राष्ट्रव्यापी असंतोष की पृष्ठभूमि में विवेकशील नागरिक और सक्रिय विपक्ष की ज़िम्मेदारी सत्तापक्ष को सवालों के कठघरे में खड़ा करने की रहती है। प्रधानमंत्री होने के नाते इंदिरा गांधी अपनी ज़िम्मेदारी को न्यायसंगत ढंग से निभाने में विफल रहीं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यद्यपि, उन्होंने संविधान प्रदत अधिकारों का प्रयोग किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने भी इंदिरा -कैबिनेट के फ़ैसले पर मोहर लगाई थी। लेकिन, संविधान सम्मत सही होते हुए भी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और काबीना मंत्रियों ने लोकतांत्रिक तक़ाज़ों व राजनैतिक नैतिकता के साथ विश्वासघात किया ही था; बाबू जगजीवनराम, हेमवती बहुगुणा, विद्याचरण शुक्ल, सिद्धार्थशंकर रे, प्रणब मुखर्जी, कमलापति त्रिपाठी, उमाशंकर दीक्षित, अर्जुन सिंह, नरसिंह राव, शंकरदयाल शर्मा जैसे दिग्गजनेता सरकार व पार्टी से सामूहिक इस्तीफ़ा दे सकते थे। युवातुर्क चंद्रशेखर, मोहन धारिया जैसे नेताओं ने भी तो विद्रोह किया था। इंदिरा गांधी पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाना था। लेकिन, सभी सत्ता - मलाई से चिपके रहना चाहते थे। मेरी दृष्टि में, इमरजेंसी लगाने के लिए जितनी ज़िम्मेदार इंदिरा गांधी थीं, उतने ही ज़िम्मेदार उनके वरिष्ठ साथी भी थे।
इंदिरा गांधी की घोषित इमरजेंसी के दौरान राष्ट्र अनुशासनबद्ध हुआ; सरकारी दफ्तरों में समयबद्ध कार्यशैली शुरू हुई; ट्रेनें समय से चलने लगीं; स्कूलों में शिक्षा व विद्यार्थी की उपस्थिति बढ़ी; ग्रामीण भारत में सामंती शक्तियां कमज़ोर हुईं; पुश्तैनी बंधक श्रमिक आज़ाद होने लगे; महाजन से ऋण मुक्ति होने लगी; प्राथमिक सरकारी चिकित्सालयों की स्थिति में आंशिक सुधार हुआ; भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगी जैसे सकारात्मक काम भी हुए। वस्तुगत दृष्टि में इन कामों की अनदेखी करना पूर्वाग्रह से ग्रस्त होना रहेगा। यह उजला पक्ष था। लेकिन, इमरजेंसी का दूसरा पक्ष भयावह है। काला है।