भारतीय राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम का नाम अब ‘ओवैसी फ़ैक्टर’ के रूप में जाना जाता है। यह फ़ैक्टर मुख्य रूप से मुस्लिम वोट बैंक को प्रभावित करता है, जहां ओवैसी अल्पसंख्यक मुद्दों, सामाजिक न्याय और मुख्यधारा की पार्टियों की ‘अनदेखी’ पर हमला बोलते हैं। 2026 के असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में यह फ़ैक्टर कितना प्रभावशाली होगा? क्या AIMIM दोनों राज्यों में कुछ सीटें जीतकर वहां की विधानसभा में अपना खाता खोलेगी या सिर्फ वोट काटकर नतीजों को प्रभावित करेगी? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है और इसी सवाल का जवाब हर को जाना चाहता है।
पिछले दो चुनावों में AIMIM की मौजूदगी और असर
सबसे पहले असम पर नज़र डालें। 2016 के असम विधानसभा चुनाव में AIMIM ने अपना एक उम्मीदवार नहीं उतारा था। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 34% है, जो मुख्य रूप से लोअर असम और मिया (बंगाली मुस्लिम) बहुल क्षेत्रों में केंद्रित है। यहां अल्पसंख्यक वोटों को AIUDF (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के बदरुद्दीन अजमल ने मजबूती से प्रतिनिधित्व दिया। AIUDF ने 13 सीटें जीतीं, मुख्य रूप से मुस्लिम-बहुल विधानसभाओं में। BJP-AGP गठबंधन ने 86 सीटें हासिल कर सरकार बनाई, लेकिन AIUDF ने मुस्लिम वोटों को एकजुट रखकर कांग्रेस को कुछ नुकसान पहुंचाया। ओवैसी की पार्टी की अनुपस्थिति का मतलब था कि मुस्लिम वोट बंटवारा नहीं हुआ और AIUDF ने अपना वोट बैंक मजबूत रखा।2021 में स्थिति थोड़ी बदली। AIUDF महाजोत (कांग्रेस-नेतृत्व वाले गठबंधन) का हिस्सा था और उसने 16 सीटें जीतीं (वोट शेयर लगभग 8.43%)। AIMIM ने फिर असम में प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा। पार्टी की अनुपस्थिति ने AIUDF को फायदा दिया, लेकिन बीजेपी ने 60 सीटें जीतकर सरकार बनाई। ओवैसी फैक्टर यहां ‘अनुपस्थित’ रहा, इसलिए वोट बंटवारा नहीं हुआ। हालाँकि, AIUDF की सीटों में मामूली वृद्धि हुई, जो दर्शाता है कि मुस्लिम वोटरों ने गठबंधन को प्राथमिकता दी। कुल मिलाकर, 2016-2021 में AIMIM की असम में गैर-मौजूदगी ने नतीजों पर कोई नकारात्मक असर नहीं डाला; बल्कि AIUDF को मजबूती मिली।
पश्चिम बंगाल में AIMIM
पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग रही। 2016 के चुनाव में AIMIM ने कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं की। TMC ने मुस्लिम वोटों (राज्य में 27% मुस्लिम आबादी) को मजबूती से अपने पास रखा और 211 सीटें जीतीं। BJP सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई। ओवैसी फैक्टर का यहां कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि पार्टी अनुपस्थित थी। 2021 में AIMIM ने पहली बार पश्चिम बंगाल में क़दम रखा। ओवैसी ने मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में 6-7 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। कुल वोट शेयर महज 0.02% (10,852 वोट) रहा। कोई सीट नहीं जीती गई। उदाहरण के लिए, सागरदिघी में 1.9%, मालतिपुर में 0.9% वोट मिले। टीएमसी ने भारी जीत हासिल की। 213 सीटें जीतीं। बीजेपी तीन से सीधे 77 सीटों पर पहुंची। AIMIM की मौजूदगी ने टीएमसी के मुस्लिम वोटों में कोई खास बंटवारा नहीं किया क्योंकि वोट शेयर नगण्य था और टीएमसी की लोकप्रियता और ममता बनर्जी की अपील बहुत मजबूत थी।
नतीजतन, 2021 में ओवैसी फैक्टर ‘प्रतीकात्मक’ रहा, मुस्लिम मुद्दों को उठाया लेकिन चुनावी नतीजों को प्रभावित नहीं किया।
2026 चुनावों में AIMIM की रणनीति
2026 के चुनाव पूरी तरह अलग माहौल में हो रहे हैं। असम में 9 अप्रैल को एक चरण में मतदान है। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा। AIMIM की रणनीति दोनों राज्यों में अलग-अलग है।
असम में AIMIM कोई सीट नहीं लड़ रही। ओवैसी ने AIUDF का समर्थन किया है और 2-3 अप्रैल को गुवाहाटी समेत 8 रैलियां कीं। ओवैसी ने ‘मिया’ (बंगाली मुस्लिम) समुदाय को गेम-चेंजर बताया और हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार पर NRC, eviction और भेदभाव का आरोप लगाया। AIUDF अजमल के नेतृत्व में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों (जैसे धुबरी, गोलपारा, दिंह) में मजबूत है। पिछले चुनावों में AIUDF ने 13-16 सीटें जीतीं। ओवैसी की रैलियों से वोट एकीकरण संभव है। संभावना है कि AIUDF 18-22 सीटें जीत सकती है। पिछले चुनाव से 2-6 ज्यादा। ओवैसी का कैंपेन AIUDF को 2-3% अतिरिक्त वोट दिला सकता है, खासकर युवा और शहरी मुस्लिम वोटरों में। अगर चुनाव में BJP की स्थिति कमजोर रही और त्रिशंकु विधानसभा की स्थति बनती है तो AIUDF किंगमेकर बन सकती है।पश्चिम बंगाल में: यहाँ AIMIM ने AJUP यानी आम जनता उन्नयन पार्टी, पूर्व TMC नेता हुमायूं कबीर की पर्टी के साथ गठबंधन किया है। AJUP 182 सीटें लड़ रही, AIMIM 8-12 सीटें (पहली लिस्ट में रघुनाथगंज, आसनसोल उत्तर, कांदी, सुजापुर आदि)। फोकस मुस्लिम-बहुल जिले—मुर्शिदाबाद (66% मुस्लिम), मालदा (51%), उत्तर/दक्षिण दिनाजपुर। ओवैसी ने टीएमसी पर मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में सिर्फ 7% प्रतिनिधित्व देने का आरोप लगाया (राज्य में 27-30% मुस्लिम)।
AIMIM की जीतने की संभावना
पश्चिम बंगाल में AIMIM 1-2 सीटें जीत सकती है। ख़ासकर घनी मुस्लिम क्षेत्रों में जहां AJUP का आधार है। 2021 की तरह अगर वोट शेयर 1-2% रहा तो ज्यादातर सीटों पर जमानत जब्त होगी। लेकिन गठबंधन से वोट एकीकरण बेहतर होगा। AJUP-AIMIM मिलकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 5-8% वोट ले सकती है। यह गठबंधन मिलाकर 3-5 सीटें जीत सकता है।
'वोट डिवाइडर' या 'किंगमेकर?'
2026 में ओवैसी फैक्टर का असर मुख्य रूप से ‘वोट बंटवारे’ से आएगा। पश्चिम बंगाल में 2021 की तरह 35 सीटें 5,000 वोटों के मार्जिन से और 70 सीटें 15,000 वोटों से तय हुई थीं। मुस्लिम वोट TMC का मजबूत आधार है। अगर AIMIM-AJUP 10-15% मुस्लिम वोट खींच ले (खासकर उर्दू बोलने वाले और बंगाली मुस्लिम के बीच ब्रिज बनाकर), तो टीएमसी 10-15 सीटें BJP को गंवा सकती है।
टीएमसी ने AIMIM को ‘BJP का एजेंट’ बताया, लेकिन ओवैसी ने इनकार किया और पूछा कि 2016 में BJP की 3 सीटें 2021 में 77 कैसे हुईं।
असम में स्थिति उल्टी है। ओवैसी AIUDF का समर्थन कर मुस्लिम वोटों को एकजुट कर रहे हैं, जो बीजेपी विरोधी है। यहां फैक्टर ‘कंसोलिडेटर’ है। अगर AIUDF 20+ सीटें जीती, तो कांग्रेस-गठबंधन को फायदा। BJP के लिए चुनौती बढ़ेगी।
दोनों राज्यों में AIMIM की सीटें 0-2 रहने की संभावना (असम में 0, WB में 0-2)। लेकिन नतीजों पर असर 10-20 सीटों तक हो सकता है, ख़ासकर पश्चिम बंगाल में जहां हार-जीत का अंतर बहुत कम है। अगर टीएमसी या AIUDF कमजोर हुई तो बीजेपी को अप्रत्यक्ष लाभ। ओवैसी का दावा है कि वे मुस्लिम नेतृत्व को मजबूत कर रहे हैं, न कि वोट काट रहे। आलोचक कहते हैं कि यह बीजेपी को फायदा पहुंचाता है।
ओवैसी फैक्टर प्रभावकारी लेकिन सीमित
ओवैसी फैक्टर की ताक़त मुद्दों में है। NRC, eviction, सरकारी नौकरियां, सामाजिक न्याय। असम में मिया समुदाय यानि 34% मुस्लिम और पश्चिम बंगाल में 27% मुस्लिम इन मुद्दों से प्रभावित हैं। लेकिन कमज़ोरी भी यही है। AIMIM का संगठन अभी पूर्वी भारत में सीमित। 2021 पश्चिम बंगाल में 0.02% वोट शेयर इसका प्रमाण है। 2026 में गठबंधन से सुधार हुआ है। लेकिन पश्चिम बंगाल में टीएमसी और असम में AIUDF का स्थानीय आधार मज़बूत है। अगर चुनाव टाइट हुआ यानी कोई स्पष्ट लहर नहीं दिखी तो 5-10 सीटों का फर्क पड़ सकता है। असम में AIUDF को 2-6 अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी को 8-12 सीटों का नुकसान। कुल मिलाकर ओवैसी फैक्टर ‘डिस्टर्बेंस क्रिएटर’ है—सीधे राज नहीं बनाएगा लेकिन गणित बदल देगा।
2026 के असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में ओवैसी फैक्टर प्रभावकारी तो है, लेकिन सीमित। पिछले चुनावों में (2016-2021) इसका असर नगण्य रहा क्योंकि मौजूदगी कम थी। अब असम में सपोर्टिव रोल से AIUDF मजबूत होगी। उसे 18-22 सीटें मिल सकती हैं। पश्चिम बंगाल में गठबंधन से 1-2 सीटें और 10-15 सीटों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव। पार्टी की सीटें जीतने की संभावना कम (0-2), लेकिन नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता मध्यम है। यह मुस्लिम राजनीति को नई दिशा देगा—मुख्य पार्टियों को अल्पसंख्यक मुद्दों पर जवाबदेह बनाएगा। अंततः, ओवैसी फैक्टर न तो पूर्ण किंगमेकर है न सिर्फ वोट डिवाइडर। यह एक प्रेशर ग्रुप की तरह काम करेगा, जहां मुस्लिम वोटर अपनी आवाज़ मज़बूत करना चाहते हैं। चुनावी नतीजे 4 मई को बताएंगे कि यह फैक्टर कितना ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ।