कृषि विधेयकों पर राज्यसभा में समूची सरकार फँसी हुई थी, ऐसे में हरिवंश उसके संकटमोचक बन कर उभरे हैं। उन्होंने सदन की तरफ़ बिना आँख उठाए एक झटके में उस सरकार को उबार दिया जिसकी साँस अटकी हुई थी। यह कोई मामूली बात तो नहीं है।
प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की उस रपट के ख़िलाफ़ हरिवंश ने ज़ोरदार लेख लिखा और नीतीश कुमार की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय छवि पर ठीक से रौशनी डाली थी। कोई और पत्रकार होता तो उसके इस लिखे को जनसंपर्क पत्रकारिता ही तो कहा जाता।
इस समय जब समूची सरकार फँसी हुई थी ऐसे में हरिवंश उसके संकटमोचक बन कर उभरे हैं। वर्ना क्या उन्हें राज्यसभा का गणित नहीं पता था। बिलकुल पता था। अकाली दल का भी रुख पता था और बीजू जनता दल का भी।