हाल ही में अमेरिका के प्रभावशाली नेता मार्को रूबियो के एक भाषण के कुछ अंश सामने आए हैं। इस भाषण में वे कहते हैं कि पिछले पाँच सौ वर्षों तक पश्चिमी दुनिया पूरी पृथ्वी पर फैलती रही- मिशनरी गए, सैनिक गए, साम्राज्य बने। फिर 1945 के बाद यह सब “अचानक” रुक गया। उनके मुताबिक इसका कारण था- कम्युनिज़्म, उपनिवेश-विरोधी आंदोलन और पश्चिम की अपनी “कमज़ोरी”।

अगर इस भाषण को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह सिर्फ इतिहास की व्याख्या नहीं है। यह एक खास मानसिकता को दिखाता है- एक ऐसी सोच जो आज की दुनिया को स्वीकार नहीं कर पा रही है।

1. उपनिवेशवाद को “गौरव” बताने की कोशिश

रूबियो के भाषण में उपनिवेशवाद को लगभग एक नेक काम की तरह दिखाया गया है—जैसे पश्चिम दुनिया को सभ्य बनाने निकला था। लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है।

उपनिवेशवाद का मतलब था—देशों पर कब्ज़ा, लोगों को गुलाम बनाना, उनकी ज़मीन और संसाधन लूटना, उनकी भाषा और संस्कृति को दबाना। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोग आज भी उस दौर की मार झेल रहे हैं।

जब कोई नेता इस पूरे इतिहास को “महान सभ्यता का विस्तार” कहता है, तो वह असल में पीड़ितों के दर्द को नकार रहा होता है।

2. आज़ादी की लड़ाइयों को साज़िश कहना

रूबियो यह संकेत देते हैं कि उपनिवेशवाद का अंत कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि कम्युनिस्ट साज़िशों और विद्रोहों का नतीजा था।

यह बात उन करोड़ों लोगों का अपमान है जिन्होंने अपने देशों की आज़ादी के लिए संघर्ष किया।

भारत की आज़ादी, अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलन, वियतनाम का संघर्ष- ये सब किसी विदेशी विचारधारा के इशारे पर नहीं हुए थे। ये लोगों की अपनी ज़िंदगी, सम्मान और भविष्य की लड़ाइयाँ थीं।

3. 1945 के बाद की दुनिया से परेशानी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया बदली। संयुक्त राष्ट्र बने, उपनिवेश टूटे, देशों की बराबरी की बात हुई।

लेकिन इस सोच में यह बदलाव “गलती” माना जाता है। रूबियो कहते हैं कि पश्चिम का पतन कोई मजबूरी नहीं था, बल्कि एक “चुनाव” था—जिसे पलटा जा सकता है।

यहीं से खतरा शुरू होता है। जब कोई यह मानने लगे कि आज की विश्व-व्यवस्था गलत है और उसे वापस पुराने ढांचे में ले जाना चाहिए, तो टकराव तय हो जाता है।

4. बहुध्रुवीय दुनिया से डर

आज दुनिया एक ध्रुव पर नहीं टिकी है। चीन, भारत, रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका—सबकी भूमिका बढ़ रही है। इसे बहुध्रुवीय दुनिया कहते हैं।

लेकिन रूबियो जैसे नेता इसे कमजोरी मानते हैं। उनके लिए या तो पश्चिम का राज होगा, या फिर अराजकता।

असल समस्या यह है कि यह सोच बराबरी को स्वीकार नहीं कर पाती। जब सब देशों को समान माना जाए, तो पुराने मालिक–नौकर वाले रिश्ते टूट जाते हैं।

5. यूरोप को “साथी” नहीं, “अनुयायी” समझना

रूबियो यूरोप से कहते हैं कि वह अपराधबोध छोड़े, अपनी “विरासत पर गर्व” करे और अमेरिका के साथ खड़ा हो। सुनने में यह दोस्ती लगती है, लेकिन असल में यह आदेश जैसा है।

यूरोप को स्वतंत्र सोच वाला साझेदार नहीं, बल्कि अमेरिका की लाइन पर चलने वाला क्षेत्र माना जा रहा है।

6. ट्रंप युग की सोच की वापसी

यह भाषण साफ़ तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति से जुड़ता है। ट्रंप के दौर में भी यही कहा गया—अमेरिका महान था, फिर कमजोर हुआ, अब फिर महान बनना है।

लेकिन “महान बनने” का मतलब यहाँ सहयोग नहीं, दबदबा है।

7. वैश्विक दक्षिण के लिए खतरे की घंटी

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लिए यह सोच बहुत ख़तरनाक है। अगर उपनिवेशवाद को ग़लत नहीं, बल्कि अधूरा काम माना जाएगा, तो भविष्य में भी संसाधनों, बाज़ारों और राजनीति पर कब्ज़े की कोशिशें होंगी।

यह बराबरी की दुनिया का सपना नहीं है, बल्कि पुराने साम्राज्यवादी नक्शे की वापसी है।

8. असल समस्या: भविष्य का डर

सच यह है कि यह पूरा भाषण भविष्य से डरे हुए लोगों की आवाज़ है। दुनिया बदल रही है, ताकत बँट रही है, और यह बदलाव कुछ लोगों को असहज कर रहा है।

लेकिन इतिहास को पलटकर यह बदलाव रोका नहीं जा सकता।

मार्को रूबियो का भाषण सिर्फ एक भाषण नहीं है। यह एक चेतावनी है कि दुनिया में कुछ ताकतें आज भी बराबरी, संप्रभुता और बहुलता को खतरा मानती हैं।

इक्कीसवीं सदी की सच्चाई यह है कि कोई एक सभ्यता पूरी दुनिया की मालिक नहीं हो सकती।

अगर कोई इस सच्चाई को मानने से इनकार करेगा, तो वह दुनिया को सहयोग की ओर नहीं, टकराव की ओर ले जाएगा।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या हम फिर से साम्राज्यों की दुनिया में लौटना चाहते हैं, या बराबरी की दुनिया में आगे बढ़ना चाहते हैं?