सुप्रीम कोर्ट मेंस्ट्रूअल लीव के क़ानून के पक्ष में नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं को पीरियड लीव देने की अर्ज़ी यह कहते हुए ख़ारिज कर दी कि अगर महिलाओं को पीरियड लीव दिया गया तो उनका करियर खराब हो सकता है। एक प्रगतिशील समाज के लिए आत्मचिंतन का विषय है। यह तर्क पहली नज़र में महिलाओं के 'भले' के लिए लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह उसी पुराने पितृसत्तात्मक डर को दर्शाता है जिसने दशकों तक महिलाओं को दफ़्तरों में काम नहीं करने दिया। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है, आज से कुछ दशक पहले जब 'मैटरनिटी लीव' (मातृत्व अवकाश) को अनिवार्य करने की बात उठी थी, तब भी उद्योग जगत और नीति निर्माताओं ने ठीक यही तर्क दिए थे। कहा गया था कि 6 महीने की पेड लीव देने से कंपनियां महिलाओं को नौकरी देना बंद कर देंगी।
मातृत्व अवकाश से क्या महिलाएँ घर बैठ गईं?
लेकिन क्या ऐसा हुआ? नहीं। बल्कि मातृत्व अवकाश ने महिलाओं को करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाने में मदद की। आज दुनिया भर में स्त्रियाँ इस अधिकार के सहारे अपना वर्क लाइफ बैलेंस बना रही हैं। दीगर बात यह कि अधिकार कभी भी 'दान' नहीं होते, वे संघर्ष से हासिल की गई 'बराबरी' होते हैं।
जबरन अपराधबोध लाने की कोशिश?
इस बात को भी समझना ज़रूरी है कि जिस जैविक प्रक्रिया को कमजोर होना बता रहे हैं जज साब, वह केवल मौक़े छीनने का एक बहाना है। कोर्ट का यह कहना कि "लड़कियों के दिमाग में यह बैठ जाएगा कि वे कमजोर हैं", एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया को 'कमजोरी' से जोड़ने जैसा है। जब सिर दर्द, पेट दर्द के लिए छुट्टी ली जा सकती है तब पीरियड के लिए छुट्टी लेना शारीरिक कमज़ोरी किस हिसाब से हुई?हममें से कई लोगों ने अपने आस-पास देखा होगा। हर स्त्री शरीर अलग होता है। हर किसी की मासिक धर्म की दिक्कतें अलग होती हैं। कई महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाले असहनीय दर्द (जैसे डिस्मेनोरिया) होता है मगर यह दर्द शरीर के किसी और हिस्से में होने वाले दर्द से अलग कैसे है? इसे 'अपराधबोध' या 'कमजोरी' का नाम क्यों दिया जा रहा है?
असल बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय की दलील कहीं न कहीं इस सोच की शिकार है कि "अगर हम अधिकार देंगे, तो समाज भेदभाव करेगा, इसलिए अधिकार ही मत दो", यह सोच पूरी तरह प्रतिगामी है। यह समाज को दफ़्तराई प्रशासन को सुधारने के बजाय पीड़ित (महिला) को ही चुप कराने जैसा है।
क्या इससे समानता ख़त्म होगी?
बेहद अहम् बात जो समझने की है वह यह कि समानता का मतलब यह नहीं है कि पुरुष और महिला के साथ हर स्थिति में एक जैसा व्यवहार हो। असली समानता तब आती है जब हम जैविक अंतरों को स्वीकार करें और उनके अनुरूप व्यवस्था बनाएं। मसलन, एक पुरुष को कभी मासिक धर्म के दर्द से नहीं गुजरना पड़ता। ऐसे में बिना किसी राहत के महिला से उसी स्तर की उत्पादकता की उम्मीद करना 'समानता' नहीं, बल्कि 'अन्याय' है।फिर भी अगर सुप्रीम कोर्ट को यह लगता है कि प्राइवेट सेक्टर भेदभाव कर सकता है तो इसका उपाय स्त्रियों को अधिकारों से वंचित करना नहीं है। न्यायालय बेहतर लैंगिक प्रतिभागिता के लिए सख़्त कानून बना सकती है। दफ़्तरों को बाध्य कर सकती है कि जिस तरह मैटरनिटी लीव अधिकार बना, यह भी महिलाओं के आवश्यक अधिकारों में शामिल हो। अगर सरकार और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करे कि लिंग के आधार पर भर्ती में भेदभाव दंडनीय अपराध है, तो कंपनियों की मनमानी रुक सकती है।
यूँ भी न्यायालय को इतनी ही चिंता है स्त्रियों के लिए मौकों की तो समान वेतन अधिकार, दफ़्तर परिवेश में शोषण को लेकर पारदर्शिता जैसे अनेक मुद्दे हैं जिस पर बेहतर काम करने की ज़रूरत है। गौरतलब है कि भारत में इस वक़्त कॉरपोरेट्स में महिला प्रोफेशनल की मौजूदगी केवल 20% है। क्या न्यायालय ने इस मौजूदगी को बढ़ाने के लिए कुछ किया? नहीं!
आख़िर में, यह कहना कि अधिकार देने से करियर खत्म हो जाएगा, महिलाओं की क्षमता पर संदेह करने जैसा है। दुनिया भर में जोमैटो जैसी कंपनियों और स्पेन जैसे देशों ने इसे लागू किया है। क्या वहां महिलाओं के करियर खत्म हो गए? समय आ गया है कि हम "महिलाएं काम नहीं कर पाएंगी" वाले डर से बाहर निकलकर "हम कार्यस्थल को उनके लिए अनुकूल कैसे बनाएं" पर ध्यान दें।
मासिक धर्म अवकाश कोई 'सुविधा' नहीं, बल्कि एक 'मानवाधिकार' है। इसे रोकना प्रगति की राह में पीछे हटने जैसा है।