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राहुल और रायबरेली के रिश्ते की बुनियाद में शहीदों का ख़ून शामिल है!

“वे बहादुर लोगों की तरह शांत और संकट के सामने अविचलित रहे। उन्हें क्या लग रहा था कि मैं नहीं जानता, पर मेरी भावनाएँ मुझे मालूम थीं। एक क्षण के लिए मेरा ख़ून खौल उठा, मैं अहिंसा मानो भूल गया- पर एक क्षण के लिए ही। उस महान नेता का स्मरण जो कि ईश्वर की कृपा से हमें विजय की ओर ले जाने के लिए भेजा गया है, मुझे आया, और मैंने देखा कि जो किसान मेरे साथ खड़े हैं या बैठे हैं वे कम उत्तेजित हैं, अधिक शांत हैं, मुझसे भी अधिक और कमज़ोरी का क्षण दूर हो गया। मैंने उनसे अहिंसा के बारे में अत्यंत विनम्रता से बोला- मैं, जिसे ख़ुद इसका पाठ उनसे भी अधिक ज़रूरी था- और वे मुझे ध्यान से सुनते रहे और शांति से बिखर गये। नदी के उस पार, ज़रूर आदमी मरे पड़े था या मर रहे थे। वैसी ही यह भीड़ थी, वैसा ही उनका मक़सद था। फिर भी उन्होंने अपने दिल का ख़ून बहा दिया, तिलबिला होने के पहले ही।”

-जवाहरलाल नेहरू-“ द रायबरेली ट्रैजडी” द इंडिपेंडेंट, 22 जनवरी, 1921
 

नेहरू जी की यह रिपोर्ट 7 जनवरी 1921 की उस घटना के बारे में है जिसे गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने अख़बार प्रताप में दूसरा जलियाँवाला बाग़ कांड कहा था। यह रायबरेली का मुंशीगंज गोलीकांड था। शहर से सट कर बहने वाली सई नदी के पुल पर अंग्रेजों के गुर्गे ज़मींदार वीर पाल सिंह के सिपाहियों ने आंदोलनकारी किसानों को भून दिया था। दर्जनों किसान शहीद हुए थे। सई का पानी लाल हो गया था। असहयोग आंदोलन की पूर्वपीठिका बतौर अवध का किसान आंदोलन बाबा रामचंदर और मदारी पासी जैसे जननायकों के नेतृत्व में लंदन तक को हिला रहा था। तमाम किसान इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू से मिले थे और उन्होंने अपने विलायत पटल बेटे जवाहर को उन्हें सौंप दिया था। रायबरेली, प्रतापगढ़ सहित आसपास के तमाम ज़िलों में ज़मींदारों के अत्याचार के ख़िलाफ़ चल रहा ये आंदोलन जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक दीक्षाभूमि बनी। वे जाड़ा, गर्मी और बरसात की परवाह किये बिना गाँव-गाँव पैदल घूम रहे थे और उनके मन में आज़ाद भारत में ज़मींदारी उन्मूलन का विचार घर करता जा रहा था।

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राहुल गाँधी उसी विरासत को सँभालने रायबरेली पहुँचे हैं। इस विरासत की बुनियाद में शहीदों का ख़ून है। आज़ादी के बाद इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की शहादत ने इस बुनियाद की तराई की है। जो लोग यह नहीं जानते वे हैरान रहते हैं कि आख़िर ऐसा क्या है नेहरू-गाँधी परिवार में कि उनके आते ही जनता ख़ुद मोर्चे पर उतर पड़ती है। रायबरेली के हज़ारों घरों में किसी बुज़ुर्ग और इस परिवार के किसी व्यक्ति की फ़्रेम में लटकी तस्वीर से निकलने वाली ऊर्जा का उन्हें अहसास नहीं हो पाता।

रायबरेली की जनता कई बार हैरान पत्रकारों से पूछती है कि देश का कोई दूसरा परिवार बताओ जिसका हर सदस्य आज़ादी के आंदोलन में जेल गया हो? पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी? बेटी-दामाद भी? जिसने इलाहाबाद का स्वराज भवन और आनंद भवन जैसी विशाल संपत्ति देश पर क़ुर्बान कर दी हो? रायबरेली वाले कहते हैं कि स्वराज भवन तब कांग्रेस का अखिल भारतीय मुख्यालय बना था जब अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत बड़ों-बड़ों को नहीं होती थी। आज जो दूसरों को राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट बाँटते हैं, उनके वैचारिक पुरखे तब अंग्रेज़ों के चरणों में लोट रहे थे। आज़ादी के बाद भी इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने शहादत दी। ऐसा कोई दूसरा परिवार देश में हो तो बताओ? यह सत्ता का नहीं, संघर्ष और शहादत का परिवारवाद है! आज भी आज़ादी के आंदोलन के दौरान लिये गये संकल्पों को पूरा करने की जैसी ज़िद इस परिवार में दिखती है, दूसरे किसी में नहीं। राहुल गांधी जब मोहब्बत का पैग़ाम लेकर पूरे भारत को पैदल नाप देते हैं तो रायबरेली के लोग रोमांचित हो उठते हैं। उन्हें लगता है कि इस यज्ञ में वे भी आहुति दे रहे हैं। रायबरेली गाँधी परिवार के लोगों के लिए स्वराज भवन और आनंद भवन जैसा है। 

गाँधी परिवार भी इस रिश्ते को बख़ूबी समझता है। फ़ीरोज़ गाँधी ने संसदीय राजनीति की शुरुआत रायबरेली से की थी। बाद में यह इंदिरा गाँधी का क्षेत्र बना। उस दौरान अवध के इस बेहद पिछड़े इलाक़े के विकास की जो बुनियाद डाली गयी, उसका असर ये है कि सोनिया गाँधी तक आते-आते आज यहाँ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) है और रेल कोच कारख़ाना भी। इंजीनियरिंग कॉलेज ही नहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) भी है। अपने तरह का इकलौता पायलट ट्रेनिंग सेंटर खुले तो ज़माना हो गया। इस परिवार की सत्ता से दूरी का भुगतान भी रायबरेली को करना पड़ा। बीती सदी के सत्तर के दशक में रायबरेली की पहचान बनने वाली आईटीआई जैसी बड़ी फ़ैक्ट्री समेत कई परियोजनाएँ बंद हो गयीं या लटका दी गयीं।  
1977 के इमरजेंसी विरोधी लहर को छोड़ दें तो गाँधी परिवार कभी रायबरेली सीट से पराजित नहीं हुआ है।

इंदिरा गाँधी की हार बड़े आश्चर्य की तरह थी और हराने वाले इस क़दर दुखी थे कि कुछ महीने बाद ही हुए विधानसभा चुनाव में रायबरेली की सातों विधानसभा सीटें उन्होंने कांग्रेस की झोली में डाल दी थीं। देश में इंदिरा गाँधी की वापसी 1980 में हुई थी लेकिन रायबरेली में कांग्रेस की वापसी 1977 में ही हो गयी थी। 1980 में इंदिरा गाँधी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा था। रायबरेली और आँध्रप्रदेश के मेडक, दोनों सीटों से जीती थीं, लेकिन रायबरेली सीट बाद में उन्होंने छोड़ दी। रायबरेली वालों को आज भी लगता है कि अगर 1977 में ग़लती न हुई होती तो इंदिरा जी लगातार यहाँ की प्रतिनिधि रहतीं और इस क्षेत्र की तरक़्क़ी बेमिसाल होती।

सोनिया गाँधी ने जब चुनावी राजनीति से अलग होने का ऐलान किया तो रायबरेली के नाम एक भावुक पत्र लिखा था। रायबरेली को अपनी 'ससुराल से मिले सौभाग्य' की तरह याद करते हुए उन्होंने इस पत्र की आख़िरी लाइन में विश्वास जताया था, "मुझे पता है कि आप हर मुश्किल में मुझे और मेरे परिवार को वैसे ही सँभाल लेंगे जैसे अब तक सँभालते आये हैं।”


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इस पत्र से ही स्पष्ट हो गया था कि गाँधी परिवार का ही कोई व्यक्ति सोनिया गाँधी की विरासत सँभालेगा। ज़्यादा उम्मीद प्रियंका गाँधी की थी। लेकिन ख़बर है कि प्रियंका गांधी ने फ़िलहाल संगठन और प्रचार को प्राथमिकता दी है। बहुत लोग निराश हैं कि राहुल गाँधी अमेठी से नहीं लड़े। ये शुभचिंतक स्मृति ईरानी की हार देखने का 'सुख' लेना चाहते थे। लेकिन बड़े राजनीतिक लक्ष्य और लड़ाइयाँ, स्कूली लड़कों वाली मानसिकता से नहीं साधी जातीं जो पिछली लड़ाई को निपटाने के लिए अपने साथियों के साथ अगली गली में किसी का इंतज़ार करते रहते हैं। वैसे भी, जो महिला भरी लोकसभा में राहुल गाँधी पर अभद्र इशारे करने का आरोप लगाकर सनसनी मचा सकती है, इस सिलसिले में तमाम महिला सांसदों से हस्ताक्षर करा के लोकसभा अध्यक्ष को शिकायती पत्र दे सकती है और फिर कई दिनों तक मीडिया कवरेज लूटकर शिकायत को भुला देती है, वह राहुल गाँधी के सामने होने पर मीडिया को कैसा-कैसा मसाला देती, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। राहुल चुनाव तो आसानी से जीत जाते लेकिन कांग्रेस महँगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक न्याय के जिन मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी बहस चाहती है वह मीडिया के ज़रिये 'किसने किसकी भैंस खोल ली' पर ला पटकी जाती।

कांग्रेस ने किशोरी लाल शर्मा को अमेठी से उतारकर स्मृति ईरानी को उचित जवाब दिया है। किशोरी लाल शर्मा इस इलाक़े के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हैं। वे राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रबंधन सँभालते आये हैं। क़रीब चालीस साल से यही काम कर रहे हैं। दोनों क्षेत्रों के एक-एक कार्यकर्ता से निजी रूप से जुड़े हैं। अमेठी की जनता जिस तरह स्मृति ईरानी से नाराज़ है, उसे देखते हुए किशोरी लाल शर्मा को जीतने में कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। अमेठी भी 1977 की रायबरेली की तरह पश्चाताप करने को बेक़रार है।
 


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उधर, प्रियंका गाँधी भी इस चुनाव की एक उपलब्धि हैं। उनके भाषणों की व्यापक अपील हो रही है। चुनाव न लड़कर वे इस भूमिका को ज़्यादा प्रभावी बना रही हैं। गाँधी परिवार पर निजी हमले में जुटे प्रधानमंत्री मोदी को प्रियंका गाँधी के भाषण ख़ासा परेशान कर रहे हैं। मंगलसूत्र वाले मोदी के आरोप पर प्रियंका गाँधी का पलटवार पूरी बीजेपी तिलमिला उठी थी। आम लोग भी मंगलसूत्र और मोदी के रिश्ते की व्याख्या करने लगे थे। इधर प्रियंका गाँधी का एक और भाषण वायरल हो रहा है जो उन्होंने 2 मई को मुरैना की जनसभा में दिया। प्रियंका गाँधी ने कहा, “जब मोदी जी मंच पर खड़े होकर मेरे पिता को देशद्रोही बोलते हैं… बोलते हैं कि मेरे पिता ने कोई क़ानून बदल दिया अपनी माँ से विरासत लेने के लिए... मोदी जी इस बात को समझ नहीं पायेंगे कि मेरे पिता को विरासत में धन-दौलत नहीं, शहादत की भावना मिली।…..वे मेरे परिवार को देशद्रोही कहें, घर से निकाल दें, संसद से निकाल दें, कुछ भी कर लें, लेकिन ये भावना हमारे दिल से कोई नहीं निकाल सकता।”

प्रियंका गाँधी की आँखें ये सब कहते हुए भीग गयी थीं जिसे देखकर जनता भी स्वत:स्फूर्त ढंग से 'राजीव गाँधी अमर रहें’ का नारा लगाने लगी! मुरैना की यह प्रतिक्रिया रायबरेली में कई गुना होकर गूँज रही है। मोदी जी का हर निजी हमला रायबरेली की जनता और इस परिवार के रिश्ते को थोड़ा और मज़बूत कर देता है जिसे राहुल गाँधी के रूप में नया नाम मिल गया है।

(लेखक कांग्रेस से जुड़े हैं)

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पंकज श्रीवास्तव
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