loader

दिल्ली में काम करते हैं, बीमार यहाँ पड़ेंगे तो इलाज कहाँ कराएँगे!

जो लोग दिल्ली के अलावा नोएडा, गुड़गाँव, गाज़ियाबाद वगैरह में भी रहते हैं और दिल्ली में काम करते हैं और दिल्ली को अपनी कर्मभूमि समझते हैं, उन्हें बीमार पड़ने पर दिल्ली में इलाज नहीं मिलना तो घोर अन्याय है। 
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

दिल्ली में कोरोना का संकट सुरसा के बदन की तरह बढ़ता जा रहा है, ऐसे में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने यह फ़ैसला कर लिया कि दिल्ली के अस्पतालों में बाहरवालों का इलाज नहीं होगा तो उसका यह फ़ैसला दिल्लीवालों को तो अच्छा लगा लेकिन दिल्ली में लाखों लोग ऐसे भी रहते हैं और बरसों से रहते हैं, जिनके आधार-कार्ड और पहचान-पत्रों पर उनके गाँवों के पते जड़े हुए हैं। ऐसा होने से उन्हें कभी किसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ता। 

ताज़ा ख़बरें

ये लोग कौन हैं? ये प्रायः वे लोग हैं, जिन्हें हम प्रवासी मज़दूर कहते हैं। वंचित, ग़रीब, पिछड़े, अशिक्षित, मेहनतकश लोग! अगर ये अचानक कोरोना के संकट में फँस जाएँ तो ये क्या करेंगे? क्या इलाज के लिए अपने गाँव या प्रदेश में दौड़ेंगे? उनके पास इलाज के लिए तो पैसे हैं ही नहीं (खाने के लिए भी नहीं), वे टैक्सी, बस, रेल या जहाज का किराया कहाँ से लाएँगे और उससे बड़ी समस्या यह कि उन्हें इलाज मिलने में तीन-चार दिन की देर भी लग सकती है। 

इसके अलावा जो लोग नोएडा, गुड़गाँव, गाज़ियाबाद वगैरह में रहते हैं और दिल्ली में काम करते हैं और दिल्ली को अपनी कर्मभूमि समझते हैं, उन्हें बीमार पड़ने पर दिल्ली में इलाज नहीं मिलना तो घोर अन्याय है। इस अन्याय के विरुद्ध दिल्ली के उच्च न्यायालय ने 2018 में एक कड़ा फ़ैसला भी दिया था कि जिस रोगी के पास दिल्ली का मतदाता-पहचान पत्र नहीं है, उसे कई सुविधाओं से वंचित किया जाता है। उसे संविधान की धारा 21 का उल्लंघन बताया गया। 

विचार से ख़ास
इसीलिए दिल्ली के उप-राज्यपाल ने दिल्ली सरकार के प्रावधान को रद्द करके ठीक ही किया लेकिन इस मामले को बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीतिक फुटबॉल बनाने से कहीं बेहतर यह होगा कि केंद्र सरकार तहे-दिल से राज्य सरकार के साथ सहयोग करे ताकि दिल्ली में कोई भी व्यक्ति सही समय पर सही इलाज से वंचित न रह जाए। इस राष्ट्रव्यापी संकट के दौरान यदि नेता लोग एक-दूसरे की टांग खींचेंगे तो वे अपनी ही छवि गिराएँगे। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार, दोनों के फ़ैसलों के पीछे सदाशय ही रहा है। उन्हें साथ मिलकर ही इस संकट को हराना है। ज़रूरी है कि दिल्ली और दिल्ली की सरकारों के दिल मिलें।

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता प्रमाणपत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
डॉ. वेद प्रताप वैदिक
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें