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यूपी बीजेपी में बग़ावत, भगदड़, नेताओं की उड़ी नींद

उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची जारी हो रही है, भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं में ग़ुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। भगदड़ और बग़ावत तेज़ हो गयी है। अब तक चार वर्तमान सांसदों ने पार्टी छोड़ी है तो आधा दर्जन नेताओं ने टिकट कटने से नाराज़ होकर बग़ावती तेवर अपना लिए हैं। न चाहते हुए मार्गदर्शक मंडल में जाने को मजबूर किए गए मुरली मनोहर जोशी हों या कैराना से अकारण दरकिनार कर दी गयीं मृगांका सिंह, सभी अपनी अपनी नाराज़गी खुल कर ज़ाहिर कर रहे हैं। बलिया में सांसद भरत सिंह केंद्रीय नेतृत्व से ख़ता पूंछ रहे हैं तो बाराबंकी से प्रियंका रावत ने कार्यकर्त्ताओं के सामने रोकर अपना दुखड़ा सुनाया है। केंद्रीय मंत्री रही शाहजहांपुर की सासंद कृष्णाराज कोप भवन में चली गयी हैं, वहीं आजमगढ़ से पिछला चुनाव मुलायम से 64,000 मतों से हारने वाले रमाकांत यादव ने इस बार जौनपुर से टिकट न मिलने पर नतीजे भुगतने की चेतावनी दे डाली है।

अंशुल, दोहरे, फुले, श्यामाचरण ने पार्टी छोड़ी 

इटावा से लोकसभा टिकट न पाने से नाराज़ वर्तमान सांसद अशोक दोहरे ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। दोहरे का टिकट काटकर उनकी जगह आगरा के सांसद रामशंकर कठेरिया को टिकट दिया गया है। लोकसभा चुनावों का बिगुल बजने से काफ़ी पहले से बग़ावती तेवर अपनाए बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले भी कांग्रेस में पहुंच गयी हैं। सावित्री को कांग्रेस ने बहराइच से टिकट दे दिया है। हरदोई के सांसद अंशुल वर्मा ने नरेश से अनबन के चलते टिकट कटने पर भाजपा प्रदेश दफ्तर के चौकीदार को इस्तीफा सौंपा और सपा में शामिल होने की घोषणा कर दी।  इलाहाबाद के भाजपा सांसद श्यामाचरण गुप्ता न केवल सपा में गए बल्कि वहां से बांदा का टिकट भी पा लिया है। 
कुछ नेता भाजपा नेतृत्व से सवाल पूछ रहे हैं कि सबसे ज़्यादा दलितों के टिकट ही क्यों काटे गए हैं। क्या सबसे ख़राब प्रदर्शन दलित सांसदों का ही रहा है? आख़िर सबसे ज्यादा गाज उन्हीं पर क्यों गिराई गयी है?
बड़ी तादाद में राज्य स्तर के नेता बगावत पर उतारू हैं। सबसे ज़्यादा नाराज़गी पूर्वांचल में है, जहां भाजपा ने बड़ी सर्जरी करने के संकेत दिए थे, लेकिन एसा कुछ नही हुआ। जिनके टिकट कटे हैं वे अपनी ख़ता पूछ रहे हैं और पार्टी को सबक सिखाने की बात कह रहे हैं। बस्ती से वर्तमान सांसद हरीश दिवेदी को दोबारा लड़ाए जाने से फ़ैसले से आहत कुछ दिन पहले सपा से आए राजकिशोर नाराज़ हैं, तो संतकबीर नगर में जूता कांड से चर्चा में आए शरद त्रिपाठी के टिकट पर अब तक पार्टी कोई फ़ैसला नही ले पायी है। चर्चा है कि ब्राह्म्ण नाराज न हों, इसलिए शरद त्रिपाठी को देवरिया जाने या संतकबीरनगर से उनके पिता पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रमापतिराम त्रिपाठी को लड़ाए जाने की चर्चा है। बाराबंकी सांसद प्रियंका रावत रो रोकर साहनूभूति बटोरते हुए भाजपा को पलीता लगा रही हैं तो अपनी सीट पर भदोही के वीरेंद्र सिंह मस्त को भेजे जाने से नाराज़ बलिया सांसद भरत सिंह बग़ावत को हवा दे रहे हैं। बलिया में भाजपा प्रत्याशी को भू माफिया बताते हुए भाजपा के लोग नारे लगा रहे हैं।

मेनका को बाग़ियों से निपटना होगा

वरुण गांधी की जगह सुल्तानपुर भेजी गयी उनकी माँ मेनका गांधी के लिए सुल्तानपुर सीट पर बाबरी कांड के मुख्य अभियुक्त पूर्व विधायक पवन पांडे की नाराज़गी से निपटने की चुनौती है। पवन पांडे पिछला चुनाव बसपा के टिकट पर लड़कर 2.39 लाख वोट पा चुके हैं और इस बार भाजपा से टिकट मांग रहे थे। पवन पांडे समर्थकों का कहना है कि उन्हें प्रदेश सरकार में सम्मानजनक स्थान न दिया गया तो सजातीय मतों के सहारे वह कांग्रेस के पक्ष में बाजी पलट सकते हैं। मेनका के सामने कांग्रेस के डा. संजय सिंह हैं।
अंतिम क्षणों में मेनका के सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने के फ़ैसले से वहां के नेता पवन पांडे ख़फ़ा हैं। पवन ने 30 मार्च को सुल्तानपुर के एतहासिक बिजथुआ महादेव मंदिर में अपने समर्थकों की सभा बुलाई है, जहाँ वह अपने अगले कदम का एलान करेंगे।

हिन्दु युवा वाहिनी भी नाराज़

योगी के अपने संगठन हिन्दू युवा वाहिनी में भी नाराजगी के सुर सुनाई पड़ रहे हैं। वाहिनी में ज़्यादातर नेता क्षत्रिय बिरादरी के हैं और वे पूर्वांचल में बड़ी तादाद में ब्राह्म्णों को टिकट दिए जाने से नाराज़ है। उनका ग़ुस्सा बस्ती में हरीश, कुशीनगर में विजय दुबे और देवरिया में फिर किसी त्रिपाठी को ही लड़ाए जाने को लेकर है। वाहिनी का कहना है कि अगर गोरखपुर में भी उनके मनमुताबिक टिकट नही दिया गया तो कार्यकर्त्ता घर ही बैठेंगे, चुनाव जिताने नही उतरेंगे।
कुमार तथागत
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