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पांच राफ़ेल पर इतराएं नहीं, वायुसेना की हालत खस्ता है!

रफ़ाल विमानों का स्क्वाड्रन गोल्डन एरो बन चुका है और जल्द ही यह ऑपरेशनल हो जाएगा। पर सच यह है कि वायुसेना में जितने नये विमान जोड़े जा रहे हैं उतने या उससे अधिक रिटायर होते जा रहे हैं क्योंकि भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन पुराने पड़ रहे हैं।
रंजीत कुमार

कई राजनीतिक विवादों में उलझा राफ़ेल लड़ाकू विमान अंततः बुधवार को भारतीय वायुसेना के अम्बाला एयरबेस पर नम्बर-17 गोल्डन ऐरो स्क्वाड्रन में शामिल हो गया। हालांकि सितम्बर, 2016 में फ्रांस से 36 राफ़ेल लड़ाकू विमानों का सौदा किया गया था लेकिन बुधवार को पांच विमानों की पहली खेप भारत पहुंची। बाकी विमानों की सप्लाई 2022 तक हो पाएगी। 

राफ़ेल विमानों के आने से भारतीय सामरिक हलकों की तुलना में मीडिया जगत में कुछ ज्यादा ही जोश और उत्साह है लेकिन समग्रता में भारत की वायुसेना की ताकत का आकलन किया जाए तो यह काफी चिंताजनक अहसास पैदा करता है। 

फ्रांस से पहुंचने वाले पांच राफ़ेल लड़ाकू विमानों की वजह से लद्दाख के सीमांत इलाकों में भारतीय वायुसेना की संहारक क्षमता में उल्लेखनीय इजाफा होगा लेकिन यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि पांच राफ़ेल विमानों की वजह से चीनी थलसेना और वायुसेना की कमर टूट जाएगी।

सरकारों का ख़राब रवैया

समग्रता में देखा जाए तो भारतीय वायुसेना को लड़ाकू विमानों के कम से कम 42 स्क्वाड्रन की ज़रूरत दो दशक पहले ही बताई गई थी लेकिन तब से लेकर आज तक सरकारों का रवैया टालमटोल करने वाला और बेरूखी का ही रहा है। यही वजह है कि भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन की संख्या घटकर 28 के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। 

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पांच राफ़ेल विमानों की ताजा खेप 2007 में शुरू की गई प्रक्रिया के तहत अब भारत पहुंचेगी। साफ है कि भारतीय रक्षा कर्णधारों के फ़ैसले लेने की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इस वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के साथ हम समझौता करने को मजबूर होते हैं।
राफ़ेल विमानों को खरीदने की सिफारिश फरवरी, 2012 में की गई थी और यदि वक्त पर इनकी ख़रीद का सौदा सम्पन्न हो जाता तो आज भारतीय वायुसेना के बेड़े में केवल पांच नहीं कुल 120 लड़ाकू विमान शामिल होते।

अब जाकर चेते रक्षा कर्णधार 

आज जब लद्दाख सीमा पर चीन के साथ सैन्य तनातनी और युद्ध जैसा माहौल बनने लगा है, तब जाकर भारतीय रक्षा कर्णधारों को भारतीय सेनाओं को ज़रूरी शस्त्र प्रणालियों को सौंपने की ज़रूरत समझ में आई है और यही वजह है कि जैसे 1999 में करगिल युद्ध के दौरान सैन्य साजो-सामान और हथियारों की आपात ख़रीद की गई थी, इस बार भी चीन के साथ चल रही तनातनी के माहौल में लड़ाकू विमानों और अन्य शस्त्र प्रणालियों की आपात खरीद की जा रही है। 

हैरानी इस बात की है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े हितचिंतक होने का दावा करने वाली मौजूदा सरकार के कार्यकाल में ही भारतीय सेनाओं को हथियारों की आपात ख़रीद करनी पड़ रही है।

रिटायर ज़्यादा हो रहे विमान 

भविष्य के किसी भी युद्ध में वायुसेना की अहम भूमिका होगी। इसलिए वायुसेना की ताकत को गिरते देखना राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के साथ खिलवाड़ ही कहा जाएगा। सामरिक हलकों में यह सवाल पूछा जाता है कि आखिर क्यों वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन लगातार कम होते जा रहे हैं। सच्चाई यह है कि वायुसेना में जितने नये विमान जोड़े जा रहे हैं उतने या उससे अधिक रिटायर होते जा रहे हैं क्योंकि भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन पुराने पड़ रहे हैं।

यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से वायुसेना के स्क्वाड्रनों की संख्या 28 के करीब चल रही है। इतनी क्षमता से पाकिस्तान और चीन के मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी पड़ी तो भारतीय सेनाओं  को सदमे झेलने होंगे। अगले दो सालों में भारतीय वायुसेना में तीन नये स्क्वाड्रन जोड़े जाने की उम्मीद है लेकिन इस दौरान पुराने पड़ चुके तीन में से मिग-21 विमानों के एक स्क्वाड्रन को रिटायर करना होगा।

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास सुखोई-30, एमकेआई विमानों के 12 स्क्वाड्रन, मिग-29 यूपीजी के तीन स्क्वाड्रन, छह जगुआर स्क्वाड्रन, तीन मिराज-2000 स्क्वाड्रन, एक तेजस स्क्वाड्रन और तीन मिग-21 स्क्वाड्रन हैं। एक स्क्वाड्रन में 16 से 20 लड़ाकू विमान होते हैं।

2007 में जब वायुसेना के लिए 120 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) लेने की प्रकिया शुरू की गई थी, तब से केवल सुखोई-30 एमकेआई विमानों के स्क्वाड्रन ही जोड़े गए हैं। लेकिन वायुसेना के बेड़े में शामिल मिग-21, मिग-27 और मिग-23 विमानों के बेड़ों को पुराने होने की वजह से रिटायर करना पड़ा। इसलिए स्क्वाड्रनों की संख्या 28 से 30 के बीच बनी रही।

अब अगले दो सालों में राफ़ेल के पूरे दो स्क्वाड्रन वायुसेना के बेड़े में शामिल हो जाएंगे। इसके अलावा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस का एक और स्क्वाड्रन जोड़ा जाएगा। 

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वायुसेना में निराशा

2016, सितम्बर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन 36 राफ़ेल लड़ाकू विमानों का ऑर्डर फ्रांस को दिया था, वह वायुसेना के 120 लड़ाकू विमानों के  मूल खरीद के प्रस्ताव को रद्द करके किया गया था। तब कहा गया था कि इसके बदले 110 लड़ाकू विमान देश में ही किसी विदेशी साझेदार के सहयोग से बनाए जाएंगे और वायुसेना को मुहैया कराए जाएंगे। 

इस प्रस्ताव को मंजूरी दिए चार साल बीत चुके हैं लेकिन इसे लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। वायुसेना निराश हो चुकी है और सरकार के फ़ैसले की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही है। जब तक इस प्रस्ताव को लागू नहीं किया जाता  है तब तक वायुसेना को नये लड़ाकू विमान नहीं मिल सकेंगे। 

साफ है कि आने वाले सालों में वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रनों की संख्या मौजूदा संख्या के आसपास ही बनी रहेगी। 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन का लक्ष्य हासिल करना वायुसेना के लिए एक मरीचिका ही बना रहेगा।

पांचवीं पीढ़ी के विमान ज़रूरी

इस कमी को दूर करने के लिए वायुसेना को  स्वदेशी एलसीए तेजस पर अपनी समर नीति तय करनी होगी लेकिन एलसीए तेजस आज की रणनीतिक ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकेगा। भारतीय वायुसेना को चाहिए, राफ़ेल से भी अधिक उन्नत पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान जो कि चीन हासिल करने लगा है। 

वायुसेना को भरोसा दिलाया गया है कि वह देश में विकसित हो रहे एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) की प्रतीक्षा करे। लेकिन इसके कामयाब होने में कम से कम एक दशक का वक्त लग सकता है। तब तक भारतीय वायुसेना क्या अपने मौजूदा सीमित स्क्वाड्रनों पर ही संतोष करे? 

पाकिस्तान और चीन का रवैया जिस तरह भारत के ख़िलाफ़ लगातार उग्र होता जा रहा है उसके मद्देनजर भारतीय वायुसेना को अपने हाल पर छोड़ देना देश की सुरक्षा के साथ जोखिम मोल लेने के बराबर होगा।

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रंजीत कुमार
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