नोबेल पुरस्कार समिति ने एक बार फिर ट्वीट कर गांधी को याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ट्वीट में उन्हें राष्ट्रपिता कहा। रूस के बाद जर्मनी ने शांति के मसीहा को श्रद्धांजलि दी। और मोदी सरकार के केंद्रीय बजट में भी गांधी लौट आये हैं। ये ताजा घटनाक्रम देश और दुनिया के मौजूदा हालात में गांधी की तीव्र होती प्रासंगिकता के स्पष्ट संकेत हैं। नोबेल पुरस्कार समिति गांधी को नोबेल न देने की भूल मानते हुए अपनी असमर्थता के लिए उनका कद भगवान बुद्ध और प्रभु यीशु के समकक्ष मान लेती है। पर ये पश्चाताप कम उनकी भूल का बचाव ज्यादा दिखता है। गांधी एक सशरीर व्यक्ति थे। आप उन्हें संत मानें या मसीहा। लेकिन ईश्वर बनाकर अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकते।

बहरहाल गांधी जयंती पर एक बार फिर गांधी खुद अपना चश्मा और लाठी टेकते कर्तव्य पथ पर लौट आये। संसद के नये सभागार में गांधी की लाठी की ठकठक साफ सुनाई दे रही थी। जिस गांधी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने गरीबों की मनरेगा योजना से जी राम जी कहकर विदा कर दिया था, उन्हें वह ग्राम स्वराज योजना और महात्मा गांधी हैंडलूम योजना शुरू करके वापस ले आयी है। साफ है कि मनरेगा योजना से राष्ट्रपिता को राम के नाम के बहाने दरकिनार करने का पछतावा मोदी सरकार को हुआ है। चाहे वह पांच राज्यों में आगामी चुनावों के मद्देनजर ही क्यों न हो। लेकिन गांधी को राष्ट्रपिता संबोधित करने के पीएम मोदी के शीर्षासन से गोडसे समर्थकों को बड़ा झटका लगा है।

इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना

नोबेल पुरस्कार देने वाली नॉर्वेजियन समिति की वेबसाइट पर बड़ा गजब तर्क दिया गया है कि जिस तरह बुद्ध को दलाई लामा और जीसस को पोप का पद नहीं दिया जा सकता। उसी तरह हमारी औकात नहीं है कि हम गांधी को कोई पुरस्कार दे सकें। नोबेल कमेटी के सलाहकार जेन्स अरुप सीप मानते हैं कि गांधी कोई साधारण राजनेता नहीं हैं, उनकी तुलना तो सिर्फ धर्म-संस्थापकों से ही संभव है।
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महात्मा गांधी को लेकर इसी 30 जनवरी को नोबेल कमेटी का ट्वीट उनके वेबसाइट लिंक के साथ आया, जिस पर लिखा है — "महात्मा गांधी: द मिसिंग लॉरिएट"। समिति स्वीकार करती है कि 1937 से 1948 के बीच 5 बार नाम आने के बावजूद गांधी को शांति का नोबेल नहीं दिया गया।

लेकिन क्या केवल पश्चाताप भर कर देने से इतिहास की उस अक्षम्य भूल का प्रायश्चित हो सकता है? गांधी को पुरस्कृत न करना केवल एक व्यक्ति की अनदेखी नहीं थी, बल्कि यह 'अहिंसा' के विचार का अपमान था।

इस हिमालयी भूल को शायद महसूस करते हुए ही नोबेल कमेटी के सलाहकार ओले कोल्बजोर्नसेन ने लिखा -"हम कानून की किताबों में रास्ता ढूंढ रहे हैं, जबकि गांधी कानून से ऊपर जा चुके हैं। अगर हम उन्हें मरणोपरांत पुरस्कार देते हैं, तो यह स्वीकार करेंगे कि दुनिया में अब शांति की उम्मीद खत्म हो गई है। और अगर हम किसी और को देते हैं, तो यह गांधी का अपमान होगा।"

30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या

30 जनवरी 1948 में गांधी के नश्वर शरीर को तीन गोलियों से छलनी कर दिया गया। उनका पार्थिव शरीर शून्य ब्रम्ह में लीन हो गया। तब नोबेल कमेटी के पास मरणोपरांत पुरस्कार देने का तकनीकी अवसर था। 

महात्मा की शहादत के सन्नाटे में किंकर्त्तव्यविमूढ़ नोबल कमेटी विचार शून्य हो गयी। और जो फैसला लिया वह इतिहास में न उससे पहले कभी हुआ, न उसके बाद।

नोबल समिति ने रिकॉर्ड बुक में लिखा: "There was no suitable living candidate" (इस वर्ष कोई उपयुक्त "जीवित" उम्मीदवार नहीं है)। यह शांति के इतिहास का सबसे बड़ा 'शून्य' था। कमेटी की इस विचार शून्यता ने नोबेल पुरस्कार को ही 'भारशून्य' कर दिया और नोबेल की साख पर भी एक बड़ा सवाल छोड़ गया। जिसे नोबेल कमेटी भुला नहीं पा रही, और जब दुनिया गांधी के विचारों की सार्वभौमिकता स्वीकार कर रही है, तो उन्हें ईश्वरीय दर्जा देकर बचना चाहती है।

नोबेल का 'शून्य' और ऐतिहासिक पक्षपात

पर एक तथ्य और है। पांच बार गांधीजी का नामांकन खारिज करने के पीछे नोबेल कमेटी के तत्कालीन सलाहकार प्रोफेसर जैकब वॉर्म-मुलर ने तर्क दिया कि वे "एक स्वतंत्रता सेनानी, एक आदर्शवादी और राष्ट्रवादी" के बीच झूलते रहे। गांधी पर 'एक पक्ष (भारत) के प्रति प्रतिबद्ध' होने का आरोप लगे थे।

यह तर्क हास्यास्पद और वास्तव में उनकी पक्षपाती मानसिकता को उजागर करता है। क्या हेनरी किसिंजर का शांति पुरस्कार वियतनाम के रक्तपात को धो सका? क्या यासिर अराफात, यित्ज़ाक रबिन और शिमोन पेरेस के साझा पुरस्कार ने मध्य पूर्व में स्थायी शांति दी?

नोबेल की भूल या 'औपनिवेशिक कायरता'

प्रोफेसर जैकब की टिप्पणी भारतीयों को स्वीकार नहीं। महात्मा गांधी के विचार अगर भारत की सीमा में थे, तो उनकी हत्या पर दुनिया भर से लगभग 3500 शोक संदेश कैसे प्राप्त हुए।

गांधी जी की हत्या पर संयुक्त राष्ट्र ने अपना झंडा आधा झुकाकर दुर्लभ एवं अभूतपूर्व शोक व सम्मान दिया और दो मिनट का मौन रखा। जबकि गांधीजी किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रुमैन ने गांधी को "अंतरराष्ट्रीय नेता" बताया जिनका प्रभाव आध्यात्मिक क्षेत्र तक था। ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्ठम ने इसे "संपूर्ण मानवता की अपूरणीय क्षति" कहा। ब्रिटिश PM एटली ने गांधी को "आज की दुनिया की महानतम शख्सियत" बताया। और लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि "पूरी दुनिया शायद सदियों तक ऐसा दूसरा व्यक्ति नहीं देख पाएगी।"

कुछ और टिप्पणियाँ इतिहास में दर्ज हैं

जनरल मैकआर्थर ने गांधी हत्या को "आधुनिक इतिहास की सबसे घृणित घटना" बताया था। पर्ल एस. बक ने कहा कि "हत्या करने वाला भी जानता था कि गांधी सही थे।" अल्बर्ट आइंस्टीन ने तो कह दिया कि "आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि ऐसा व्यक्ति धरती पर चला था।" पथिक लॉरेंस ने उन्हें "विश्व-बंधु" कहा, जिन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के शांतिपूर्ण अंत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दुनिया ने गांधी की हत्या को समस्त मानवता की शांति एवं नैतिकता की हानि माना। उनके अहिंसा के सिद्धांत की शहादत और वैश्विक प्रेरणा पर सभी ने एक स्वर से श्रद्धांजलि दी।

विजेताओं की भीड़ और गांधी का कद

नोबेल के इतिहासकार ग्रे ने भी माना है कि यह एक "अजीब चूक" है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर (1964 के पुरस्कार विजेता, जिन्होंने गांधी को अपना गुरु माना) और 1960 के नोबेल पुरस्कार विजेता अल्बर्ट लुथुली (जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के सिद्धांतों को लागू किया) जैसे लोगों को सम्मानित किया गया। लेकिन गांधी, "जो राजनीतिक संदर्भ में अहिंसा का प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे, उन्हें कभी शांति पुरस्कार नहीं दिया गया"।
कई नोबेल विजेता राजनीति के गलियारों से निकले तात्कालिक समझौते के पात्र थे, जबकि गांधी युगों के 'सत्य' और नैतिकता के संवाहक थे। 1930-40 के दशक में ब्रिटिश साम्राज्य को नाराज न करने की 'औपनिवेशिक कायरता' ने शांति के इस सर्वोच्च सम्मान को एक 'राजनयिक औजार' (Diplomatic Tool) बना दिया था।

पुरस्कार के इतिहासकार अब्राम्स ने इसे 'संकीर्ण उपेक्षा' करार दिया है। लिपस्की जैसे विद्वानों ने गांधी के मामले में क्रिश्चियन सेंचुरी में 1934 के एक संपादकीय का हवाला दिया, जिसमें व्यापक राय थी कि "यदि गांधी नोबेल के लिए तार्किक उम्मीदवार नहीं हैं, तो उस पुरस्कार के उद्देश्यों पर ही पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।"

गांधी को नोबेल न देने की चूक कमेटी को खुद भी सालती है। 1989 में दलाई लामा को नोबेल पुरस्कार देते हुए कमेटी के चेयरमैन ने इसे गांधी को 'श्रद्धांजलि' बताया। नोबेल के तत्कालीन निदेशक ऑगस्ट शू ने माना था कि गांधी को न चुनना उनकी सबसे बड़ी विफलता है।

सत्ता का शीर्षासन: भारत और विश्व की बदलती दृष्टि

वैसे गांधी की प्रासंगिकता आज भारत के भीतर और बाहर एक नई करवट ले रही है। देश में एक दिलचस्प विरोधाभास उभरा है। जिस गांधी को मोदी सरकार इतिहास के मलबे में दबाने की कोशिश कर रही थी, उसी सरकार में खुद प्रधानमंत्री ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' कह दिया। मोदी ने कभी कहा था कि रिचर्ड एटनबरो की फिल्म से पहले दुनिया गांधी को कहां जानती थी।
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यही स्थिति वैश्विक स्तर पर भी है। स्वयं यूक्रेन से युद्ध में उलझे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली आये, तो गांधी की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किया। कभी नाजीवाद के क्रूर इतिहास के लिए जाने जाने वाले जर्मनी के राजदूत दिल्ली में गांधी की मूर्ति पर पुष्पांजलि देकर शायद मौन कनफेस करते रहे कि गांधी आप सही थे।

पश्चाताप नहीं, प्रायश्चित हो

गांधी को किसी पदक की जरूरत नहीं थी; उनके विचारों की जरूरत मानवता को है। आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैले युद्ध, टकराव, तनाव, झूठ और हिंसा के माहौल में गांधी के 'नोबेल' विचारों का महत्व हर इंसान मानता और महसूस करता है।

नोबेल कमेटी प्रायश्चित करना चाहे, तो गांधी को केवल एक 'मिसिंग लॉरिएट' न कहकर, उन्हें "सहस्राब्दी का शांति दूत" घोषित करे। और धनराशि को एक नया शोध संस्थान बनाकर उनके विचारों के विस्तार को समर्पित कर दे। यही सर्वोत्तम विकल्प है।