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पंजाब: आत्मघाती गोल दागने पर क्यों तुले हैं कांग्रेस नेता?

कांग्रेस की हालत ये है कि दिल्ली में सक्रिय तमाम बड़े नेताओं से लेकर राज्यों तक में पार्टी के क्षत्रपों के बीच घमासान मचा हुआ है। दिल्ली में G-23 गुट ने सोनिया गांधी की नींद उड़ाई हुई है तो केरल से लेकर राजस्थान और पंजाब से लेकर उत्तराखंड तक जबरदस्त गुटबाज़ी है और पार्टी नेता बीजेपी से लड़ने के बजाए आपस में ही गुत्थम-गुत्था हो रहे हैं और वो भी पार्टी की बैठकों में नहीं खुलेआम मीडिया के सामने। 

पंजाब कांग्रेस में इन दिनों कुछ ऐसा ही हाल है। 2015 में हुए गुरू ग्रंथ साहिब की बेअदबी और कोटकपुरा गोलीकांड मामले में नवजोत सिंह सिद्धू ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हुआ है। इसके बाद अमरिंदर सिंह ने भी पलटवार किया और विजिलेंस विभाग ने सिद्धू के ख़िलाफ़ कुछ मामलों में चल रही जांच को तेज़ कर दिया। 

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आमने-सामने आए नेता 

इस बीच पंजाब सरकार के सात मंत्री अमरिंदर सिंह के पक्ष में आगे आ गए और सिद्धू के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की मांग कांग्रेस आलाकमान से की। लेकिन दूसरी ओर, अमरिंदर सिंह के सियासी विरोधी सिद्धू के साथ आ खड़े हुए हैं। इनमें प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद प्रताप सिंह बाजवा से लेकर विधायक परगट सिंह शामिल हैं। इसके अलावा राज्य सरकार के मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी कैप्टन पर हमलावर हैं और सुखजिंदर सिंह रंधावा कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे चुके हैं। 

‘किसी की कोई सुनवाई नहीं’

प्रताप सिंह बाजवा ने ‘आज तक’ से बातचीत में कहा कि पंजाब में ऐसा लग ही नहीं रहा है कि यहां कोई चुनी हुई सरकार है और ऐसा लग रहा है कि गवर्नर का राज है। उन्होंने कहा कि अमरिंदर राज में तीन अफ़सरों के अलावा किसी मंत्री, विधायक या कार्यकर्ता की कोई सुनवाई नहीं है। 

बाजवा कहते हैं कि अगर कैप्टन को विजिलेंस विभाग का इस्तेमाल करना ही था तो बीते साढ़े चार साल में बादलों यानी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके परिवार के ख़िलाफ़ करना चाहिए था न कि सिद्धू के ख़िलाफ़।

दख़ल दे हाईकमान 

बाजवा ने कहा कि उन्होंने हाईकमान से गुजारिश की कि वह इस मामले में दख़ल दे। उन्होंने कहा कि राज्य के कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत से लेकर हाईकमान, हर कांग्रेस विधायक की बात सुने और ज़मीनी हालात की जानकारी ले। 

हालात इतने ख़राब हो चुके हैं कि अमरिंदर सरकार के मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स करने वाले थे लेकिन हरीश रावत को चन्नी को फ़ोन करके कहना पड़ा कि चन्नी अभी इसे टाल दें और वह जल्द ही मामले में दख़ल देंगे। 

बाजवा के मुताबिक़, चन्नी के साथ पांच मंत्री और सात विधायक मौजूद थे। चन्नी के घर पर इन नेताओं की बैठक भी हुई और ये ख़बर सामने आते ही साफ हो गया कि अमरिंदर के विरोध में भी एक मजबूत खेमा तैयार हो चुका है।

अमरिंदर सिंह की कार्यशैली 

इस घमासान के लिए आख़िर जिम्मेदार कौन है, इस पर भी बात करनी ही होगी। यहां ये बात अहम है कि जिस बात को लेकर सिद्धू अमरिंदर से नाराज़ हैं, उसी बात को लेकर बाजवा और रंधावा भी। तीनों का यही कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि वे सरकार बनने पर गुरू ग्रंथ साहिब की बेअदबी और कोटकपुरा गोलीकांड मामले में दोषी लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे लेकिन साढ़े चार साल बीतने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। 

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तीनों नेताओं का कहना है कि पंजाब की जनता के साथ इंसाफ़ नहीं हुआ है और अमरिंदर सिंह ने बादल परिवार को बचाने की कोशिश की है। अमरिंदर सिंह भी इस मामले में पाक साफ नहीं हैं, वरना उनके विरोध में इतनी सारी आवाज़ें एक साथ बुलंद नहीं होतीं। 

मीडिया में बयानबाज़ी

सीधी बात यही समझ में आती है कि लगातार दो लोकसभा चुनाव में और कई राज्यों में करारी हार, कई बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने के बाद भी कांग्रेस नेता मीडिया में बयानबाज़ी करना बंद नहीं कर रहे हैं। जिस भी नेता को अपनी बात कहनी है वो मीडिया में आकर कहता है जिससे पार्टी की सड़कों पर फज़ीहत होती है और सियासी नुक़सान भी ज़्यादा होता है। 

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लेकिन दूसरी ओर बीजेपी है, जहां जो फ़ैसला हाईकमान करता है, वो हर नेता मानता है, हाल ही में असम में सर्बानंद सोनोवाल की जगह जब हिमंत बिस्व सरमा को मुख्यमंत्री बनाया गया तो कहीं से ऐसा नहीं लगा कि सोनोवाल ने किसी तरह की बग़ावत की हो। 
इस तरह कांग्रेस में चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो या राज्यों में, जिस तरह का घमासान पार्टी में मचा है, उससे कांग्रेस आलाकमान पर ही सवाल खड़े होते हैं कि वह न तो बड़े नेताओं पर लगाम लगा पा रहा है और न ही राज्यों के क्षत्रपों पर।

सियासी नुक़सान संभव 

पंजाब में 8 महीने के बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। बाजवा, सिद्धू सहित अमरिंदर समर्थक नेताओं की बयानबाज़ी इसी तरह जारी रही तो निश्चित रूप से पार्टी को इसका सियासी खामियाजा उठाना ही पड़ेगा। लेकिन सवाल हाईकमान से ही पूछा जाएगा कि वह आख़िर पार्टी नेताओं के बीच होने वाले इन मसलों को लेकर सख़्त रूख़ क्यों नहीं अख़्तियार करता। 

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