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फ़ोटो साभार: ट्विटर/नयनतारा राय

ताक़तवर प्रधानमंत्री इंदिरा तक को हिला देने वाले रामलीला मैदान में सन्नाटा क्यों?

रामलीला मैदान में रामलीला के अलावा वामपंथियों से लेकर जनसंघ और बीजेपी तक की रैलियाँ और कार्यक्रम इस मैदान पर हुए हैं। दिल्ली का पुराना शौक पतंगबाज़ी भी इसी मैदान में पूरा होता है। बात सिर्फ़ पतंगबाज़ी की नहीं है, यहाँ बहुत से राजनेताओं की राजनीतिक पतंगों के पेंच काटे गए हैं।
विजय त्रिवेदी

दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर रोड से दिल्ली गेट होते हुए तुर्कमान गेट के बीच पसरे रामलीला मैदान में अभी सन्नाटा सा पसरा हुआ है, लेकिन यह वो ऐतिहासिक मैदान है जहाँ हुई एक राजनीतिक रैली ने देश में सबसे ताक़तवर प्रधानमंत्री माने जाने वाली श्रीमति इंदिरा गाँधी को इस क़दर अंदर तक हिला दिया था कि उन्होंने बिना देर किए देश पर इमरजेंसी लगा दी। कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की सिर्फ़ दो लाइनों को नारों की तरह गूंजाती कई लाख लोगों की भीड़ ने सच में इंदिरा गाँधी की कुर्सी हिला दी थी। 25 जून 1975 की शाम रामलीला मैदान में गूँज रहा था- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’। मंच पर कुर्सी पर एक बूढ़ा नेता था लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जिन्हें बाद में दुष्यंत कुमार ने ‘अंधेरे कमरे में रोशनदान’ कहा था। लेकिन इंदिरा गाँधी ने कुर्सी खाली नहीं की बल्कि सिंहासन को पूरी तरह से अपने क़ब्ज़े में लेने का प्लान बना लिया और देश को रात के स्याह अंधेरे में छोड़ दिया।

जेपी ने अपने भाषण में इंदिरा गाँधी से इस्तीफ़ा देने की माँग और पुलिस व सेना से सरकार का सहयोग नहीं करने की अपील की थी। लोगों का कहना है कि इंदिरा गाँधी को लगा था कि अगले दिन जेपी की अगुवाई में जनता उनके घर का घेराव कर लेगी और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ेगी। उस रैली की ख़बर अख़बारों में ना छपे, इसके लिए बहादुर शाह जफर मार्ग पर बने अख़बारों के दफ्तरों में बिजली काट दी गई थी। लेकिन आज बात इमरजेंसी और राजनीति की नहीं करेंगे।

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आज बात सिर्फ़ रामलीला मैदान की। दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान, देश का शायद ही कोई बड़ा नेता रहा हो जिसने यहाँ रैली नहीं की हो, आज़ादी से पहले महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद , मोहम्मद अली जिन्ना, और आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू , लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक। योगगुरु बाबा रामदेव तो शायद रामलीला मैदान की उस रात को कभी नहीं भूल पाएँगे जब उन्हें दिल्ली पुलिस से बचने के लिए अंधेरी रात में महिला सलवार सूट पहन कर भागना पड़ा था।

भूलना तो 6 फ़रवरी 1977 की शाम की रामलीला मैदान की उस रैली को भी मुश्किल है जब कांग्रेस से निकले बाग़ी बाबू जगजीवन राम ने हिन्दुस्तान की सुपरहिट फ़िल्म बॉबी को भी हरा दिया था। यूँ तो 1977 के आम चुनावों से पहले इंदिरा गाँधी ने भी ज़बरदस्त रैली इसी मैदान में की थी। उन आम चुनावों से पहले कांग्रेस विरोधी दल एकजुट होने लगे थे और एक संयुक्त विपक्ष की उस रैली में कांग्रेस से आए बाबू जगजीवन राम, चन्द्रशेखर, मोरारजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी संबोधित करने वाले थे। उस रैली से पहले बाबू जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनि सत्पथी ने 2 फ़रवरी को कांग्रेस छोड़ी थी, यानी उस वक़्त दलितों के सबसे ताक़तवार नेता और इंदिरा सरकार में मंत्री रहे बाबू जगजीवन राम उस रैली के हीरो थे।

इंदिरा गाँधी ने बाबू जगजीवन राम पर धोखा देने का आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने इमरजेंसी के दौरान देश के हालात की सही जानकारी उन्हें नहीं दी। इसी रैली में इंदिरा गाँधी को जवाब देते हुए बाबू जगजीवन राम ने कहा कि – ‘कैसे बता देते? अगर बता देते तो फिर जगजीवन कहीं होते और राम कहीं होते!’

रैली में भीड़ का रेला थम नहीं रहा था। और जब अटल बिहारी वाजपेयी भाषण देने के लिए उठे तो काफ़ी देर तक भीड़ उनके समर्थन में नारे लगा रही थी। इस रैली को फ्लॉप करने के लिए तब के सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उस शाम दूरदर्शन पर उस वक़्त की सुपर हिट फ़िल्म बॉबी का प्रसारण दूरदर्शन पर कराया, लेकिन ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की टीनएज लवस्टोरी की हीरोइन यानी ‘बॉबी’ राजनीति के धुरधंर ‘बाबू’ के सामने पिट गई। इस रैली से ही जनता का मूड समझ आने लगा था। बीजेपी के रणनीतिकार और वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली के लिए भी यह पहला बड़ा राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म था जहाँ उन्होंने रैली में सबसे पहला भाषण दिया – रैली को वार्मअप करने के लिए और उसके बाद शुरू हुआ उनका देश की राजनीति का सफ़र। वह उस वक़्त तक दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे थे और इमरजेंसी के दौरान जेल काट कर निकले थे।

जब नेहरू रो पड़े थे...

रामलीला मैदान में 27 जनवरी 1963 को कैसे भूला जा सकता है, जब लता मंगेशकर ने जवाहर लाल नेहरू की मौजूदगी में ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत इस कदर भाव से गाया था कि पूरा मैदान देशभक्ति की भावना में सराबोर हो गया था। उस वक़्त देश 1962 में चीन के साथ युद्ध में हार को झेल कर निकला ही था। कार्यक्रम के बाद नेहरू ने लता मंगेशकर को बुलाया। लता को लगा कि कोई ग़लती हो गई है, लेकिन जब वो उनके पास पहुँचीं तो नेहरू की आँखें नम थीं। पंडित नेहरू ने लता से कहा कि तुमने आज मुझे रुला दिया। दो साल बाद 1965 में तब के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रामलीला मैदान में ही ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। नेहरू और देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की श्रद्धांजलि सभा भी इसी रामलीला मैदान में हुई थी। 

नेहरू की श्रद्धांजलि सभा में सोवियत रूस और जापान के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। उन्होंने अपनी बात हिन्दी में रखी थी, लेकिन जब नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने अंग्रेज़ी में भाषण दिया तो अगले दिन के कई अख़बारों में उनकी आलोचना भी थी।

इससे पहले 1961 में जब महारानी एलिज़ाबेथ भारत के दौरे पर आई थीं, दिल्ली में उनके स्वागत का एक भव्य कार्यक्रम रामलीला मैदान में रखा गया था और तब ही वहाँ पक्का मंच बनाया गया था। मोहम्मद अली जिन्ना ने 1945 में मुसलिम लीग की एक रैली को यहाँ संबोधित किया था। जिन्ना जब वहाँ भाषण दे रहे थे उनके कई समर्थकों ने मौलाना जिन्ना ज़िंदाबाद के नारे लगाना शुरू किया तो भाषण को बीच में ही रोक कर जिन्ना ने कहा कि मैं तुम्हारा पॉलिटिकल लीडर हूँ, इसलिए मुझे मौलाना मत बुलाइए।

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का शपथ ग्रहण समारोह भी 14 फ़रवरी 2015 को इसी मैदान में हुआ था और उससे पहले अगस्त, 2011 में अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी रामलीला मैदान में भी ज़ोर पकड़ा था। इससे कुछ दिन पहले जून में योगगुरु रामदेव कालेधन के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे थे और 6 जून की देर रात को जब पुलिस ने तंबू उखाड़ दिए और रामदेव को गिरफ्तार करने की कोशिश की, तब रामदेव पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे। इसी साल नवम्बर में अल्पसंख्यकों का एक बड़ा सम्मेलन सोशल जस्टिस की माँग को लेकर भी हुआ था।

क़रीब 1930 से पहले तक यहाँ तालाब था, फिर उसे भरवा कर मैदान बनवा दिया गया और यहाँ रामलीला होने लगी। इससे पहले मुगल सेना में हिन्दू फौज़ी क़रीब 1800 से लाल क़िले के पीछे यमुना नदी के तट से जुड़े मैदान पर रामलीला किया करते थे। रामलीला के अलावा इस मैदान में वामपंथियों से लेकर जनसंघ और बीजेपी तक की रैलियाँ और कार्यक्रम इस मैदान पर हुए हैं। दिल्ली का पुराना शौक पतंगबाज़ी भी इसी मैदान में पूरा होता है। बात सिर्फ़ पतंगबाज़ी की नहीं है, यहाँ बहुत से राजनेताओं की राजनीतिक पतंगों के पेंच काटे गए हैं।

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