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विकास की मदद करने वाले सफ़ेदपोश नेताओं-अफ़सरों को कब पकड़ेगी योगी सरकार?

छोटी मछलियों को जाल डालकर पकड़ लेना तो समझ में आता है। सवाल यह है कि क्या बड़ी मछलियों के इर्द-गिर्द भी काँटा फेंका जाएगा? क्या उस बड़ी और ताक़तवर लॉबी के शिकंजे को भी चकनाचूर किया जाएगा जो रुपये के लेन-देन से ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल रचाता है? 
अनिल शुक्ल

यूपी का कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री, चीफ़ सेक्रेटरी (होम) और डीजीपी को गोपनीय पत्र लिख कर यह बताने लग जाए कि प्रदेश में आईपीएस और कतिपय फ़र्ज़ी पत्रकारों की एक ऐसी लॉबी काम कर रही है जो 50 से 80 लाख रुपये लेकर ज़िलों में एसएसपी की पोस्टिंग-ट्रांसफर कराती है तो इसे एक गंभीर मामले के रूप में देखा जाना चाहिए। यह मामला तब और भी गंभीर बन जाता है जब उक्त अधिकारी की चिट्ठी पर किसी सकारात्मक जाँच की जगह उसी को दंड देने की नीयत से निलंबन का आदेश थमा दिया जाता हो। 

यह लॉबी कितनी सशक्त होगी, इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जाना चाहिए कि निलंबन के 7 महीने बाद, अभी भी उक्त अधिकारी निलंबन की प्रताड़ना झेल रहा है। दूसरी ओर यह भी कम गंभीर मामला नहीं है कि एक डीएसपी द्वारा विकास दुबे के विरुद्ध गहरी आपराधिक गतिविधियों की चेतावनी को लगातार नज़रअंदाज़ करते चले जाने वाले एसएसपी को एसटीएफ़ में डीआईजी का प्रमोशन मिलने के बाद उसी विकास दुबे द्वारा किये गए 8 पुलिस वालों के जघन्य हत्याकांड की जाँच भी सौंप दी जाए और 4 दिन की मीडिया छीछालेदर के बाद बमुश्किल उक्त अधिकारी को स्थानांतरित करना पड़े।

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कानपुर पुलिस नरसंहार ने इस बात की तस्दीक़ कर दी है कि पूरा सिस्टम ख़तरे में है। चार दिन पहले तक किसी ने कल्पना नहीं की थी कि ये ख़तरे ऐसे भयावह रूप में सामने आएँगे। अब मसला अपराध के राजनीतिकरण का नहीं, अपराधियों द्वारा 'राज्य' के विरुद्ध युद्ध छेड़ देने के ख़तरनाक ‘चैलेंज’ से निपटने का है।

यूपी में अपराध का नेटवर्क कोई अभी बना हो, ऐसा नहीं है। 1998 के अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व वाले दौर में यूपी में बीजेपी सरकार थी। कल्याणसिंह तब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अटल जी संसद में लखनऊ का प्रतिनिधित्व करते थे। ‘एसपीजी’ की संस्तुति पर राज्य सरकार ने लखनऊ का 'सिक्योरिटी ऑडिट’ करवाया। इस सुरक्षा ऑडिट में जो ख़तरनाक चेतावनियाँ सामने आईं उनमें एक यह थी कि लखनऊ उत्तर भारत के नामवर अपराधियों का 'हाइड आउट' बन चुका है और उनके बीच पैसों का बड़ा 'ट्रांजेक्शन' (लेन-देन) इसी शहर में होता है। यह बहुत चौंकाने वाला तथ्य था जिसके चलते केंद्र और राज्य सरकार की सुरक्षा एजेंसियों के होश फ़ाख़्ता हो गए। प्रधानमंत्री यदि अपने ही संसदीय क्षेत्र में असुरक्षित हैं तो वह अपने क्षेत्र की देखभाल कैसे कर पाएँगे? यही वजह है कि इसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में उनकी लखनऊ यात्राएँ अपेक्षाकृत घटा दी गयीं।

ऊपर जिस आईपीएस ट्रांसफर-पोस्टिंग लॉबी का ज़िक्र किया गया है, वह अगर सच्चाई है तो 'स्वच्छ और साफ़-सुथरे’ बीजेपी राज की कलई खोल देने के लिए काफ़ी है। 2 जनवरी (2020) को एसएसपी गौतमबुद्धनगर वैभव कृष्ण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर साफ़ किया कि उन्हें लेकर जो अश्लील वीडियो वायरल किया जा रहा है, वह कृत्रिम है और वास्तव में उस लॉबी की कारस्तानी है जो आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति-स्थानांतरण के लिए 50 से 80 लाख रुपये लेते हैं और जिनका उन्होंने हाल ही में भंडाफोड़ किया था। उन्होंने बताया कि इनकी शिकायत उन्होंने मुख्यमंत्री, चीफ़ सेक्रेटरी (होम) और डीजीपी से की है। उन्होंने इस बाबत बाक़ायदा 5 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों और नोएडा के 5 फ़र्ज़ी पत्रकारों के नाम भी खोले।

वैभव कृष्ण ने टेलीफ़ोन पर हुई एक बातचीत का ऑडियो भी अपने पास होने का दावा किया जिसमें एसएसपी रामपुर से 'पत्रकार' चन्दन राय मेरठ में उन्हें नियुक्त करवा देने की एवज़ में 80 लाख रुपये माँग रहा है।

वैभव कृष्ण ने इसी प्रकार बरेली, आगरा, गौतमबुद्धनगर आदि के लिए पोस्टिंग की 'डील' की बात भी कही। उनकी इस गोपनीय चिट्ठी पर जाँच का आदेश हुआ और एसपी (हापुड़) को उसका जाँच अधिकारी बनाया गया। जाँच आगे गति पकड़ती और लोगों को कुछ पता चलता, इससे पहले सप्ताह भर में ही वैभव कृष्ण को निलंबित कर दिया गया। उनका निलंबन अभी भी जारी है।

यदि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वैभव कृष्ण का आरोप सच है और सचमुच रुपयों के बड़े 'ट्रांजेक्शन' से ही एसएसपी की नियुक्तियाँ होती हैं तब तो रुपयों के लेन-देन की यह चेन आगे बढ़कर अपराधियों तक भी पहुँचती होगी।

विकास दुबे जैसा छुटभैया अपराधी इसी चेन को पकड़ कर आगे बढ़ते हैं और आने वाले दिनों में नामचीन बनते चले जाते हैं। अब, जबकि सब कुछ धाराशायी हो चुका है, तब सरकार की नींद टूटी है और तब उसे इस चेन को तोड़ डालने का ख़याल आया। विगत बुधवार को थाना चौबेपुर (कानपुर) के प्रभारी सब इंस्पेक्टर विनय तिवारी और के के शर्मा को गिरफ़्तार किया गया है। छोटी मछलियों को जाल डालकर पकड़ लेना तो समझ में आता है। सवाल यह है कि क्या बड़ी मछलियों के इर्द-गिर्द भी काँटा फेंका जाएगा? क्या उस बड़ी और ताक़तवर लॉबी के शिकंजे को भी चकनाचूर किया जाएगा जो रुपये के लेन-देन से ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल रचाता है? 

पुलिस विकास दुबे और उसके सहयोगियों के बीते 6 महीनों की फ़ोन कॉल का रिकॉर्ड खंगाल रही है। येन-केन-प्रकारेण यदि इनमें उभरने वाले नामों के विरुद्ध कार्रवाई हो सकी तो इससे बड़े धमाके फूटेंगे।

योगी सरकार नैतिकता की इस अग्निपरीक्षा में प्रविष्ट होने का जोखिम उठाएगी? क्या योगी सरकार कठोरमन बन के सचमुच ऐसे लोगों के विरुद्ध 'एक्शन' लेकर राजनीतिक 'शुचिता' का नया इतिहास रचेगी?

इस चेन के दरअसल 3 छोर हैं। 2 छोर अगर पुलिस अफ़सर और अपराधियों तक पहुँचते हैं तो इसका तीसरा छोर भी है जो राजनीति की गंदी नदी तक पहुँचता है। विकास दुबे 2 बार ग्राम प्रधान रहा और एक बार ज़िला पंचायत का सदस्य भी रहा है। राजनीति की मुख्य धारा में कूदने की उसकी चाह ने ही उसे राजनीतिज्ञों की गोद में ले जाकर बैठा दिया। शुरू में वह समाजवादी पार्टी से नज़दीकी रखता था। बाद में वह बीएसपी में शामिल हो गया। बीएसपी टिकट और ख़ुद की जेब के पैसे के दम पर ही वह ज़िला पंचायत का सदस्य निर्वाचित हुआ था। 

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बीएसपी में कैसे आया था विकास?

बीएसपी में उसे लाने वाले उन्नाव-लखनऊ अंचल के 'दबंग' ब्राह्मण नेता ब्रजेश पाठक थे। बताते हैं कि ब्रजेश पाठक ही गोरखपुर के माफिया हरिशंकर तिवारी और उनके पुत्रों को बीएसपी में लाये थे। हरिशंकर तिवारी गोरखपुर की चिल्लूपार विधानसभा सीट से 5 बार विधायक रहे हैं। फ़िलहाल उनके छोटे पुत्र हृदयशंकर तिवारी उक्त क्षेत्र से बीएसपी विधायक हैं। उनके दूसरे पुत्र भीष्मशंकर तिवारी ख़लीलाबाद संसदीय क्षेत्र से बीएसपी के टिकट पर निर्वाचित (2009-14) हो चुके हैं। 

ब्रजेश पाठक फ़िलहाल योगी सरकार में क़ानून और ग्रामीण अभियांत्रिकी के कैबिनेट मंत्री हैं। वह 2017 में बीजेपी में शामिल हो गए थे और लखनऊ सेंट्रल की विधान सभा सीट से पार्टी टिकट पर निर्वाचित हुए।

राजनीति के जानकार बताते हैं कि विकास दुबे अब बृजेश पाठक का पल्लू थाम कर बीजेपी में शामिल होना चाहता था लेकिन एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री की 'न' के चलते ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। उसका लक्ष्य सन 2022 में कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट से बीजेपी या बीएसपी टिकट से चुनाव लड़ना था।

अपराध की पृष्ठभूमि से चलकर पिछले 20 सालों में विधानसभा सौंध में दाखिल होने वाले विधायकों का जलवा जलाल उसने देख रखा था। यूपी विधानसभा (2017) में विजयी होने वाले 143 विधायकों ने अपना नामांकन भरते समय 'चुनाव आयोग' के समक्ष दायर अपने हलफ़नामों में यह स्वीकार किया था कि उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है और उनके विरुद्ध अपराध की सांगेय धाराओं में मुक़दमे चल रहे हैं। इनमें अकेले बीजेपी विधायकों की संख्या 114 है। यदि पार्टी के कुल विधायकों (312) में इनका प्रतिशत निकाला जाए, तो यह 37% बैठता है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन विधायकों में स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल हैं।

विगत 3 सालों में योगी सरकार ने अपनी पार्टी के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायकों की संख्या को साफ़-सुथरा बनाने के लिए एक नितांत नयी कार्यशैली का सूत्रपात किया। अपने सहोदरों के ‘गुजरात मॉडल’ के 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी' सिद्धांत से प्रेरित होकर उसने भी अभियोजन पक्ष की ओर से बड़ी तादाद में इन मुक़दमों को वापस ले लिया।

सत्ता के नज़दीक होने की धमक और संपत्ति बटोरने के जूनून ने बीते 4 दशकों में अपराध और अपराधी की प्रकृति को पूरी तरह से बदल दिया है। अब अपराध इसलिये किये जाते हैं ताकि नामी-बेनामी संपत्ति जोड़ी जा सके। इसी अकूत संपत्ति के लेन-देन से सत्ता और शासन में 'एंट्री' का खेल रचा जाता है। हाल के दशकों में भारी-भरकम जेब लेकर विधानसभा में दाखिल होने वाले 'माननीयों' की संख्या का ग्राफ़ उत्तरोत्तर शीर्ष पर जा रहा है। 'चुनाव आयोग' के समक्ष दायर हलफनामों के अनुसार यूपी विधानसभा (2017) में कुल करोड़पति विधायकों की संख्या 322 है।

विचार से ख़ास

विकास दुबे बीते 20 सालों में बेशुमार ज़मीनें हड़पता गया, सामने आने वाले हर शख्स को ठिकाने लगता गया। अपहरण की दुनिया में भी उसके क़ारोबार का सितारा बुलंदी के कगार पर जा पहुँचा था। इसमें किसी तरह का व्यवधान नहीं था। कहीं कोई टोकने वाला नहीं था। इन सालों में उसने बेशुमार संपत्ति जमा कर ली थी। यद्यपि अभी उसके, उसकी पत्नी के बैंक अकॉउंट सहित दुबेजनों की सम्पूर्ण संपत्ति की जाँच चल रही है और हो सकता है कि जल्दी इसका खुलासा हो। यूपी पुलिस के एक बड़े अधिकारी अनुमान लगाकर कहते हैं कि विकास दुबे के पास 1000 करोड़ से ऊपर की संपत्ति हो सकती है।

‘सीएए’ विरोधी आंदोलन में ‘तोड़फोड़’ और ‘सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाने’ के आरोपों में सैकड़ों लोगों को जेल में डाला गया और अब उनकी निजी संपत्ति को ज़ब्त करने के कार्रवाइयाँ शुरू हो गयी हैं। क्या विकास दुबे की संपत्ति को ज़ब्त करने की कार्रवाई होगी? क्या ज़ब्त की जाने वाली इस संपत्ति को उन पुलिस वालों के परिजनों को दिया जायगा जिन्होंने इस लुटेरे को पकड़ने की कोशिश में शहादत दी है?

सरकार यदि सचमुच अपराध की कमर तोड़ना चाहती है तो उसे अपराधी की संपत्ति पर झपट्टा मारना होगा। यही संपत्ति उसका अवलंब है और उसे उसकी धुरी के साथ मज़बूती से चिपकाए रखता है। यदि अपराधी का आधार टूटेगा तो अपराध की उसकी दुनिया भरभरा कर धराशायी हो जाएगी।

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