अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह कहना कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मिलने के लिए अधीन भाव से यह कहकर समय माँगा कि ‘क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ सर’, और इस पर मोदी की ओर से कोई खंडन न आना- यह अपमान सिर्फ़ मोदी का नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान का है। पहले ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि वॉशिंगटन की चिंताओं को दूर करने के लिए मोदी सरकार द्वारा रूस से तेल ख़रीद में भारी कटौती करना, मोदी के उन क़दमों का हिस्सा था जो ‘मुझे ख़ुश करने’ के लिए उठाए गए।
विदेश नीति का ठेका
ट्रम्प के ऐसे बयानों का न तो मोदी ने खंडन किया और न ही विदेश मंत्रालय ने। निस्संदेह, ये बयान भारत और उसके लोगों के लिए घोर अपमान हैं और किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं। मोदी से पहले किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसा भद्दा उदाहरण देखने को नहीं मिलता। इस अपमान को और बढ़ा दिया गया जब यह खुलासा हुआ कि वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने अमेरिका की एक लॉबिंग फ़र्म- एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी- को एक साल के लिए 1.5 लाख डॉलर की फ़ीस पर नियुक्त किया। यह फ़र्म डोनाल्ड ट्रम्प के एक पूर्व सलाहकार के नेतृत्व में है और इसका काम अमेरिकी नीति मामलों में भारत सरकार को ‘सहयोग’ देना था- जिसमें अमेरिकी विदेश मंत्रालय और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के अधिकारियों के साथ बैठकों, फ़ोन कॉल और ईमेल आदान–प्रदान की व्यवस्था करना शामिल था। इस फ़र्म ने भारतीय अधिकारियों की वॉशिंगटन डीसी यात्राओं के उच्चस्तरीय समन्वय में भी मदद की।
नेहरू का नज़रिया
भारत की विदेश नीति और कूटनीति को इस तरह बाहर ठेके पर देना, आज़ादी के बाद के दौर में कोई मिसाल नहीं मिलती। आज़ादी के बाद हमारी विदेश नीति की संरचना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उस दृष्टि पर आधारित थी, जिसे उन्होंने 1927 में- देश की आज़ादी से बीस साल पहले- अपने लेख “भारत के लिए एक विदेश नीति” में बड़ी स्पष्टता से रखा था।
उस लेख की शुरुआत में नेहरू लिखते हैं कि “भारत में हममें से कुछ लोगों को यह मूर्खतापूर्ण समय की बर्बादी लग सकती है कि हम भारत की विदेश नीति के बारे में कल्पनाएँ करें।” फिर भी, वे एक स्वतंत्र विदेश नीति पर ज़ोर देते हुए लिखते हैं— “हमें दुनिया की गतिविधियों और राजनीति को समझना होगा और उसी के अनुरूप अपनी राह तय करनी होगी। इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि हम अपने हितों या अपने काम करने के तरीक़ों को किसी दूसरे देश या संगठन के अधीन कर दें।”1927 में कही गई ये बातें आज़ादी से पहले भारत की गरिमा और स्वाभिमान को रेखांकित करती थीं। मोदी सरकार की उस विदेश नीति से चकनाचूर कर दी गई हैं, जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा के बजाय डोनाल्ड ट्रम्प को ख़ुश रखने के लिए गढ़ी गई लगती है।
नेहरू ने की थी स्वायत्तता की बात
नेहरू की यह सोच कि भारत अपने हितों या अपने काम करने के तरीक़ों को किसी भी दूसरे देश या संगठन के अधीन नहीं करेगा, आज़ादी के बाद से भारत की विदेश नीति का केंद्रीय सिद्धांत रही है। 1927 में नेहरू ने जिस स्वायत्तता की बात की थी, उसे 2025 में इस तरह त्याग दिया गया कि एक लॉबिंग फ़र्म को वह रोज़मर्रा का काम सौंप दिया गया, जो विदेश मंत्रालय और अमेरिका में भारतीय दूतावास की ज़िम्मेदारी है।
यहाँ नेहरू के शब्दों को याद करना ज़रूरी है, जब उन्होंने लिखा था कि भारत को “बाहर से किसी मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और न ही अपने देश के भीतर अपने प्रयासों को ढीला करना चाहिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि “हमें धीरे-धीरे ऐसे पुरुषों और महिलाओं का एक समूह तैयार करना चाहिए, जिन पर भरोसा किया जा सके कि वे विदेशों में भारत के हितों की सेवा करेंगे, जब यह शक्ति हमारे हाथों में आएगी।”
यह शक्ति 1947 में भारतीयों के हाथों में आई, और लगातार प्रधानमंत्रियों ने भारत के हितों की अच्छी तरह रक्षा की। मोदी इस कड़ी में एक अपवाद के रूप में उभरे हैं—जिनके दौर में भारत की विदेश नीति और वैश्विक हैसियत कमज़ोर पड़ी है।
10 फ़रवरी 1947 को न्यू रिपब्लिक को भेजे एक संदेश में नेहरू ने लिखा था— “एक ऐसी दुनिया में, जहाँ अब भी बहुत-सी आँखें ख़ून से लाल हैं, हमें साफ़ नज़र रखना होगा और व्यावहारिक होते हुए भी अपने आदर्शों को सामने रखना होगा।”
1947 की दुनिया में नेहरू द्वारा इस्तेमाल किया गया “ख़ून से लाल आँखें” का रूपक, आज डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा मोदी और भारत के अपमान के संदर्भ में और भी ज़्यादा अर्थपूर्ण हो जाता है।
नेहरू ने जिस साफ़ दृष्टि की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था, वही आज भारत की छवि और प्रतिष्ठा को बचाने के लिए ज़रूरी है।
विदेश नीति में जनता का महत्व
19 अक्टूबर 1954 को चीन के नेता माओ त्से-तुंग से बातचीत में नेहरू ने कहा था— “इस बात का कोई कारण नहीं कि यूरोप या अमेरिका को आधुनिक दुनिया का केंद्र माना जाए और एशिया को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। एशिया अनिवार्य रूप से भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े केंद्रों में से एक बनने जा रहा है, और जितनी जल्दी इसे स्वीकार किया जाए, उतना बेहतर है।”
जब माओ ने नेहरू से पूछा कि भारत इतनी ताक़त और दौलत रखने वाले अमेरिका का अनुसरण क्यों नहीं करता, तो नेहरू ने जवाब दिया— “भारत दुनिया के किसी भी देश से डरता नहीं है। भारत के महान नेता महात्मा गांधी ने भारतीयों को यही सिखाया था कि डरना नहीं चाहिए, और यही निडरता हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आज़ादी दिलाने में मददगार बनी।”
उन्होंने आगे कहा— “भारत डरता नहीं है और वही नीति अपनाता है, जिसे वह सही और न्यायपूर्ण मानता है।” नेहरू ने यह भी कहा कि धीरे-धीरे पश्चिमी देशों को यह समझना पड़ा कि सिर्फ़ पैसा ही सब कुछ नहीं होता। उन्होंने जोड़ा— “भारत और चीन—दोनों को मिलाकर—दुनिया की आबादी का लगभग एक अरब हिस्सा था, और आख़िरकार इंसान ही मायने रखते हैं।” माओ ने नेहरू से सहमति जताई और कहा कि सबसे ज़्यादा महत्व इंसानों का ही है।
प्रधानमंत्री मोदी, जो बार-बार भारत की मानवीय पूँजी और एक अरब से ज़्यादा आबादी का हवाला देते हैं, ट्रम्प के हुक्मों के आगे झुक गए हैं। उन्होंने भारत की विदेश नीति से इस क़दर समझौता किया है कि इससे देश की जनता और छवि—दोनों को नुक़सान पहुँचा है। भारत की प्रतिष्ठा को फिर से संभाला जा सकता है, अगर विदेश नीति को नेहरू की उसी दृष्टि पर टिकाया जाए, जिसने हमेशा वैश्विक मंच पर भारत का सम्मान बनाए रखा है।
(एस. एन. साहू भारत के पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन के विशेष कार्याधिकारी रह चुके हैं)