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विकास मारा गया तो ख़ुशी क्यों?

हम किसी विकास के मारे जाने पर ख़ुश तो होते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि विकास पैदा कैसे होते हैं और कैसे देश के गली–कूचों में ‘विकासों’ की पौध पुष्पित–पल्लवित होती हैं। उन्हें खाद-पानी देने वाला तंत्र क्यों नहीं एनकाउंटर में मारा जाता? 
एन.के. सिंह

मानवाधिकार को लेकर बौद्धिक जुगाली करने वालों के लिए खूंखार अपराधी विकास दुबे का पुलिस द्वारा मारा जाना ‘एक्स्ट्रा-जुडिशल किलिंग’ है। जिस तरह एनकाउंटर हुआ, औसत ज्ञान वाला व्यक्ति भी कह सकता है कि यह पुलिस का एक ‘प्रतिशोध’ ड्रामा है। फिर भी आम लोग इस बात से खुश हैं कि ‘अतातायी’ मारा गया। वे भूल रहे हैं कि राजनीतिक और आला पुलिस का बड़ा तबक़ा इस बात से ख़ुश है कि अगर वह ज़िंदा रहता तो सत्ता और विपक्ष में बैठे नेताओं और अफसरों के साथ अपने ‘दुरभिसंधि’ का खुलासा करता। भले ही लोगों की ख़ुशी इस बात की तसदीक है कि उनका विश्वास न्याय प्रक्रिया में नहीं है, लेकिन सिस्टम से बाहर समाधान अंततः एक ख़तरनाक स्थिति की ओर ले जाता है। 

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क्या बेहतर न होता कि जनता और मीडिया इस बात के लिए दबाव डालते कि विकास को ‘सच बोलने की दवा’ (सोडियम पेंटोथाल) देकर किसी स्वतंत्र जाँच एजेंसी से पूछताछ करवाई जाए और पूरा बयान सार्वजनिक किया जाए। विकास 30 सालों तक हत्या-दर-हत्या करता रहा और आतंक का साम्राज्य खड़ा करता रहा लेकिन तब यही पुलिस नहीं जागी, बल्कि पुलिस ही नहीं राजनीतिक वर्ग इसका इस्तेमाल करता रहा। इन्हीं ख़ुश होने वालों में एक वर्ग ‘ब्राह्मण शिरोमणि’ बना कर विकास का ‘विकास’ करता रहा। 

इस बार भी अगर विकास उस उपाधीक्षक को, जिसने इसे गिरफ्तार करने का बीड़ा उठाया था, व्यक्तिगत तौर पर मार दिया होता तो शायद न तो सरकार और उसकी पुलिस में ग़ुस्सा होता, न ही आज ख़ुश होने वाली जनता को विकास पर ग़ुस्सा आता। वह अपनी ज़िंदगी की जद्दोजहद में लगी रहती है ‘कोऊ नृप होहिं हमें का हानि’ के शाश्वत भाव में।

हैदराबाद में चिकित्सिक के बलात्कार और हत्या के बाद पुलिस द्वारा चार गिरफ्तार आरोपियों को ‘मुठभेड़’ में मारा गया तब भी देश ऐसे ही खुश हुआ था।

हम किसी विकास के मारे जाने पर ख़ुश तो होते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि विकास पैदा कैसे होते हैं और कैसे देश के गली–कूचों में ‘विकासों’ की पौध पुष्पित–पल्लवित होती हैं। उन्हें खाद-पानी देने वाला तंत्र क्यों नहीं एनकाउंटर में मारा जाता? विकास ने जब पाँच मर्डर किये, दहशत फैला कर ज़मीनें हड़पीं, नेताओं को ‘ब्राह्मण शिरोमणि’ के रूप में ‘रोबिन्हुड इमेज’ बना कर वोट दिलवाए और ख़ुद और अपने परिवार को पंचायत चुनावों में ‘निर्विरोध’ जितवाया तो न तो पुलिस को ग़ुस्सा आया, न ही जनता को। जनाक्रोश हो लेकिन विनय के ‘आकाओं’ को ख़त्म करने के लिए, न कि मोहरे को मारने के लिए। 

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सिस्टम को चलाने वालों ने ही नहीं आसपास के लोगों ने इसकी जघन्यता को ‘टैलेंट’ माना। ख़ुद विकास का कुछ साल पहले मीडिया को दिया गया बयान है ‘बहन जी (बहुजन समाज पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश) मुझे 500 लोगों के बीच नाम से बुलाती हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा सहित कई पार्टियाँ मुझे बुला रही हैं, लेकिन मैं बहन जी को नहीं छोड़ सकता’। यानी सिस्टम बनाने –बिगाड़ने वाले इसकी ‘प्रतिभा’ से बेहद मुतास्सिर थे। अपने इलाक़े में वह ‘ब्राह्मण शिरोमणि पंडित विनय दुबे’ के नाम से आदर पाता रहा है। 

अगर सिस्टम ने पहली जघन्य हत्या के बाद ही इसे सही रूप से पहचान लिया होता तो एक बबूल काँटों का जंगल न बना होता। आज उस इलाक़े का हर युवा ‘विकास’ बनना चाहता है और एक भी पुलिस उपाधीक्षक या दरोगा या सिपाही नहीं, जो इसकी गोली के शिकार हुए। सिस्टम हमारे आइकॉन भी बदल देता है।

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