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ममता के 'झटकों' के बाद भी कांग्रेस क्यों बोली- टीएमसी के साथ काम करेंगे?

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लगातार 'झटकों' के बाद भी लगता है कि कांग्रेस को इससे कोई दिक्कत नहीं है। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले ही सोनिया गांधी के लिए तीखी टिप्पणी की थी। मेघालय में कांग्रेस के 17 विधायकों में से 12 को तृणमूल ने तोड़ कर अपने में मिला लिया है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को तृणमूल अपने दल में शामिल कर चुकी है। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस का बयान आया है कि वह बीजेपी के ख़िलाफ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करने के लिए तैयार है। उसने कहा है कि वह विपक्षी एकता चाहती है। 

दरअसल, आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे मीडिया को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'सोनिया गांधी के नेतृत्व में हमने आगामी संसद सत्र पर चर्चा की। हमें संसद में बहुत सारे मुद्दे उठाने हैं। 29 तारीख़ को हम एमएसपी और किसानों का मुद्दा उठाएंगे।'

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इसके आगे उन्होंने कहा, 'हम महंगाई, पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें और चीनी घुसपैठ के मुद्दे उठाएँगे। हम इन सभी मुद्दों पर चर्चा चाहते हैं। हम अन्य सभी दलों - तृणमूल और अन्य के साथ समन्वित दृष्टिकोण रखने के लिए समन्वय करेंगे।' उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि 'हम विपक्षी एकता चाहते हैं'।

कांग्रेस का यह बयान तब आया है जब आज ही यह ख़बर आई है कि बुधवार देर रात मेघालय कांग्रेस को जोरदार झटका लगा है। वह झटका किसी और से नहीं, बल्कि देश भर में विस्तार में जुटी तृणमूल कांग्रेस से लगा है। कांग्रेस छोड़ने वाले 12 विधायकों में पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा भी शामिल हैं।

बुधवार को ही तृणमूल नेता ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी को लेकर तीखी टिप्पणी की थी। दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मिलने वाली ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाक़ात को लेकर एक सवाल के जवाब में पहले तो कहा कि 'वे पंजाब चुनाव में व्यस्त हैं', लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि 'हमें हर बार सोनिया से क्यों मिलना चाहिए? क्या यह संवैधानिक बाध्यता है?' ममता बनर्जी के इस बयान में तल्खी तो दिखती ही है, इसके संकेत भी साफ़-साफ़ मिलते हैं। 

ममता के बयान को उस संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है जिसमें ममता अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का पूरे देश में विस्तार करने में जुटी हैं और उसमें कई नेता कांग्रेस छोड़कर शामिल हो चुके हैं।

ममता बनर्जी लगातार कांग्रेस के नेताओं को तोड़ रही हैं। गोवा से लेकर दिल्ली, हरियाणा और यूपी में जिन नेताओं को तृणमूल अपने खेमे में ला रही है उसमें सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस का ही हो रहा है। हाल ही में दिल्ली में कीर्ति आज़ाद टीएमसी में शामिल हुए हैं। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईजिन्हो फलेरो के अलावा महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं सुष्मिता देव, उत्तर प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे ललितेश पति त्रिपाठी और राहुल गांधी के पूर्व सहयोगी अशोक तंवर भी कांग्रेस से टीएमसी में शामिल हो गए हैं। 

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राजनीतिक हलकों में कांग्रेस नेताओं के तृणमूल यानी टीएमसी में जाने पर दोनों दलों के बीच रिश्तों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अब तक माना जाता रहा है कि ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच अच्छे समीकरण रहे हैं। दोनों नेता अक्सर विपक्षी एकता की बात करती रही हैं और बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के ख़िलाफ़ एकजुटता की बात करती रही थीं। जब ममता बनर्जी के दिल्ली आने की ख़बर आई तो भी इसका हवाला दिया गया था कि वह सोनिया गांधी से मिल सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

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हाल ही में कांग्रेस ने भी यह कहा था कि टीएमसी इस बात पर आत्ममंथन करे कि वह गोवा में चुनाव लड़कर बीजेपी को ही मज़बूत कर रही है। कांग्रेस ने तंज कसा था कि चुनाव कोई पर्यटन या सैर-सपाटा नहीं है।

बहरहाल, कांग्रेस के इस ताज़ा बयान के क्या मायने हैं? क्या कांग्रेस के इस बयान पर तृणमूल की सकारात्मक प्रतिक्रिया आएगी और क्या विपक्षी एकता पर बात आगे बनेगी?

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