loader

क्या दुनिया की पहली वैक्सीन की खोज भारत में हुई थी? 

काउ पाॅक्स चेचक की तरह खतरनाक रोग नहीं है। इसमें शरीर में चकत्ते बन जाते हैं, खुजली होती है और थोड़ा सा बुखार आता है, फिर सब ठीक हो जाता है। एडवर्ड जेनर ने सोचा कि अगर ऐसे लोगों के रक्त का सीरम स्वस्थ लोगों को इंजेक्ट कर दिया जाए तो वे भी चेचक से बच सकेंगे। तो यह थी दुनिया की पहली वैक्सीन यानी महामारी से बचने का पहला आश्वासन। 
हरजिंदर

जब हम वैक्सीन की खोज की बात करते हैं तो उसका श्रेय इंग्लैंड के एडवर्ड जेनर को दिया जाता है। दूसरी तरफ यह भी कहा जाता है कि जेनर ने एक परंपरागत ज्ञान को आधुनिक मेडिकल प्रैक्टिस में बदला और दुनिया को चेचक की महामारी से मुक्ति का रास्ता दिखाया। इसी योगदान के लिए उन्हें फाॅदर ऑफ़ इम्युनोलाॅजी कहा जाता है।

18वीं सदी के अंत में जिन दिनों चेचक की महामारी पूरी दुनिया को परेशान कर रही थी, जेनर को यह पता चला कि जिन लोगों को एक बार काॅउ पॉक्स की बीमारी हो जाती है, फिर उन्हें चेचक की बीमारी नहीं होती। काॅउ पॉक्स मूल रूप से गाय के थनों में होने वाली बीमारी है जो अक्सर उन्हें दुहने वालों को भी हो जाती थी। 

ताज़ा ख़बरें

एडवर्ड जेनर की खोज 

काउ पाॅक्स चेचक की तरह खतरनाक रोग नहीं है। इसमें शरीर में चकत्ते बन जाते हैं, खुजली होती है और थोड़ा सा बुखार आता है, फिर सब ठीक हो जाता है। जेनर ने सोचा कि अगर ऐसे लोगों के रक्त का सीरम स्वस्थ लोगों को इंजेक्ट कर दिया जाए तो वे भी चेचक से बच सकेंगे। तो यह थी दुनिया की पहली वैक्सीन यानी महामारी से बचने का पहला आश्वासन। वैसे, वैक्सीन शब्द लैटिन के वाका से बना है, जिसका अर्थ होता है गाय।

जल्द ही इस वैक्सीन की हर जगह चर्चा होने लगी और साथ ही इसकी कहानी भी चल निकली। पर इस कहानी के साथ ही हर जगह कुछ नई पटकथाएं उभरने लगीं जिनमें सबसे दिलचस्प भारत में रची गई।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में दुनिया में हर जगह जेनर की तारीफ हो रही थी। साल 1818 में ब्रिटेन से छपने वाले एशियाटिक जर्नल में एक लेख छपा। इस लेख में बताया गया था कि भारत में वैक्सीन का ज्ञान सदियों पहले से ही मौजूद था।

लेख में संदर्भ के तौर पर मद्रास कूरियर नाम के अखबार में छपे कलवी विरुंबम के लेख का जिक्र था जिसमें धन्वन्तरि ने अपने ग्रंथ चिंतामणि में चेचक के इलाज का जिक्र किया है। 

जर्नल ने यह भी बताया कि अखबार में संस्कृत का मूल श्लोक भी दिया गया है जिसके अनुसार अगर गाय के थन के घावों से निकलने वाले द्रव को निकालकर चेचक पीड़ित के शरीर पर मला जाए तो उसकी व्याधि दूर हो सकती है। एशियाटिक जर्नल में लेख छपते ही वैक्सीन का पूरा नैरेटिव अचानक ही बदलने लग गया। 

नवाब के अनुभव का हवाला

दो साल बाद फ्रांस की प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका डिक्श्नाइर डेस साइंस मेडिकल्स में हेनरी मेरी हसान का लेख छपा जिसमें भी यही सारे संदर्भ दोहराए गए। इसके साथ ही गाजीपुर के नवाब मेंहदी अली खान के अनुभव का भी हवाला दिया गया। नवाब साहब ने अपने ये अनुभव 1804 के एशियाटिक एनुअल रजिस्टर में दर्ज कराए थे। 

चेचक के इलाज की कोशिश

पूरा किस्सा यह था कि नवाब साहब के बेटे को चेचक की बीमारी हो गई थी। उन्होंने हर तरह का इलाज किया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। तभी उन्हें पता चला कि बनारस में कोई अलेप चौबे हैं जिनके हाथों में माता शीतला के इस कोप से मुक्ति दिलाने की सिफत है। उन्होंने अलेप चौबे को ससम्मान गाजीपुर बुला लिया। हालांकि बच्चे को देखने के बाद अलेप चौबे ने यही कहा कि जहर अब बहुत ज्यादा फैल चुका है इसलिए ठीक होने की ज्यादा संभावना नहीं है। फिर भी जब उनसे कोशिश करने को कहा गया तो उन्होंने उस बच्चे के शरीर पर उभरे चेचक के कुछ दानों को तागे से इतना खरोंचा कि उससे मवाद निकलने लगा। इसके बाद उन्होंने गाय के थन को एक तागे से खरोंचा और जो द्रव या पदार्थ निकला उसे बच्चे के घावों पर मल दिया। 

हालांकि नवाब साहब के इस अनुभव में बच्चे के ठीक हो जाने जैसी कोई बात नहीं कही गई थी लेकिन इससे यह साबित करने की कोशिश तो हो ही सकती थी कि भारत में जेनर की वैक्सीन वाली प्रक्रिया एक अलग रूप में पहले से ही मौजूद थी। 

एक दिलचस्प बात यह भी है कि नवाब के जो अनुभव थे वे मद्रास कूरियर में छपे लेख से बहुत पहले ही प्रकाशित हो चुके थे। यह भी कहा जाता है कि फ्रांस ने इस मामले को ज्यादा तूल इसलिए भी दिया क्योंकि उसे ब्रिटेन की एक उपलब्धि को नीचा दिखाने का मौका मिल गया था। 

मामला जब ज्यादा संगीन हुआ तो कई और लोगों ने खोज शुरू कर दी। इनमें स्काॅटलैंड के मशहूर सर्जन जाॅन स्कूलब्रेड भी थे। वे धन्वन्तरि का कोई ऐसा संदर्भ खोजने में तो नाकाम रहे लेकिन भारत में लोगों से बातचीत और निजी अनुभवों के आधार पर वे भी इसी नतीजे पर पहुँचे कि भारत में इस तरह से चेचक का इलाज होता था। 

इस बीच नए-नए दावे आने लगे। कई ऐसे ग्रंथों के संदर्भ दिए गए जो आसानी से उपलब्ध ही नहीं थे। यूरोप के बहुत सारे भारत और भारतीय भाषा विशेषज्ञ इसी काम में जुट गए। इस बीच मद्रास कूरियर में छपे लेख की तलाश भी शुरू हुई। बहुत समय बीच चुका था इसलिए काफी मुश्किल से एक पुस्तकालय में वह अखबार मिला। 

विचार से और ख़बरें

अखबार मिलने के बाद यह पता चला कि जिसे अभी तक कलवी विरुंबम नाम के विद्वान का लेख माना जा रहा था, वह दरअसल इसी नाम के किसी शख्स का संपादक के नाम लिखा गया एक पत्र था।

इस बीच यह बात भी साफ हो गई कि जिस काउ पॉक्स नाम के रोग से यह किस्सा शुरू हुआ था वह रोग कभी भारत पहुंचा ही नहीं। 

दुनिया ने भले ही एडवर्ड जेनर को वैक्सीन का पितामह मान लिया लेकिन ये दावे कभी खत्म नहीं हुए कि वैक्सीन का अविष्कार भारत में ही हुआ था। अभी पांच साल पहले ऐसा दावा देश के स्वास्थ्य मंत्री ने भी किया था।

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
हरजिंदर
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें