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मोदी का आत्मनिर्भरता का विचार महज़ एक आडंबर है?

दुनिया के सभी औद्योगिक राष्ट्र जैसे इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका, जापान, रूस, आदि ने ऐसे राजनीतिक नेताओं के नेतृत्व में अपना औद्योगिकीकरण किया जो उद्योग के महत्व को समझते थे और अपने देश का तेज़ी से औद्योगिकीकरण करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। दूसरी ओर, भारत में हमने लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली को अपनाया जो काफ़ी हद तक जाति और सांप्रदायिक वोट बैंक पर आधारित है।
जस्टिस मार्कंडेय काटजू

शेषाद्रि चारी ने मोदीजी के ‘भारतीय आत्मनिर्भरता’ पर एक लेख लिखा है। यह लेख print.in में छपा है। उनका कहना है कि मोदी जी का विचार वही है जो- गाँधीजी के आधुनिकीकरण का था- हाँ, पश्चिमी निर्भरता- नहीं’। शेषाद्रि चारी आरएसएस से जुड़े हैं। उनकी बातें खोखली और अर्थहीन हैं। उन्होंने कहा कि ‘स्वदेशी को मज़बूत स्थानीयकरण (robust localisation) और अपरिहार्य वैश्वीकरण (inevitable globalisation) के बीच एक पुल के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं’, और ‘आत्मनिर्भरता का मतलब अंतरराष्ट्रीय व्यापार से कट जाना नहीं है। भारत को देशीय क्षेत्रों का खयाल रखते हुए दुनिया के साथ भी गंभीरता से जुड़ना होगा, ऐसे में भारतीय शासन प्रणाली को सुव्यवस्थित करके अपने घरेलू उद्योग को मज़बूत करना आवश्यक है। स्वदेशी को अलगाव नहीं समझा जाना चाहिए।’

चारी ने अंत में आडंबरी, निरर्थक और अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, ‘स्थानीय लोगों के लिए मुखर होना, भारतीय उद्यमिता की आंतरिक ताक़त की पहचान और संवर्धन है, जो भूमि, श्रम, तरलता और क़ानूनों के विकट उलझनों से बंधन - मुक्त होने की प्रतीक्षा कर रहा है- जैसा कि मोदी जी ने कहा था।’

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अब, इस शब्दाडंबर का कोई क्या मतलब निकाले और क्या समझे?

चारी ने बार-बार गाँधी का उल्लेख किया है, तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि गाँधी के आर्थिक विचार पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी (Reactionary) थे। वह आत्मनिर्भर 'ग्राम अर्थव्यवस्थाओं' (Self Reliant Village Economies) का समर्थन करते थे। क्या यह करना आज की आधुनिक दुनिया के अनुकूल या संभव है?

गाँधी चरखा का गुणगान करते थे और वे अक्सर औद्योगिकीकरण के ख़िलाफ़ बोलते थे। लेकिन आज की दुनिया में यह कहना बेवक़ूफ़ी होगी कि कपड़ा हाथ से बनाया जाना चाहिए, मिलों में नहीं। उनका 'ट्रस्टीशिप सिद्धांत' भी ठीक नहीं था। आज भारत के केवल 7 लोगों के पास अकेले ही भारत की आधी आबादी के बराबर धन है! क्या ये 7 'ट्रस्टी' जनता कल्याण के लिए काम कर रहे हैं?

इसके अलावा, यह जानना भी आवश्यक है कि केवल विकसित देश ही आत्मनिर्भर हो सकते हैं भारत की तरह अविकसित देश नहीं। उदाहरण के लिए, भारत को अपनी सेना के लिये लगभग सभी भारी हथियार जैसे कि टैंकों, तोपखाने, विमानों, पनडुब्बियों आदि को विदेशों से भारी क़ीमत पर खरीदने पड़ते हैं। पिछले साल, भारत ने अमेरिकी फ़र्म सिग सॉयर (Sig Sauer) से 700 करोड़ रुपये में 72,400 असॉल्ट राइफ़लें खरीदी थीं।

इसलिए, वास्तव में आत्मनिर्भर बनने के लिए, हमें भारत को एक अविकसित देश से अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान या चीन जैसे विकसित देश में बदलना होगा।

हम यह कैसे करें?

मेरे विचार में समाधान तीव्र औद्योगिकीकरण है, जो आधुनिक दिमाग़ वाले देशभक्त नेताओं के नेतृत्व में ही संभव है। यह केवल व्यापक और बड़े पैमाने पर परिचालन करने वाले उद्योग हैं जो ग़रीबी को ख़त्म कर सकते हैं, लाखों नौकरियाँ पैदा कर सकते हैं और हमारे लोगों के कल्याण के लिए आवश्यक धन उत्पन्न कर सकते हैं।

लेकिन इस तरह के व्यापक औद्योगिकीकरण को कैसे संभव किया जा सकता है?

कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में औद्योगिकीकरण कुछ हद तक बढ़ा था। नेहरू के समय कई स्टील प्लांट स्थापित किए गए, आईआईटी और अन्य तकनीकी संस्थान खोले गए फिर भी आगे चलकर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई। क्यों?

मेरे विचार में ऐसी कई शक्तिशाली बाहरी और आंतरिक ताक़तें हैं जो हमें इससे आगे किसी भी तरह का औद्योगिकीकरण करने नहीं देंगी और अगर हम प्रगति करना चाहते हैं तो हमें इनसे मुक़ाबला करना होगा।

मैं आपको समझाता हूँ।

श्रम की लागत उत्पादन की कुल लागत का एक बड़ा हिस्सा है। इसलिए यदि श्रम की लागत और उत्पादन की लागत दोनों ही कम हैं तो कोई भी अपने व्यापार प्रतिद्वंद्वी की अपेक्षा वस्तु सस्ती क़ीमत पर बेच सकता है। बाज़ार में सभी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं और एक व्यापारी बंदूक़ या बम के इस्तेमाल से नहीं बल्कि अपनी वस्तुएँ दूसरे के मुक़ाबले कम दाम पर बेच कर नष्ट करता है।

1949 में चीन में एक क्रांति हुई जिसके बाद चीनी नेताओं ने तेज़ी से औद्योगिकीकरण किया और एक बड़े पैमाने पर औद्योगिक आधार स्थापित किया। यह विशाल औद्योगिक आधार, उपलब्ध सस्ते श्रम के इसी मिश्रण ने मिलकर, चीन को पूरी दुनिया में उपभोक्ता वस्तुओं का सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया है। पश्चिमी सुपरमार्केट चीनी सामानों से भरे रहते हैं क्योंकि ये अक्सर पश्चिमी देशों द्वारा निर्मित सामान की क़ीमत से आधे से भी कम क़ीमत पर बिकते हैं (क्योंकि पश्चिमी श्रम महंगा है)।

भारतीय श्रम चीनी श्रम से भी सस्ता है! इसलिए अगर हम एक विशाल औद्योगिक आधार स्थापित करें तो हम चीनियों को भी पीछे छोड़ सकते हैं। फिर औद्योगिक देशों का महंगा माल कौन खरीदेगा?

इसलिए औद्योगिक देशों का अलिखित, अवर्णित नियम है: किसी भी क़ीमत पर भारत को किसी भी तरह का औद्योगिकीकरण करने न दें और इसे रोकने के लिए जो बन पड़ता है वो करें! भारतीयों में जाति, धर्म या क्षेत्रों के आधार पर दरारें पैदा करें और लड़ायें।

यही कारण था कि अंग्रेज़ों ने बनावटी ‘दो राष्ट्र सिद्धांत' (हिंदू और मुसलिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं) का प्रतिपादन किया (इसके अलावा मेरे दूसरे लेख 'The Truth about Pakistan', 'The Truth about Partition' मेरे ब्लॉग Satyam Bruyat पर पढ़ें और बी.एन पांडे की ‘History in the service of Imperialism' ऑनलाइन ज़रूर पढ़ें )। विभाजन ‘दोहरे’ उद्देश्य से किया गया था- (1) भारत को एक शक्तिशाली औद्योगिक विशाल देश के रूप में उभरने न दिया जाए और इसके लिए हिंदू और मुसलमानों का एक-दूसरे से लड़ते रहना ज़रूरी था और (2) भारतीय उपमहाद्वीप विदेशी हथियार उद्योग के लिए हमेशा एक बड़ा बाज़ार बना रहना चाहिए (भारत दुनिया में विदेशी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है, उन पर अरबों डॉलर ख़र्च करता है, वह पैसा जो हमारे ग़रीब लोगों के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था)।

विचार से ख़ास

दुनिया के सभी औद्योगिक राष्ट्र जैसे इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका, जापान, रूस, आदि ने ऐसे राजनीतिक नेताओं के नेतृत्व में अपना औद्योगिकीकरण किया जो उद्योग के महत्व को समझते थे और अपने देश का तेज़ी से औद्योगिकीकरण करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। उदाहरण के लिए, 1868 में मीजी बहाली (Meiji Restoration) के बाद सत्ता में आए नेताओं ने जापान को तेज़ी से औद्योगिक बनाया (पश्चिमी देशों के तकनीकी विशेषज्ञों को काम पर रखा, अपने युवाओं को पश्चिमी तकनीकी संस्थानों आदि में भेजा)। इसका परिणाम यह हुआ कि 15-20 वर्षों में जापान एक पिछड़े, सामंती देश से एक आधुनिक औद्योगिक देश में बदल गया।

दूसरी ओर, भारत में हमने लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली को अपनाया जो काफ़ी हद तक जाति और सांप्रदायिक वोट बैंक पर आधारित है। जातिवादी, सांप्रदायिक और सामंती ताक़तें हैं जिन्हें नष्ट करना होगा यदि भारत को प्रगति करनी है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र इन्हें और मज़बूत करता है। 

हमारे राजनीतिक नेताओं को देश में तेज़ी से औद्योगिकीकरण करने में कोई वास्तविक रुचि नहीं है, उनका उद्देश्य धन प्राप्त करना और चुनाव जीतना है। इसके लिए उन्होंने जनता को ध्रुवीकृत करने और जातिगत और सांप्रदायिक घृणा फैलाने की कला में महारत हासिल की है। फिर भारत उनके नेतृत्व में कैसे आगे बढ़ सकता है?

हमें अपनी सभी रचनात्मकता का उपयोग करना होगा और संसदीय लोकतंत्र का विकल्प बनाना होगा, एक राजनीतिक प्रणाली जो भारत को तेज़ी से औद्योगिकीकरण की ओर ले जाए। इसके लिए भारत में किसी प्रकार की क्रांति अनिवार्य है, हालाँकि ऐसा कब होगा और यह किस रूप में होगा, इसका अनुमान लगाना असंभव है।

लेकिन जो बात निश्चित रूप से कही जा सकती है वह यह है कि यह क्रांति आधुनिक दिमाग़, धर्मनिरपेक्ष और निस्वार्थ देशभक्त नेताओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक एकजुट जनता के संघर्ष के माध्यम से ही होगी, जो सदियों से चले आ रहे संचित सामंतवाद और सामंती विचारों की गंदगी को दूर करने के लिए और राष्ट्र का तेज़ी से औद्योगिकीकरण करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं!

तभी भारत आत्म निर्भर बनेगा।

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