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जोशी की हत्या में साध्वी प्रज्ञा का हाथ? फिर होगी जाँच

सुनील जोशी आरएसएस के प्रचारक थे। 29 दिसंबर 2007 को मध्य प्रदेश के देवास ज़िले में उनकी हत्या कर दी गई थी। क़रीब 9 साल तक विभिन्न एजेंसियों द्वारा इस मामले की जाँच की गई लेकिन 2017 में अदालत ने प्रज्ञा समेत सभी अभियुक्तों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। अब कमलनाथ सरकार ने एक बार फिर इस मामले की जाँच कराने का फ़ैसला किया है। 
नीरेंद्र नागर

क्या आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या से जुड़ा रहस्य आख़िरकार सामने आएगा? मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार के ताज़ा फ़ैसले से इस बात की उम्मीद जग रही है। राज्य की कांग्रेस सरकार में मंत्री पी. सी. शर्मा ने बताया है  कि जोशी हत्याकांड की बंद फ़ाइल को फिर से खोला जाएगा। राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी मंगलवाल को इसकी पुष्टि कर दी। बता दें कि जोशी हत्याकांड में मालेगाँव धमाके की मुख्य अभियुक्त और भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर सहित आठ लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चला था लेकिन 2017 में आए फ़ैसले में सभी को बरी कर दिया गया था। अब राज्य में कांग्रेस की सरकार है और उसे लगता है कि जोशी हत्याकांड में ठीक से जाँच नहीं हुई, इसलिए वह मामले की फ़ाइल फिर से खुलवाकर नए सिरे से जाँच करवाने को सोच रही है। सरकार देवास की कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट भी जा सकती है।
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आइए, आज हम जानते हैं कि क्या है सुनील जोशी की हत्या का मामला और हत्या के 12 साल बाद भी इस पर रहस्य क्यों बना हुआ है।

संघ प्रचारक की हत्या और संदेह एक साध्वी पर

सुनील जोशी आरएसएस के प्रचारक थे जिनकी 29 दिसंबर 2007 को मध्य प्रदेश के देवास ज़िले में उनके घर के पास हत्या कर दी गई थी। बाइक पर सवार दो लोगों ने उनपर गोलियाँ बरसाईं जिससे उनका निधन हो गया। क़रीब 9 साल तक विभिन्न एजेंसियों द्वारा जाँच की गई लेकिन 2017 में अदालत ने प्रज्ञा समेत सभी अभियुक्तों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। ऐसा फ़ैसला तब आया जबकि एक अभियुक्त लोकेश शर्मा के पास से हत्या में इस्तेमाल किए गए दोनों हथियार तक बरामद हो गए थे। आप समझ सकते हैं कि जब हत्यारा भी पकड़ा गया और हथियार भी, तब भी अदालत यह कह रही है कि पुलिस ने उसे सज़ा दिलाने लायक सबूत कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए।
आइए, समझते हैं कि सुनील जोशी हत्याकांड की जाँच इन 9 सालों मे किस तरह अढ़ाई कोस ही चली। सुनील जोशी महू ज़िले में आरएसएस के प्रचारक थे और थोड़े हिंसक विचारों के माने जाते थे। 2003 में इंदौर में कांग्रेस के आदिवासी नेता प्यार सिंह निनामा और उनके भतीजे दिनेश निनामा की हत्या में उनका भी नाम आया था और तबसे वह फ़रार चल रहे थे। पुलिस उनको खोज नहीं पा रही थी लेकिन वह अपना 'काम' बड़े आराम से कर रहे थे।
जोशी लंबे समय तक समझौता धमाके के मुख्य अभियुक्त असीमानंद के गुजरात स्थित शबरी आश्रम में भी रहे और 2006 के मालेगाँव धमाके, 2007 के समझौता धमाके, मक्का मस्जिद कांड और अजमेर शरीफ़ कांड में उनका नाम आया था। ख़ुद असीमानंद ने कैरवैन की पत्रकार लीना गीता रघुनाथ के साथ अपने इंटरव्यू में यह बात मानी है कि ‘जोशी ही मेन था’। पढ़ें बातचीत का हिस्सा।
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लीना : प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी आपसे किसलिए मिलने आए?

असीमानंद : प्रज्ञा पहले मिलने आई, सुनील जोशी बाद में आया। जब 1998 में मेरे बारे में ख़बरें छपीं (कि मैं ईसाइयों को हिंदू बना रहा हूँ) और उनको लगा कि संघ का कोई बंदा यह काम कर रहा है तो उनको लगा कि उनको मुझसे मिलना चाहिए। वह (जोशी) मध्य प्रदेश में हुए एक मर्डर के केस में फ़रार चल रहा था। इसलिए मैंने उससे कहा कि मेरे आश्रम में आओ और आराम से रहो। उस समय प्रज्ञा आश्रम के कामकाज़ में हिस्सा बँटा रही थी और अक़सर आया करती थी। सुनील जोशी ने सारी प्लानिंग की। मेन वही है। बाद में तो उसकी हत्या ही हो गई।

जोशी की हत्या हो गई लेकिन उनकी हत्या क्यों हुई, यह आज तक रहस्य बना हुआ है। जाँच एजेंसियों ने अलग-अलग समय में तीन कोणों से इसकी जाँच की। मध्य प्रदेश पुलिस ने इस दिशा में जाँच शुरू की कि शायद पाकिस्तानी एजेंसी या सिमी के लोगों ने जोशी की हत्या करवाई है क्योंकि वह संघ से जुड़े हुए थे और हिंदुत्व के लिए काम करते थे। लेकिन हरियाणा में  समझौता धमाके की जाँच कर रहे स्पेशल जाँच दल को ट्रेन से फटने से रह गया जो एक सूटकेस मिला था, वह अलग ही कहानी कह रहा था। 

जाँच दल को पता चला कि यह सूटकेस जो इंदौर में बना था, वह किसी मुसलिम ने नहीं बल्कि हिंदू ने ख़रीदा था। सूटकेस में मिला सिम जिसने बेचा था, वह भी संघ से जुड़ा व्यक्ति निकला।
आगे की जाँच से यह भी पता चला कि सुनील जोशी और दो और लोगों ने ही धमाके की सारी योजना बनाई थी। लेकिन जब तक पुलिस जोशी तक पहुँच पाती, तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी।सुनील जोशी की हत्या के बाद उनके घर में रह रहे दो युवक फ़रार हो गए। पुलिस को लगा, हो न हो, इन्हीं दोनों ने उनकी हत्या की है। उसकी पूरी जाँच उसी दिशा में चली। लेकिन जैसा कि असीमानंद ने लीना को बताया, पुलिस ग़लत दिशा में जा रही थी।
असीमानंद : सबसे पहले सुनील जोशी मर्डर केस में प्रज्ञा मेन पार्टी थी। हर्षद (उर्फ़ राज) सोलंकी भी उसमें शामिल था। हर्षद और मेहुल, सुनील जोशी के घर में रहते थे। दोनों बेस्ट बेकरी वाले मामले में फ़रार थे। चूँकि मध्य प्रदेश में उनको कोई ख़ास परेशान नहीं करता था, इसलिए सुनील जोशी उनको वहीं रखता था। लेकिन सुनील जोशी की हत्या के बाद हर्षद और मेहुल वहाँ से भाग गए क्योंकि वे दोनों वहाँ दूसरे नाम से रह रहे थे। दोनों को डर था कि अगर उनसे पूछताछ हुई तो उनके (दूसरे मामले में) फ़रार होने का भेद खुल जाएगा। उधर, पुलिस को लगा कि जोशी की हत्या के बाद ही ये फ़रार हुए हैं तो ज़रूर मर्डर में इन्हीं का हाथ है। लेकिन मर्डर का कारण क्या है? क्योंकि प्रज्ञा ने उनको बोला। और हर्षद और मेहुल दोनों पर मर्डर का आरोप लगा। प्रज्ञा को भी मुंबई से लाकर भोपाल जेल में रखा गया।
तीन साल की जाँच के बाद, दिसंबर 2010 में पुलिस ने इस मामले में पहली गिरफ़्तारी की और फ़रार हर्षद सोलंकी को पकड़ा। दो महीने बाद पुलिस ने चार और लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की जिसमें प्रज्ञा का भी नाम था। प्रज्ञा उस समय मालेगाँव धमाके में नाम आने के कारण न्यायिक हिरासत में थीं। इसके छह महीने बाद नवंबर 2011 में एनआईए ने जाँच अपने हाथ में ले ली क्योंकि उसे लग रहा था कि सुनील जोशी की हत्या का मामला समझौता धमाके से जुड़ा हुआ है। जैसा कि हम जानते हैं, हरियाणा पुलिस ने समझौता धमाके से सुनील जोशी के संबंध का पता लगा ही लिया था।

जाँच में हत्यारा कोई और निकला

नवंबर 2011 के बाद एनआईए ने मामले की नए सिरे से जाँच की और इस सिलसिले में राजेंदर चौधरी और लोकेश शर्मा को पकड़ा। ये दोनों सुनील जोशी के साथी व सह-साज़िशकर्ता थे और समझौता धमाके और दूसरे मामलों में उन दिनों न्यायिक हिरासत में थे। लोकेश शर्मा ने एनआईए को वे दोनों हथियार उपलब्ध करवाए जिनसे सुनील जोशी को मारा गया और फ़ॉरेंसिक जाँच में भी वे सही पाए गए।
असीमानंद ने भी जोशी की हत्या में लोकेश का हाथ होना स्वीकार किया था। सुनिए, वह इंटरव्यू में क्या कहते हैंअसीमानंद : एनआईए को लगा कि हर्षद ने उसको नहीं मारा है। अपनी जाँच के आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इसमें लोकेश और राजिंदर का हाथ है। उसके बाद वे लोकेश को मध्य प्रदेश लेकर गए।…उसकी पत्नी ने माना कि वह जानती थी कि लोकेश (सुनील का) मर्डर करने वाला है और मर्डर के बाद भी उसने बताया कि यह मैंने किया। एनआईए ने उसकी पत्नी को गिरफ़्तार नहीं किया था, बस उसको कस्टडी में रखा था। सेक्शन 120 में उसका यह काम एक क्राइम था, क्योंकि वह जानती थी (कि मर्डर होने वाला है) और यह उसने माना भी है कि वह जानती थी। इसलिए जब उसे पता चला कि उसकी पत्नी को गिरफ़्तार करने वाले हैं तो उसने अपना अपराध क़बूल कर लिया - एक ऐसे आदमी ने जिसको इतना मारने के बाद भी एनआईए नहीं तोड़ पाई थी। उन्होंने उसको बोला कि तुमको उस रिवॉल्वर का पता बताना होगा नहीं तो हम तुम्हारी पत्नी को गिरफ़्तार कर लेंगे। अगर तुम रिवॉल्वर बरामद करने में हमारी मदद नहीं करोगे तो (सेक्शन) 120 के अंदर तुम्हारी पत्नी के ख़िलाफ़ केस कर देंगे - तकनीकी रूप से ऐसा हो सकता है। इसीलिए 6 साल बाद उनको वह रिवॉल्वर मिली - 2007 में जोशी का मर्डर हुआ था और 2013 में रिवॉल्वर बरामद हुई। 6 साल बाद भी रिवॉल्वर वहीं थी और उसका भाई जितेंद्र शर्मा सबकुछ जानता था।
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एनआईए को हत्यारे मिल गए, हथियार भी मिल गए लेकिन हत्या की वजह क्या थी, इसपर उसका अलग ही निष्कर्ष था। एनआईए की चार्जशीट के अनुसार, राजेंदर चौधरी और लोकेश शर्मा ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर के निर्देश पर और उनकी जानकारी में जोशी की हत्या की क्योंकि जोशी ने प्रज्ञा के साथ ‘दुराचार करने का प्रयास’ किया था।

आगे बढ़ने से पहले हम ज़रा याद कर लें कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सुनील जोशी के बीच कैसे संबंध थे और ऐसे संबंधों के बाद क्या कोई किसी की हत्या करवा सकता है।
असीमानंद के अनुसार दोनों ही उनके आश्रम में साथ-साथ रहते थे और उनको साथ काम करते देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। पढ़िए, लीना को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने दोनों के बारे में क्या कहा

लीना : प्रज्ञा जी और सुनील जोशी - इनका अच्छा परिचय था?

असीमानंद : परिचय - कोई-कोई बोलते थे उनके बारे में। पर मैंने नहीं देखा। दोनों साथ रहते थे। उनको साथ में काम करते देखकर अच्छा लगता था।

ध्यान दीजिए असीमानंद की बात पर -  दोनों साथ रहते थे। सोचने की बात है कि दो लोग जो सालों से साथ रहते थे, उनके बीच अचानक ऐसा क्या हो गया कि जिसकी सज़ा मौत ही हो सकती है? वह भी ऐसे इंसान की जो हिंदुओं के एक बड़े अभियान में जुटा हुआ था और जिसने 2006 और 2007 में देश के कई मुसलिम-बहुल इलाक़ों और धर्मस्थलों में धमाके कर इस्लामी आतंकवाद को चुनौती देने का काम किया था।

जोशी की हत्या प्रज्ञा के साथ ‘दुराचारी व्यवहार’ करने के कारण हुई थी या उनका मुँह बंद करने के लिए, यह अभी तक पता नहीं चला है। एनआईए ने मई 2014 में (महीने और साल पर ग़ौर कीजिए) इस निष्कर्ष के साथ यह केस बंद कर दिया कि हत्या का कारण निजी है और इसका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं है। अब जिस मामले का आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं हो, उसकी जाँच करना एनआईए के काम के दायरे में आता ही नहीं है। फलतः यह मामला सितंबर 2014 में फिर से देवास की मजिस्ट्रेट कोर्ट में आ गया। जाँच फिर से मध्य प्रदेश पुलिस के हवाले हुई और उसने दो साल में जो ‘काम’ किया, उसका नतीजा यह निकला कि हत्यारे की पहचान और हथियारों की बरामदगी के बावजूद सारे अभियुक्त बरी हो गए।

फ़रवरी 2017 में दिए गए फ़ैसले में अतिरिक्त ज़िला और सेशन जज राजीव आप्टे ने कहा कि ‘मध्य प्रदेश पुलिस और एनआईए ने इस मामले की जाँच पूरी गंभीरता से नहीं की। क्यों नहीं की, इसका कारण वही बता सकते हैं।’
कोर्ट के मुताबिक़ दोनों एजेंसियों ने परस्पर-विरोधी प्रमाण पेश किए जिसका असर यह हुआ कि अभियोजन पक्ष द्वारा अभियुक्तों पर लगाए गए आरोप शक के घेरे में आ गए। कोर्ट ने कहा कि ये सबूत अभियुक्तों को दोषी साबित करने के लिए अपर्याप्त हैं।अब जब मध्य प्रदेश की नई सरकार मामले को फिर से खोलने जा रही है तो उम्मीद है कि सुनील जोशी की हत्या पर से रहस्य का पर्दा हटेगा। उम्मीद इसलिए भी बनती है कि हत्यारों के बारे में जानकारी है और हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियारों की भी। यदि हत्यारों से फिर से पूछताछ की जाए और सबूतों को कोर्ट में पेश किया जाए तो 12 साल से पर्दे में छुपे इस राज़ का पर्दाफ़ाश हो सकता है।
नीरेंद्र नागर
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