नेशनल काउंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानी एनसीईआरटी एक किताब पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के करण चर्चा में आ गयी है, लेकिन उसकी किताबों में बदलाव को लेकर विवाद कई सालों से चल रहा है। आरोप है कि 2014 के बाद से एनसीईआरटी की किताबों का भगवाकरण करने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाज शास्त्र के साथ-साथ विज्ञान की किताबों को भी बदला जा रहा है।
यह विवाद तब तेज़ हो गया जब एनसीईआरटी ने महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े सन्दर्भों को अपनी किताबों से हटा दिया और मुगल काल के इतिहास को काफ़ी कम कर दिया। एनसीईआरटी का कहना है कि 2020-21 के कोविड प्रभावों के कारण छात्रों के बोझ को कम करने के लिए बदलाव किए गए। लेकिन इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इस तर्क को ग़लत बताया और कहा कि सारे बदलाव राजनीतिक कारणों से किए जा रहे हैं।
250 बुद्धिजीवियों ने लिखी थी चिट्ठी
एनसीईआरटी को लेकर एक बड़ा विवाद 2023 में सामने आया। 250 से अधिक इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विद्वानों ने पाठ्यपुस्तकों में बदलावों के खिलाफ एक खुला बयान जारी किया। इस बयान में उन्होंने कक्षा 12 की इतिहास की किताबों से मुगल दरबारों के इतिहास पर पूरा अध्याय हटाने, 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ, नक्सल आंदोलन, आपातकाल, दलित लेखकों के उल्लेख और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी सामग्री को हटाने की निंदा की। उन्होंने कहा कि ये बदलाव इतिहास की समझ को विकृत करते हैं और छात्रों को एक संपूर्ण दृष्टिकोण से वंचित करते हैं।
बयान पर रोमिला थापर, जयति घोष, मृदुला मुखर्जी, अपूर्वानंद, इरफान हबीब और उपिंदर सिंह जैसे प्रमुख बुद्धिजीवियों के हस्ताक्षर थे। उन्होंने आरोप लगाया कि ये चुन कर हटाए गए हिस्से शैक्षणिक ज़रूरतों से नहीं, बल्कि विभाजनकारी और पक्षपातपूर्ण राजनीतिक एजेंडा से प्रेरित हैं। ये बदलाव इतिहास को राजनीतिक रूप से प्रभावित करते हैं। एनसीईआरटी से हटाए गए हिस्सों को तुरंत वापस लेने की मांग की गई। लेकिन एनसीईआरटी ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
वैज्ञानिक दृष्टि पर प्रहार
2023 में 1800 से अधिक वैज्ञानिकों, विज्ञान शिक्षकों और शिक्षाविदों (टीआईएफआर, आईआईएसईआर, आईआईटी जैसे संस्थानों से) ने एनसीईआरटी को एक खुला पत्र लिखा, जिसमें कक्षा 9 और 10 की विज्ञान की किताबों से चार्ल्स डार्विन की जैविक विकास के सिद्धांत को हटाने की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह छात्रों को वैज्ञानिक सोच से वंचित करता है जो विकास की समझ, मानव विविधता, जीवाश्म और जीव विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों के लिए जरूरी है। बाद में, 4500 से अधिक प्रतिष्ठित लोगों ने एक और अपील पर हस्ताक्षर किए जिसमें कहा गया कि विकास के सिद्धांत को हटाना वैज्ञानिक तर्क के ख़िलाफ़ है और इससे अंधविश्वास बढ़ सकता है। यह छात्रों की वैज्ञानिक समझ को कमजोर करता है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के वैज्ञानिक स्वभाव को बढ़ावा देने के लक्ष्य के विपरीत है।
बुद्धिजीवियों ने मांग की कि इस सिद्धांत को पाठ्यक्रम में बहाल किया जाए, क्योंकि यह जीव विज्ञान की नींव है और दुनिया में हमारी जगह समझने के लिए ज़रूरी है। कोई कार्रवाई नहीं होने पर समाज शास्त्री योगेंद्र यादव और सुहास पल्शिकर ने एनसीईआरटी की किताबों से अपने नाम हटाने की मांग की। वो राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के मुख्य सलाहकार थे।
2024 में भी उन्होंने नए संस्करणों में नाम बने रहने पर क़ानूनी कार्रवाई की धमकी दी। उन्होंने कहा कि किताबों में बदलाव जैसे गुजरात दंगों, मुगलों के इतिहास और गांधी की हत्या से जुड़े संदर्भ को बिना उनकी सहमति या परामर्श के हटाया गया। ये बदलाव शैक्षणिक रूप से अनुचित, राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण और किताबों को विकृत बनाते हैं। वे ऐसी ‘अकादमिक रूप से असफल’ किताबों से जुड़े रहना नहीं चाहते, जो सत्ता को खुश करने के लिए हैं। एनसीईआरटी ने कहा कि किताबें सामूहिक प्रयास हैं। आपत्तिजनक सामग्री एनसीईआरटी की किताबों में अब भी मौजूद है।
लिंग आधारित भेदभाव
एनसीईआरटी की किताबों पर पहला बड़ा विवाद 2017 में सामने आया। तब आरोप लगा कि उनकी किताबें लिंग रूढ़िवादिता को बढ़ावा दे रही हैं। दो से पाँच तक की किताबों के विश्लेषण के बाद एक ग़ैर सरकारी संस्था, ‘एक्शन एड’ ने बताया कि किताबों में महिलाओं और लड़कियों को पारंपरिक घरेलू भूमिकाओं में दिखाया गया, जबकि पुरुषों को बाहर की गतिविधियों, नेतृत्व और पेशेवर भूमिकाओं में प्रमुखता दी गई। ये आरोप किताबों के आलेख, साज सज्जा और भाषा से जुड़े हैं, जो लिंग असमानता को बढ़ावा देते हैं।
साज सज्जा में 56% पुरुष के मुक़ाबले 20% महिलाएँ दिखाई गईं। पुरुषों को परिवार के मुखिया, बाहर काम करने वाले या पेशेवर के रूप में दिखाया गया, जबकि महिलाओं को घरेलू कामों जैसे खाना बनाना, बच्चे संभालना तक सीमित रखा गया। ये आरोप लंबे समय से चले आ रहे हैं। लेकिन 2017 की स्टडी ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया। किताबों में लिंग समानता को प्राथमिकता देने, क्लास 1 से लिंग शिक्षा शुरू करने, शिक्षकों को प्रशिक्षण देने और जेंडर-न्यूट्रल भाषा अपनाने की सिफारिश की गयी। 2022 में संसद की स्थायी समिति ने एनसीईआरटी को किताबों में जेंडर बायस और स्टीरियोटाइप्स का विश्लेषण करने और महिलाओं को नए पेशों में रोल मॉडल के रूप में दिखाने की सिफारिश की। एनसीईआरटी ने कहा कि वे नई नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क लाएंगे और किताबों में सभी लिंगों को समानता देंगे। लेकिन यह काम अब तक अधूरा पड़ा है।सबसे ख़तरनाक़
एनसीईआरटी ने प्रसिद्ध कवि अवतार सिंह पाश की कविता ‘सबसे ख़तरनाक़’ को हटाने की कोशिश, जो कट्टरवाद का विरोध करती है। लेखकों और शिक्षाविदों के भारी दबाव के बाद इसे पाठ्यक्रम में शामिल रखा गया। कक्षा 11 -12 तक की 182 किताबों में 1334 बदलाव किए गए। इसमें कई बदलाव साफ़ तौर पर बीजेपी को खुश करने की नियत से किए गए लगते हैं। एक किताब के एक चैप्टर का शीर्षक "एंटी-मुस्लिम गुजरात दंगे" से "गुजरात दंगे" में बदल दिया गया।
ए सोशल हिस्ट्री में क्रिकेट की कहानी, किसान और किसान (कक्षा 9), इंडो-चाइना में राष्ट्रवादी आंदोलन, शहरों में काम जैसे अध्याय हटा कर स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, डिजिटल इंडिया और जीएसटी जैसे अध्याय जोड़े गए। विज्ञान की पुस्तकों में पौराणिक कथाओं का मिश्रण करके उन्हें अवैज्ञानिक बनाने की कोशिश की गयी। कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने पर चैप्टर लाया गया। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। सेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता की आलोचना करने वाले नए चैप्टर लाए गए। मुगलों को क्रूर और औरंगजेब को मूर्ति तोड़ने वाला बताने वाले अध्याय जोड़े गए। देश विभाजन के लिए जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबेटन को दोषी ठहराने वाले लेख शामिल किए गए। शिक्षाविदों का कहना है कि बहुत सारी सामग्री ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। पाठ्यक्रम की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर बहस छिड़ी है लेकिन एनसीईआरटी सब कुछ अनसुनी करके एक ख़ास राजनीतिक एजेंडा पर बढ़ता दिखाई दे रहा है।