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दिल्ली के अल्पसंख्यक समुदाय ने चुनी इसलामी लाइन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में संघ के सिद्धान्तकार रतन शारदा ने यह लेख लिखा है। अंग्रेज़ी में लिखे इस लेख का हिन्दी अनुवाद पेश है।
मैं यह इंतजार कर रहा था कि दिल्ली चुनाव खत्म हो जाएँ तो शाहीन बाग का विश्लेषण करूँ। मैं नहीं चाहता था कि इस पर शोरगुल भरे तीखे चुनाव प्रचार का असर दिखे। इस पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान और उसके बाद नतीजे आने तक राजनीतिक दलों के नेताओं और अलग-अलग तरह के प्रवक्ताओं से बातचीत और मुलाक़ात से मुझे लोगों की मानसिकता को समझने में सहूलियत हुई।  

सबसे पहले हम दिल्ली को चुनावी चश्मे से देखें। यह साफ़ है कि मतदाता स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में फर्क करते हैं। दिल्ली में यह एक बार फिर साबित हुआ और यह दोनों ओर बराबर असर करता है। दिल्ली ने 2013 से ही राष्ट्रीय चुनावों में बीजेपी को चुना, पर स्थानीय चुनावों में आम आदमी पार्टी को तरजीह दी। दूसरे राज्यों के चुनावों में भी यह रुझान दिखा।
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दिल्ली के मतदाताओं ने राष्ट्रीय और स्थानीय चुनावों में अलग-अलग तरीके से वोट दिया। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में नागरिकता संशोधन क़ानून के प्रति ज़बरदस्त समर्थन दिखा, पर उन्हीं मतदाताओं ने दिल्ली के मामले में आम आदमी पार्टी पर अधिक भरोसा किया। बीजेपी समर्थकों को यह अच्छा नहीं लगेगा, पर यह सच है। 

दूसरे कारण भी हो सकते हैं। यह ज़ाहिर है कि हम भारतीय लोग प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को तरजीह देते हैं, पर यदि लोग क्षेत्रीय बीजेपी नेताओं से खुश नही हैं तो दूसरे दलों के साथ भी प्रयोग करने को तैयार हैं। ऐसा लगता है कि लोगों को बीजेपी से ऊँची अपेक्षाएँ होती हैं और हमेशा उस पर निगरानी रखते हैं, पर विपक्ष ख़राब रिकॉर्ड के बावजूद जीत जाता है। यह मजेदार है कि हर स्थानीय चुनाव भी बीजेपी के लिए परीक्षा है, पर यह दूसरों के लिए नहीं है। 

दिल्ली एक छोटा नगर राज्य है। मैंने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि बीजेपी को इस नगर राज्य के लिए किसी मेयर को आगे बढ़ाना चाहिए। विपक्ष के पास ठोस वोट बैंक वाला एक मेयर चेहरा था, पर बीजेपी ने केंद्रीय नेतृत्व पर भरोसा किया। यह एक बड़ी ग़लती थी।
बीजेपी ने देर से प्रचार अभियान शुरू किया, जबकि कजेरीवाल ने लगभग एक साल पहले ही यह अभियान छेड़ दिया था। उन्होंने झूठे दावों पर प्रचार अभियान चलाया, बीजेपी ने इसका कभी विरोध नहीं किया। बीजेपी इसके अलावा इस नगर राज्य के लिए होने वाले चुनाव प्रचार अभियान में नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे मुद्दे भी जोड़ना चाहती थी। 

हाल फ़िलहाल तक 15 साल शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी भूमिका पहले ही छोड़ दी थी। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब-जब इसने अपनी भूमिका छोड़ी है, यह बिल्कुल हाशिए तक पहुँच गई है। साफ़ है कि भविष्य में किसी विपक्षी गठजोड़ के केंद्र में कांग्रेस पार्टी नहीं होगी। 

शाहीन बाग कोई मुद्दा नहीं बना। इस पर बीजेपी नेताओं को ताज्जुब हो सकता है और धर्मनिरपेक्ष वामपंथी राजनेताओं को खुशी हो सकती है। पर यह आधा सच है। धर्म निरपेक्ष वामपंथी ताक़तों ने शाहीन बाग मुद्दे को जम कर भुनाया। आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री अमानतुल्ला ख़ान ने इसका समर्थन किया। पर्याप्त इलेक्ट्रॉनिक सबूत उपलब्ध हैं, कोई नहीं कह सकता है कि ये नकली हैं।
बहुमत समुदाय के वोटिंग पैटर्न से साफ़ है कि शाहीन बाग उनके लिए कोई मुद्दा नहीं था। उन्होंने सीएए विरोध के नाम पर होने वाले भयावह दृष्यों के बदले मुफ़्त में मिलने वाली सुविधाएँ चुनीं। अल्पसंख्यक समुदाय ने इसलामी लाइन चुनी।
अल्पसंख्यक समुदाय ने इसलामी लाइन चुनी। अमानतुल्ला और केजरीवाल के रूप में हमारे पास दिखाने को कुछ और वास्तव में कुछ हैं। हमारे पास मुसलिम धर्मगुरुओं और खोखले बजरंगबली नारों वाले हिन्दुओं के लिए विशेष सुविधाएँ हैं।  

आश्चर्य है कि कई टिप्पणीकार आम आदमी पार्टी की जीत को इस रूप में देखते हैं कि इससे शाहीन बाग को उचित ठहराया गया है। शाहीन बाग ने दिखाया है कि मीडिया यदि साथ दे और मसजिदों को केंद्र में रखने वाले हुड़दंगी संगठन और भीड़ मानसिकता साथ हों तो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर और झूठ को प्रचारित कर एक आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति भी मिल सकती है।  

शाहीन बाग ने उन जिहादी तत्वों को सम्मानजनक चेहरा दिया है, जिन्होंने सीएए-विरोधी आन्दोलन के नाम पर हिंसा फैलाई और यह दावा किया कि यह क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ है यह कि उन्हें देश से बाहर कर दिया जाएगा।
शाहीन बाग ने उन जिहादी तत्वों को सम्मानजनक चेहरा दिया है, जिन्होंने सीएए-विरोधी आन्दोलन के नाम पर हिंसा फैलाई और यह दावा किया कि यह क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ है यह कि उन्हें देश से बाहर कर दिया जाएगा।
केरल से लेकर कानपुर तक हर जगह यह बात समान रूप से सुनी गई। जिस क़ानून में मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं है, उसे इस रूप में बदनाम किया गया कि यह मुसलिम विरोधी है। उसके नेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि यह बिल्कुल झूठ है। 
जिन्ना को सबसे आगे रखा गया, उनके हर तरह के अनुयायियों ने बहुत ही होशियारी से आपसी रज़ामंदी से रणनीति बनाई और लोकतांत्रिक अधिकारों का फ़ायदा उठाया और संविधान से प्रेम करने का दावा किया हालांकि उन्होंने लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों के लोकतांत्रिक हक़ों पर खुले आम चोट की।
साधारण शब्दों में कहा जाए तो सीएए विरोधी धुरी के लोग चाहते हैं कि भारत में व्यवस्था के शिकार हुए मुसलमानों को वही सुविधाएँ मिलें जो दूसरों का शिकार कर रहे मुसलिम बहुल देशों के मुसलमानों को मिलती हैं। इस आन्दोलन के दौरान सबसे ज़हरीला घृणा अभियान चलाया गया, पर आलोचक दोष बीजेपी को देते हैं। धर्मनिरपेक्ष लॉबी और उन्हें सलाह देने वाले लोग नहीं बदले हैं।
इस हिंसा पर विदेशों से प्रतिक्रियाएँ हुईं। सीएए विरोध के नाम पर 'तक़ैया' का इस्तेमाल हुआ यानी दारुल हर्ब को दारुल इसलाम में तब्दील करने के लिए झूठ बोला गया। जो लोग लंबी-लंबी बहसें किया करते थे कि वे राष्ट्र गान के समय खड़े नहीं होंगे, वे खड़े होने लगे। यकायक तिरंगा निकाल लिया गया।
असली मक़सद संख्या बहुल समुदाय को प्रभावित करना था, अपनी सर्वोत्सकृष्टता को साबित करना था। लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए कुछ हिन्दुओं और सिखों को सामने रखा गया। अशोक चक्र की जगह शहादा रखा गया, अल्लाह के सबसे ऊपर होने, जिन्ना वाली आज़ादी के नारे लगाए गए और संविधान को हटा कर उस जगह शरिआ लागू करने की बात कही गई और बेहद आपत्तिजनक वीडियो जारी किए गए।
दरअसल, शाहीन बाग में जो नारे लगाए गए, वे 1990 के दशक में कश्मीर में लगाए गए थे। जब उनसे पूछा गया कि सीएए में मुसलमान विरोधी क्या है और किस देश में एनसीआर जैसा कुछ नहीं है तो वे जवाब नहीं दे सके। इसके बात वे मक़सद और डर की बात करने लगे, जो उन्होंने ख़ुद फैलाई है। यह ‘तक़ैया’ है, जो तथ्य और भावनाओं को ख़तरनाक ढंग से मिला कर तैयार किया गया है। 

शाहीन बाग मॉडल में ख़तरनाक यह है कि इसमें इसलामवादियों और मार्क्सवादियों का मेल है। जेएनयू की भीड़ उन्हें खुले आम समर्थन देती है। मजलिस-ए-इत्तिहाद-यूके जैसे दल धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हुए इसे दिशा निर्देश दे रहे थे।
कांग्रेस समेत सभी तरह के धर्निरपेक्ष लोग इसका हौसला बढ़ा रहे थे। ये समूह बहुत ही खुश थे कि नियम क़ानून का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और इस वजह से दूसरे जगहों पर भी वे ऐसा ही करने लगे। 

शाहीन बाग और उससे जुड़ा धरना स्वत:स्फूर्त नहीं हैं। जिस दिन चुनाव ख़त्म हो गए, शाहीन बाग के लोग अपने-अपने घर चले गए, इसी से उनका मक़सद साफ़ हो जाता है। सभी विरोधी ताक़तें निजी बातचीत में खुश हो कर कहती हैं कि सीएए उनकी राजनीति के लिए ठीक है और शाहीन बाग के बल पर मोदी को गद्दी से उतारा जा सकता है।
तो यह अंत नहीं है। बीते छह महीने में समाज और ख़ास कर हिन्दुओं को अस्थिर करने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया है। यह ऐसा विचार है जो इसलामवादियों, अराजतक तत्वों और कुंठित मार्क्सवादियों को समान रूप से आकर्षित करता है। आने वाले दिनों में इसका बुरी तरह इस्तेमाल हो सकता है।
दोस्ताना संबंध वाली कई मोदी-विरोधी राज्य सरकारों  की मदद से उपद्रव फैला कर पूरे देश को ही असंतुलित दिखाना आसान है। बीते 5 साल में फैली अशांति लोकसभा और टीवी स्टूडियो से बाहर निकल कर सड़कों पर फैल जाए, इसकी पूरी आशंका है। 

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रतन शारदा
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