चंद्रयान-3 की लैंडिंग दिखाने के लिए तमाम टीवी चैनलों ने जिस तरह से तमाशे किये, ऐंकरों ने जिस तरह चीख़ चिल्लाहट मचायी, उसने विज्ञान की इस अहम घटना को ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट मैच से जुड़े जीत-हार के उन्माद में बदल दिया। जबकि अगर यह मिशन असफल भी हो जाता तो कोई हार नहीं होती। विज्ञान हर असफलता की बारीक़ समीक्षा करके नयी राह खोजने का नाम है। चार साल पहले चंद्रयान-2 की असफलता में वो सबक़ छिपे थे जिसने चंद्रयान-3 को क़ामयाब बनाया। विज्ञान में कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता। बल्कि हर स्थापित सत्य को चुनौती देना विज्ञान की निश्चित अदा है। असल विज्ञानी वो है जो अपने ही वैज्ञानिक सिद्धांत में कमी खोजने और उसमें कुछ नया जोड़ने में जीवन होम कर देता है।
दरअसल, भारत के चंद्रमिशन की क़ामयाबी स्वतंत्रता आंदोलन के संकल्पों से जुड़ी है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1939 में ‘नेशनल प्लानिंग कमेटी’ बनाकर तमाम विज्ञानियों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था। शांतिस्वरूप भटनागर और मेघनाद साहा से विश्वयुद्ध के बाद भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान को लेकर गहन चर्चा हुई। इससे पहले 26 दिसंबर 1937 को भारतीय विज्ञान कांग्रेस के पहले ग़ैर-वैज्ञानिक अध्यक्ष के रूप में पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था- ‘केवल विज्ञान ही है जो भूख और ग़रीबी, अस्वच्छता और निरक्षरता, अंधविश्वास और घातक रीति-रिवाज और परंपरा, बर्बाद हो रहे विशाल संसाधनों, भूखे लोगों से भरे समृद्ध देश की समस्यओं का समाधान कर सकते हैं।’