भारत विविधताओं का देश है। यहाँ चकित कर देने वाली धार्मिक विविधताएँ हैं। अंग्रेजों ने भारत की हिन्दू और मुस्लिम पहचानों का इस्तेमाल कर ‘फूट डालो और राज करो‘ की अपनी नीति के बीज बोए। उन्होंने बार-बार अतीत की बातों को दुहराकर नफ़रत को हवा दी, जिसके आधार पर आगे चलकर मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस ने इतिहास का अपना-अपना नजरिया पेश किया। इसके नतीजे में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द कम होता गया और घृणा बढ़ती गई। इस घृणा के चलते देश के विभाजन के पहले जबरदस्त हिंसा हुई। माउंटबेटन द्वारा तैयार किए गए देश के विभाजन की योजना को स्वीकार करने की एक बड़ी वजह यह हिंसा भी थी। अमन के फरिश्ते राष्ट्रपिता को ‘मुस्लिम परस्त‘ होने के आरोप में अपनी छाती पर तीन गोलियाँ झेलनी पड़ीं।

विभाजन के बाद पाकिस्तान में मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ा जिससे वहाँ लोकतंत्र के फलने-फूलने की संभावना ख़त्म हो गई। सामाजिक और आर्थिक विकास पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव हुआ और पाकिस्तान के प्रगति, शांति और भाईचारे पर आधारित आधुनिक राष्ट्र बनने की संभावना बहुत कम हो गई। 

नेहरू की धर्मनिरपेक्षता

भारत में धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व था जिसके मुखिया जवारलाल नेहरू थे और उन्होंने एक ऐसे देश की नींव डाली जो आज से कुछ दशक पहले तक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राष्ट्र था। आज़ादी के बाद काफी लम्बे समय तक हमने अपने मूल्यों को कायम रखा और उन्नति भी की। लेकिन पिछले कुछ दशकों में साम्प्रदायिक शक्तियाँ बहुत शक्तिशाली हो गईं और उन्होंने आज़ादी के शुरुआती चार-पांच दशकों की उपलब्धियों पर पानी फेर दिया। अमन-चैन ख़त्म हो गया। अपनी ताक़त और समाज में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए उनके पास केवल एक हथियार था- मुसलमानों के खिलाफ नफरत पैदा करना।
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एक सच्चा लोकतंत्र बनने की राह पर चल रहे भारत को साम्प्रदायिक राष्ट्रवादी देश में बदलने के उनके अभियान के भाग बतौर उन्होंने मुख्यतः मुसलमानों और साथ ही ईसाईयों के खिलाफ नई-नयी बातें गढ़ना शुरू कर दीं। अब हालात काफी निराशाजनक हो चुके हैं। समाज में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल बन गया है जो हर बीतते दिन के साथ और गंभीर होता जा रहा है। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों ने देश में ऐसे हालात बना दिए हैं कि मुसलमानों का सारे समाज से कटकर अपने अलग मोहल्लों में रहना आम बात हो गई है। शाकाहार पर जोर दिया जा रहा है और लव जिहाद, लैंड जिहाद, कोरोना जिहाद आदि आम बोलचाल के शब्द बन गए हैं। शीर्ष नेतृत्व से लेकर मैदानी कार्यकर्ता तक इस घृणा के ज़रिए हिंसा फैलाते हैं जिसके नतीजे में समाज का ध्रुवीकरण होता जा रहा है।

शीर्ष नेतृत्व बंटेगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ हैं, उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है, उनकी संख्या खरगोशों की तरह बढ़ रही है, हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे, हिन्दू खतरे में हैं, आदि और इसके जैसे बहुत से अन्य नारे उछालता रहता है। 

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा, जो पहले कांग्रेस में थे और पिछले कुछ सालों से बीजेपी में हैं, ने मियांओं (बांग्लाभाषी मुसलमानों) के खिलाफ इतनी नफरत-भरे वक्तव्य दिए हैं जैसे पहले कभी नहीं सुने गए थे।

हिमंता की 'नफ़रती' बयानबाजी

गत 27 जनवरी को हिमंता ने कहा, ‘एसआईआर के ज़रिये चार से पांच लाख मियांओं के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए जाएंगे’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘वोट चोरी का मतलब है हम कुछ मियां वोटों को चुराने की कोशिश कर रहे हैं’ और यह भी कि ‘आदर्श स्थिति तो यह होगी कि उन्हें असम में मतदान न करने दिया जाए और वे बांग्लादेश में वोट दें’। समाचार माध्यमों की ख़बरों के मुताबिक़ सरमा ने जनता को खुलेआम भड़काते हुए कहा, ‘उन्हें जिस भी तरह से परेशान किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। अगर रिक्शे का किराया 5 रूपये हो तो उन्हें 4 रुपये दो। जब उनके लिए असम में रहना कष्टप्रद होगा तभी वे असम छोड़कर जाएंगे’।

ये सब कहने के बाद उन्होंने सबसे घृणित कार्य करते हुए एक वीडियो ट्वीट किया जिसमें यह दिखाया गया था कि वे राइफल से गोलियाँ दाग रहे हैं और गोलियाँ उनसे थोड़ी सी दूरी पर खड़े स्कलकैप पहने एक आदमी और एक लड़के को लग रही हैं। हालाँकि अब इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया है। यह सब देखने के बाद प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर ने ‘असम निवासी बांग्लाभाषी मुसलमानों के प्रति नफरत, प्रताड़ना और भेदभाव बढ़ाने के उद्धेश्य से नफरत फैलाने वाली पोस्ट करने के लिए’ उनके खिलाफ न्यायालय में एक याचिका दायर की। याचिका में उन्होंने असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ त्वरित कार्यवाही और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की सम्बंधित धाराओं के अंतर्गत एफ़आईआर दर्ज करने का अनुरोध किया। इसकी प्रतिक्रिया में सरमा ने कहा कि वे एनआरसी के दौरान हर्ष मंदर द्वारा मुसलमानों की मदद करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अनेक एफआईआर दर्ज करवाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि उन्हें जेल भेजा जाए।
विचार से और
सवाल उठता है कि हमारे देश में सदियों से कायम सामंजस्यपूर्ण संस्कृति कहां गई जिसमें असम के अजान पीर और शंकर देव सद्भाव की बात करते थे और असम में ही रहते थे? खान-पान, साहित्य, वास्तुकला और धार्मिक उत्सवों आदि क्षेत्रों में हिंदुओं और मुसलमानों के एक दूसरे पर प्रभाव का क्या हुआ? वर्तमान हालातों को देखकर बहुत निराशा और मायूसी महसूस होती है।

कोटद्वार का मोहम्मद दीपक का मामला

इस सबके बीच उत्तराखंड के कोटद्वार की घटना सामने आई है। वहाँ एक बुजुर्ग मुसलमान पिछले 30 साल से बाबा स्कूल ड्रेस नाम की दुकान चला रहे थे। बजरंग दल के कार्यकर्ता उसकी दुकान पर आ धमके और उससे कहा कि वह अपनी दुकान के नाम में बाबा शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि उनके मुताबिक बाबा एक हिंदू शब्द है। यह सब देखकर दीपक कुमार नामक एक व्यक्ति ने हस्तक्षेप किया। जब दीपक बजरंग दल के आक्रामक कार्यकर्ताओें का सामना कर रहे थे, उस दौरान पुलिस मूक दर्शक बनी रही और बाद में पुलिस ने दीपक कुमार और उनके मित्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली। बजरंग दल कार्यकर्ताओं के खिलाफ जो एफआईआर दायर की गई है उसमें आरोपियों के नाम अज्ञात बताये गए हैं।

मगर इस सारे घटनाक्रम का सबसे उजला पक्ष यह है कि जब हमलावर बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने दीपक से उसका नाम पूछा तो उसने जवाब था: ‘मोहम्मद दीपक’।

इस घटना से बहुत सी उम्मीदें जागती हैं। यह आशा जागती है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थकों द्वारा पैदा किए गए नफ़रत के सैलाब में इंसानियत पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है। दीपक हिन्दुओें और मुसलमानों के प्रगाढ़ रिश्तों का जीता-जागता उदाहरण हैं, जो पहले आम बात थी मगर आज अपवाद बन चुका है। इस अपवाद से यह साफ़ है कि अतीत में मेल-जोल का माहौल था। दीपक कुमार को सौ सलाम। लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दीपक कुमार को बधाई देते हुए कहा कि, ‘दीपक संविधान और इंसानियत की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे पैरों तले रोंदने का षड्यंत्र भाजपा और संघ परिवार प्रतिदिन करते हैं। वे नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान का जीता-जागता प्रतीक हैं, जो सत्ताधारियों को काँटे की तरह सबसे ज्यादा चुभता है। संघ परिवार देश की अर्थव्यवस्था और समाज में जानबूझकर जहर फैला रहा है ताकि देश विभाजित रहे और गिने-चुने लोग भय की बैसाखी के सहारे राज करते रहें‘‘।
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दीपक कुमार के पास इस सवाल का अत्यंत मनोहारी जवाब था कि उन्होंने स्वयं को मोहम्मद दीपक क्यों बताया। उन्होंने कहा, ‘मेरी जुबान पर सरस्वती बैठी थीं और इसलिए उस क्षण मेरे मुंह से मोहम्मद दीपक नाम निकल गया। मैंने सोचा था कि यह जानकर कि मैं हिन्दू हूं, माहौल शांत हो जाएगा। लेकिन उल्टे मेरे खिलाफ एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है’।

यह उम्मीद और कामना की जा सकती है कि समाज में हर्ष मंदर और दीपक कुमार जैसे और बहुत से लोग नज़र आएंगे जो असली आइडिया ऑफ़ इंडिया का प्रतिनिधित्व करते हों।

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)