ऐसे बयानों के बावजूद, उन्होंने ब्रुकलिन के प्रगतिशील यहूदी इलाक़ों में 68% वोट पाए।
उनकी बात यह नहीं थी कि वे यहूदियों के विरोधी हैं, बल्कि यह कि वे साम्राज्यवाद के विरोधी हैं। उन्होंने लिखा— “ज़ायोनिज़्म की अति वही राष्ट्रवाद है जिससे हमारा परिवार भागा था।” इकोनॉमिस्ट ने लिखा— “यह वह बारीकी है जो आज की ध्रुवीकृत राजनीति में दुर्लभ है — उन्होंने वामपंथ को रीढ़ दी है।”
वॉशिंगटन पोस्ट ने उनके “गरीबी को अपराध मानने की नीति” को “न्याय की नयी परिभाषा” कहा। उनकी सोच, जो “आवास को मानव अधिकार” और “निगरानी वाले पुलिस तंत्र को खत्म” करने तक जाती है, उनके पिता की उपनिवेश-विरोधी दृष्टि से उपजी है — “सत्ता किसी के पास नहीं होती, वह निभाई जाती है, और उसे बदला जा सकता है।”
यह नारे नहीं हैं, बल्कि एक नये समाज की रूपरेखा हैं।
अब सवाल है— क्या ममदानी की यह जीत अकेली घटना है या बड़े बदलाव की शुरुआत? दरअसल, यह अमेरिका के राजनीतिक नक्शे में दरार का पहला संकेत है।
पहला, समाजवादी एजेंडा — जिस देश में “सोशलिज़्म” शब्द आज भी डर पैदा करता है, वहाँ ममदानी ने नगर स्तर पर “सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा” और “मज़दूर सहकारी संस्थाएँ” जैसी नीतियाँ रखीं। वर्किंग फैमिलीज़ पार्टी से लेकर AFL-CIO तक, सबने समर्थन दिया। यह जीत सिएटल और मिनियापोलिस जैसे शहरों में भी नयी ऊर्जा भर देगी। अब “ममदानी क्लॉज़” के नाम से स्थानीय संविधान में बदलावों की चर्चा शुरू है — लोक बैंकों का गठन, सार्वजनिक स्वामित्व, और किरायेदार अधिकारों का विस्तार। जनता को यूटोपिया नहीं चाहिए — उसे बस वर्तमान का डिस्टोपिया असहनीय लग रहा है।