गाँधीजी राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में अपनाई जाने वाली नीतियों और आदर्शों में पार्थक्य नहीं करते थे - उनके मुताबिक़ जो बात व्यक्तिगत जीवन में सही या ग़लत है, वही राजनीतिक जीवन में भी सही या ग़लत है - इसलिए आज हम उनके द्वारा ‘व्यक्तिगत जीवन में अपनाई गई नीति’ के आधार पर तय करेंगे कि यदि जम्मू-कश्मीर का मसला उनके सामने घटित होता तो वह कैसे रिऐक्ट करते।
‘यदि मैं पहली परिभाषा को मान लेता तो मैं न केवल अंडे बल्कि मछली भी खा सकता था। लेकिन मुझे इसमें बिल्कुल ही संदेह नहीं था कि इस मामले में माँसाहार की वही परिभाषा मान्य होगी जो मेरी माँ की है। इसलिए यदि मुझे अपनी माँ को दिए गए वचन का पालन करना है तो मुझे अंडों का परित्याग करना होगा। मैंने वैसा ही किया।’
‘वचनों की अलग-अलग व्याख्या दुनिया के कई झगड़ों और विवादों का मूल रही है। कोई वचन चाहे कितना भी सुस्पष्ट हो, लोग उसे अपने फ़ायदे के लिए तोड़मरोड़कर नया रूप दे ही देते हैं… स्वर्णिम नियम यह है कि जो पक्ष वचन ले रहा है, उसकी ईमानदारीपूर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाए। इसके अलावा जब किसी वचन की दो व्याख्याएँ संभव हों तो कमज़ोर पक्ष की व्याख्या को स्वीकार किया जाए।’
इन्हीं दो नियमों के आधार पर माँसाहार की परिभाषा तय करते हुए गाँधीजी लिखते हैं - ‘इस स्वर्णिम नियम के अनुसार माँसाहार के बारे में मेरी माँ की जो व्याख्या थी, वही मेरे लिए सच्ची व्याख्या थी, न कि वह जो अपने विस्तृत अनुभव या बेहतर ज्ञान के गर्व के चलते मुझे सही लगे।’