा को गँवा दिया!
(सुशोभित के फेसबुक पेज से साभार)