समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आगरा में अपने दलित सांसद रामजीलाल सुमन के आवास पर पहुंचकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने करणी सेना को 'योगी सेना' करार देते हुए आरोप लगाया कि यह संगठन सरकार के इशारे पर दलितों और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहा है। यह दौरा न केवल सुमन के समर्थन में एकजुटता का प्रदर्शन था, बल्कि सपा की 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (पीडीए) रणनीति के तहत दलित वोटों को साधने का एक रणनीतिक अभियान भी था। इस घटनाक्रम ने यूपी की सियासत में सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया है।

आगरा से सपा के राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन ने संसद में 16वीं सदी के राजपूत शासक राणा सांगा को "गद्दार" कहा था। सुमन ने इतिहास के हवाले से दावा किया था कि राणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाकर इब्राहिम लोदी को हराने में मदद मांगी थी। इस बयान से नाराज करणी सेना ने 26 मार्च को सुमन के आगरा स्थित संजय प्लेस आवास पर हमला किया, जिसमें उनकी गाड़ियों और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद 12 अप्रैल को करणी सेना ने राणा सांगा की जयंती पर आगरा में 'रक्त महास्वाभिमान सम्मेलन' आयोजित कर सुमन की राज्यसभा सदस्यता रद्द करने की मांग की। इस आयोजन में केंद्रीय मंत्री सत्य पाल सिंह बघेल और भाजपा विधायक धर्मराज सिंह भी शामिल थे। इस कार्यक्रम में खुलेआम तलवारें लहराई गईं और उत्तेजक नारे लगाए गए।

सुमन ने अपने बयान पर माफी मांगने से इनकार कर दिया और कहा कि उन्होंने केवल ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर किया। इस विवाद ने यूपी में जातिगत और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाया, जिसका फायदा उठाने के लिए अखिलेश यादव ने आगरा का दौरा किया।

आगरा में अखिलेश यादव के साथ डॉ रामजीलाल सुमन

अखिलेश यादव शनिवार को इटावा से सड़क मार्ग के जरिए आगरा पहुंचे और सुमन के आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने करणी सेना को "योगी सेना" बताते हुए कहा, "यह संगठन सरकार के इशारे पर दलितों और अल्पसंख्यकों को डराने का काम कर रहा है। अगर सुमन या सपा के किसी अन्य नेता के साथ कोई घटना होती है, तो इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिम्मेदार होंगे।" उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि करणी सेना को भाजपा फंडिंग कर रही है और पुलिस इस मामले में निष्क्रिय बनी हुई है।

अखिलेश ने कहा, "इतिहास के पन्नों को उजागर करने में कोई गलती नहीं है। सपा सामाजिक न्याय के लिए लड़ रही है, और पीडीए हमारी ताकत है।" इस दौरान उन्होंने सपा की पीडीए रणनीति को बार-बार दोहराया, जिसका लक्ष्य दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को एकजुट करना है। सुमन के समर्थन में खड़े होकर अखिलेश ने दलित समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की कि सपा उनके साथ खड़ी है, खासकर तब जब उन्हें ऊंची जातियों के संगठनों से धमकियां मिल रही हों।

सपा प्रमुख ने कार्यकर्ताओं से सोशल मीडिया पर उत्तेजक पोस्ट से बचने की अपील की, लेकिन साथ ही करणी सेना को खुली चुनौती दी, "मैं अकेले आगरा आया हूं। अगर करणी सेना को चुनौती देनी है, तो मैदान तैयार है।" यह बयान न केवल सपा के कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए था, बल्कि दलित समुदाय को यह विश्वास दिलाने के लिए भी था कि सपा उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

यूपी की राजनीति पर प्रभाव




सपा लगातार दलितों को लक्ष्य कर अपने कार्यक्रम कर रही है। अखिलेश का शनिवार का दौरा भी इसी कड़ी में था। इसके अलावा कुछ और भी मुद्दे हैंः





जातिगत ध्रुवीकरण: सुमन के बयान और करणी सेना के हमले ने राजपूत और दलित समुदायों के बीच तनाव पैदा किया है। करणी सेना के आयोजन में भाजपा नेताओं की मौजूदगी ने इसे सियासी रंग दे दिया। अखिलेश की नज़र इसी पर है। ताकि दलित और गैर-यादव ओबीसी वोटों को सपा की ओर खींचा जा सके। हालांकि, इससे राजपूत वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो सकता है, जो पहले से ही इस समुदाय का बड़ा समर्थक माना जाता है।

पीडीए रणनीति को बल: 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने पीडीए रणनीति पर जोर दिया था, लेकिन बसपा के मजबूत दलित वोट बैंक और भाजपा की आक्रामक हिंदुत्व रणनीति के सामने यह पूरी तरह सफल नहीं हुई। सुमन के समर्थन में अखिलेश का यह कदम दलितों को यह संदेश देता है कि सपा उनकी आवाज बन सकती है। यह खासकर उन दलित मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है जो बसपा से नाराज हैं।

भाजपा पर दबाव: अखिलेश ने करणी सेना को 'योगी सेना' बताकर भाजपा को कटघरे में खड़ा किया है। यह आक्षेप कि सरकार हिंसक संगठनों को संरक्षण दे रही है, सपा को अल्पसंख्यक और दलित वोटरों के बीच नैरेटिव बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि, भाजपा इसे हिंदुत्व और राजपूत गौरव के मुद्दे के रूप में पेश करके अपने कोर वोटरों को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।

मायावती का रुख: बसपा प्रमुख मायावती इस घटनाक्रम से काफी परेशान हैं। मायावती ने सुमन के बयान की निंदा की और अखिलेश को 1995 के गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाई। यह दलित वोटों को बसपा की ओर खींचने की कोशिश है। मायावती की यह सक्रियता सपा की पीडीए रणनीति के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि दलित मतदाता अभी भी बसपा को अपनी पहली पसंद मानते हैं।

2027 विधानसभा चुनाव की जमीन: यह विवाद 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी जमीन तैयार कर रहा है। सपा दलित और गैर-यादव ओबीसी वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा हिंदुत्व और ऊंची जातियों के समर्थन को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। यह तनाव पश्चिमी यूपी, खासकर आगरा जैसे क्षेत्रों में, जहां दलित और राजपूत दोनों की अच्छी-खासी आबादी है, चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

अखिलेश के दौरे और सुमन पर पहले हुए हमले को देखते हुए आगरा में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। सुमन के आवास के आसपास त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था थी, जिसमें नौ कंपनी पीएसी, सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन शामिल थे। पुलिस ने सुमन के घर पर हमले के सिलसिले में एफआईआर दर्ज की और कुछ लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन सपा का आरोप है कि मुख्य अपराधी अभी भी आजाद हैं। अखिलेश ने पुलिस की निष्क्रियता को भी मुद्दा बनाया, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ा है। करणी सेना के प्रदर्शन में तलवारें लहराए जाने पर पुलिस ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

अखिलेश यादव का आगरा दौरा सपा की पीडीए रणनीति को मजबूत करने और दलित समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश है। 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा और भाजपा दोनों दलित वोट बैंक के मद्देजनर सारे मुद्दों को देख रहे हैं। सपा को दलित वोटों को बसपा से छीनने और गैर-यादव ओबीसी को एकजुट करने में सफलता मिलती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इस मुद्दे को कितनी प्रभावी ढंग से भुना पाती है। दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह हिंदुत्व और राजपूत गौरव को मजबूत करने का मौका हो सकता है। लेकिन उसे दलित वोटों का नुकसान भी हो सकता है।