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उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास पर और ध्यान दे भारत, चीन से ले सबक

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नवम्बर के दूसरे सप्ताह में अरुणाचल प्रदेश के दौरे में कई ढांचागत सुविधाओं के उद्घाटन के बाद चीन ने उनके अरुणाचल दौरे पर एतराज जाहिर करने वाला एक बयान जारी कर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश दक्षिणी तिब्बत का इलाका है। चीन इससे पहले भी भारत के शीर्ष नेताओं के अरुणाचल दौरे पर अपनी आपत्ति जाहिर करता रहा है। हम इस लेख में चीन के इस एतराज की पृष्ठभूमि में अरुणाचल प्रदेश और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के तेजी से विकास की भारत के लिये क्या सामरिक और आर्थिक अहमियत है, उस पर चर्चा करेंगे। 

उत्तर-पूर्वी राज्य भारतीय नेताओं की निगाह से  हाल तक बाहर ही रहे हैं क्योंकि वह इलाका विद्रोह ग्रस्त माना जाता रहा है। इससे भी अधिक 1962 के युद्ध के बाद भारतीय रक्षा कर्णधारों में यह धारणा बन गई कि यदि उत्तर-पूर्वी राज्यों में सड़कों और रेललाइनों के साथ हवाई यातायात के साधन विकसित हो गए तो भविष्य में चीन के साथ युद्ध की स्थिति में चीनी सैनिकों के लिये भारत के काफी अंदर तक घुसना आसान हो जाएगा। भारतीय रक्षा नीतिकार उन दिनों की याद करते हैं  जब 1962 के युद्ध में चीनी सैनिक असम के तेजपुर तक घुस आए थे।

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पलायन कर रहे तिब्बती युवा

लेकिन आज हालात में जमीन-आसमान का फर्क है। भारतीय सेनाएं भले ही चीन से लगी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम हो चुकी हैं लेकिन वे तिब्बत में हुए विकास की चकाचौंध की रोशनी को भारत के इलाके तक पहुंचने से नहीं रोक सकतीं। इस रोशनी से तिब्बती युवकों की आंखें चौंधियां रही हैं और यही वजह है कि हजारों नहीं तो सैंकड़ों की संख्या में तिब्बती युवकों को हम उनकी मातृभूमि की तरफ पलायन करते हुए देख सकते हैं।  

हमने तिब्बती शरणार्थियों को भारत में शरण तो दी लेकिन उनकी संतानें अब चीन के शासन वाली  उनकी मातृभूमि में ही लौटना चाहती हैं क्योंकि भारत में रह कर उन्हें आर्थिक  प्रगति के समुचित अवसर नहीं मिल रहे हैं और वे तिब्बती इलाके में हुए विकास की चकाचौंध से चुम्बक की तरह आकर्षित हो रहे हैं। ल्हासा की सड़कों पर आप अक्सर हिंदी बोलते तिब्बती युवाओं को देख सकते हैं।

यदि हमने अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों के इलाके के विकास को चीन के स्तर तक ले जाने में देरी की तो यह दीर्घकाल में भारत के लिये काफी घातक साबित होगा। उत्तर-पूर्वी राज्यों खासकर अरुणाचल प्रदेश के सीमा पार तिब्बती यानी चीनी इलाकों में चीन ने जो विकास कराया है, उससे  अरुणाचल और भारत के अन्य इलाकों में रहने वाले तिब्बती अचम्भित हैं कि क्या यह वही तिब्बत है, जिसे उनके दादा-नाना छोड़ कर भारत आ गए थे?  

वास्तव में उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास के लिये भारत सरकार को चीन से सबक लेना चाहिये और अपने इलाके के युवकों के लिये आधुनिक जीवन की वैसी ही सुख-सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिये जिसकी आज के आर्थिक माहौल में वे अपेक्षा करते हैं।

चीन की सीमा से लगे उत्तर-पूर्वी राज्यों को सड़क, रेलवे, हवाई और जलीय मार्गों से जोड़ कर इस पूरे इलाके का न केवल कायाकल्प किया जा सकता है बल्कि पर्यटन के नजरिये से इसे स्विटजरलैंड के मुकाबले भी खड़ा किया जा सकता है। इसे केवल हवाई सपना नहीं कहा जा सकता बल्कि उत्तर-पूर्वी राज्यों का दौरा कर लौटे स्विटजरलैंड के एक राजनयिक ने इस लेखक से कहा कि चीन से लगे अरुणाचल प्रदेश और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्य  अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के धनी हैं और भारत सरकार इनका आर्थिक दोहन नहीं कर रही है। 

हालांकि इस दिशा में कुछ साल पहले काम शुरू हो चुका है लेकिन यह काफी धीमी गति से चल रहा है। इस दिशा में पहली सोच 2006 के दौरान तत्कालीन विदेश सचिव श्याम सरन की एक रिपोर्ट से पैदा हुई थी और तब से सरकारों ने इसे लागू करने के लिए कदम उठाए हैं लेकिन वित्तीय, पर्यावरणीय और इंजीनियरी अड़ंगों की वजह से इसे साकार करने में भारी दिक्कतें पैदा हुईं हैं।

सिसेरी पुल से मिलेगा फायदा 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अरुणाचल प्रदेश के हाल के दौरे में सामरिक रूप से अहम सिसेरी पुल का उद्घाटन किया जिससे पहाड़ियों पर रहने वाले वहां के लोगों के लिये एक पहाड़ी कस्बे से दूसरे तक आने-जाने में काफी आसानी होगी और वक्त व पैसे की भारी बचत होगी। इसके अलावा इस पुल से सीमांत इलाकों तक सैनिकों की आवाजाही भी आसान होगी।

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अरुणाचल प्रदेश की निचली दिबांग घाटी में स्थित 200 मीटर लम्बा यह सिसेरी पुल जोनाई-पासीघाट-रानाघाट–रोईंग सड़क को जोड़ता है। यह पुल दिबांग घाटी और सियांग इलाके को जोड़ेगा। अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिये लम्बे अर्से से इस पुल की ज़रूरत बताई जा रही थी और स्थानीय नेता इसकी माँग कर रहे थे। यह पुल पासीघाट और रोईंग के बीच यात्रा में लगने वाले समय को करीब पांच घंटे कम कर देगा। यह पुल ट्रांस-अरुणाचल हाइवे का हिस्सा होगा जिसकी विशेष सामरिक अहमियत है।
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इस पुल का निर्माण सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने किया है। अरुणाचल प्रदेश व अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों की आर्थिक बेहतरी और  राष्ट्रीय अखंडता की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सीमांत इलाक़े विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) को मंजूर किया है जिसके तहत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश और अन्य पड़ोसी सीमांत राज्यों में ढांचागत विकास परियोजनाएं शुरू की हैं। 

इसके अलावा अत्यधिक दुर्गम तवांग शहर तक जाने वाली एक रेलवे लाइन भालुपकोंग–टेंगा-तवांग को चालू किया जाएगा और पासीघाट हवाई अड्डे का निर्माण किया जाएगा। होलोंगी हवाई अड्डे को भी बनाने की मंजूरी दी जा चुकी है। जिस तवांग मठ शहर को चीन अपना बताता है, वहां तक जाने के लिये सेला पास टनेल को भी बनाने की मंजूरी दी गई है। इस पूरे इलाके में एक सक्षम रेलवे,  राजमार्ग, हवाई मार्ग, जल मार्ग और डिजिटल नेटवर्क का जाल बिछाने की योजना है। 

ढांचागत विकास की इन योजनाओं के लागू होने से राज्य की अर्थव्यवस्था को चार चांद लगेंगे और स्थानीय लोगों को अपने घरों में ही रोजगार मिलेगा।
अरुणाचल प्रदेश में इन दिनों चार बड़े ढांचागत  प्रोजेक्टों पर काम हो रहा है जिनमें वर्तक, अरुणांक, ब्रह्मांक और उडयक नाम के प्रोजेक्टों पर काम तेजी पकड़ चुका है। सीमा सड़क संगठन द्वारा बनाए जा रहे इन ढांचागत प्रोजेक्टों की बदौलत भारत की सामरिक ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा और इससे पूरे इलाके के सामाजिक-आर्थिक हालात को भी बदलने का अनोखा अवसर पैदा होगा। 
रंजीत कुमार
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