हम क्या कभी भी यह स्वीकार करने को तैयार हो सकेंगे कि महामारी के दौरान और उसके बाद की स्थितियों से निपटने का बहुत सारा सम्बंध इस बात से भी रहने वाला है कि नागरिकों को जिस तरह की सूचनाओं और जानकारियों से मीडिया द्वारा समय-समय पर अवगत कराया गया उनमें उनका कभी भरोसा ही नहीं रहा?
शब्दों की जैविक खेती करने वाले अवश्य ही अपनी उपज को बर्बाद होते हुए चुपचाप देखते रहते हैं क्योंकि उनके पैर रखने के लिए अख़बारों की मंडी में तब कोई जगह ही नहीं बचती।
दुनिया के एक सौ अस्सी देशों में प्रेस की आज़ादी को लेकर हाल ही में जो रैंकिंग जारी की गई है उसके अनुसार हम वर्ष 2019 के मुक़ाबले दो पायदान और नीचे खिसक कर 142वें क्रम पर पहुँच गए हैं।