“जिस आदमी में रीढ़ की हड्डी न हो, वह जानवर बन जाता है और इंसानियत से भी परे चला जाता है।”
ज्ञानू ने यह वाक्य पढ़ा तो उनका ख़ून ख़ौल उठा। क़िताब को फर्श पर पटका। संयोग से वही पन्ना ऊपर खुला रहा। उन्हें लगा, लेखक ने यह क़िताब दुनिया के लिए नहीं, उन्हीं को बेइज्ज़त करने के लिए लिखी है। वे उठे और जूते से पन्ने को रौंद दिया। फिर कमरे से बाहर निकल गए। आख़िर आदमी कितना अपमान सहे! वह भी ऐसा अपमान, जिसमें उसका नाम तक न लिया गया हो।
ज्ञानू की परेशानी यह थी कि आजकल उन्हें हर तरफ अपना ही ज़िक्र सुनाई देता था। कोई चापलूस कहता, कोई रीढ़-विहीन। कुछ लोग उन्हें केंचुआ कहते थे। ज्ञानू जहाँ देखते, उन्हें केंचुए दिखाई देते। बस एक जगह केंचुआ नहीं दिखाई देता था—अपने भीतर।
आदमी जब अपना चेहरा देखने से डरने लगे, तो उसे हर आईने में साज़िश नज़र आती है।
वैसे ज्ञानू का असली नाम ज्ञानेश्वर था। माता-पिता ने सोचा था, बेटा ज्ञान का देवता बनेगा। बचपन में वह पढ़ने-लिखने में तेज़ था। ग़लत बात पर सवाल पूछता था और कभी-कभी अध्यापक से भी बहस कर लेता था। उसके भीतर स्वाभिमान था, स्वतंत्र विचार थे और रीढ़ की हड्डी भी थी। यानी वह मनुष्य था। लेकिन नौकरी में आते ही उसकी महत्वाकांक्षा ने बताया कि मनुष्य होना और सफल होना दो अलग-अलग योग्यताएँ हैं।
उसने देखा कि जो लोग नियमों की बात करते थे, वे फाइलों में दबे पड़े थे और जो साहब की आँखों की भाषा समझते थे, वे कुर्सियाँ बदल रहे थे। ज्ञानेश्वर ने आत्ममंथन किया। उसे अपनी ही गलती दिखाई दी। वह मनुष्य बना हुआ था!
उसने पहला पुनर्जन्म कुत्ते की योनि में लिया।
कुत्ता बनने के लिए उसे कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ा। बस साहब के सामने पूँछ हिलानी थी, उनकी हर बात पर सहमति जतानी थी और उनके विरोधियों को देखते ही भौंकना था। उसने जल्दी ही सीख लिया कि साहब की ग़लत बात को सही साबित करना चापलूसी नहीं, प्रशासनिक कौशल है। साहब हँसें तो वह हँसे, साहब नाराज हों तो वह उनसे ज्यादा नाराज़ हो जाए। साहब किसी को महान कहें तो वह उसकी महानता के प्रमाण जुटाए, साहब उसी आदमी को गद्दार बता दें तो वह उसके ख़िलाफ़ पुरानी फाइलें निकाल लाए।
कुत्ते की वफ़ादारी ने उसे पुरस्कार और पदोन्नति दिलाई। लेकिन एक दिन उसने देखा कि कुत्ता चाहे कितना भी वफ़ादार हो, कुर्सी पर मालिक ही बैठता है। वफ़ादारी से हड्डी मिल सकती है, हक़ नहीं। ज्ञानू को हक चाहिए था। उसने लोमड़ी की योनि धारण कर ली।
अब वह केवल हाँ में हाँ नहीं मिलाता था, बल्कि ऐसी चाल चलता कि सामने वाला अपनी ही बात में फँस जाए। वह झूठ बोलता तो उसमें एकाध सच मिला देता। किसी की शिकायत करता तो उसे व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, संस्था की चिंता बताता। अपनी चालाकी को दूरदर्शिता और दूसरों की ईमानदारी को अनुभवहीनता कहता।
उसने एक नया सिद्धांत बनाया—सच वह नहीं जो हुआ हो, सच वह है जिसे साबित करने की ज़िम्मेदारी तुम्हारे विरोधी पर डाल दी जाए।
लेकिन लोमड़ी की भी सीमा थी। चालाक आदमी पर लोग भरोसा कम करते हैं। ज्ञानू ने सोचा कि अब कुछ भय पैदा करना चाहिए। वे भेड़िया बन गए।
अब वे नियमों की किताब लेकर बैठते और उसमें से विरोधियों के लिए धारदार धाराएँ निकालते। अपने आदमी की ग़लती मानवीय भूल थी, विरोधी की ग़लती लोकतंत्र पर हमला। अपने पक्ष का झूठ रणनीति था, दूसरे पक्ष का सच भी संदिग्ध। वे दहाड़ते कम नहीं थे। मगर दहाड़ते समय यह ध्यान रखते कि सामने वाला कमज़ोर हो और पीछे कोई बड़ा मालिक खड़ा हो।
जल्दी ही विरोधी उनसे डरने लगे लेकिन समस्या यह हुई कि मालिक भी उनसे डरने लगे। सत्ता को ऐसा कुत्ता चाहिए जो ज़रूरत पर काटे, भेड़िया नहीं जो कभी मालिक को भी काट सकता हो।
ज्ञानू ने तत्काल बिल्ली का जन्म लिया।
बिल्ली ने उन्हें दबे पाँव चलना सिखाया। अब वे हर कमरे में मौजूद रहते, मगर किसी घटना की ज़िम्मेदारी में मौजूद नहीं मिलते। जिस फाइल से लाभ हो, वह आगे बढ़ जाती; जिस फाइल से आफ़त आए, वह नियमों की भूलभुलैया में खो जाती। उन्होंने चूहे की योनि भी धारण की, ताकि जरूरत पड़ने पर किसी भी बिल में घुस सकें।
उनका नया सूत्र था—जहाँ श्रेय मिले, वहाँ हाज़िर रहो; जहाँ जवाबदेही हो, वहाँ ग़ायब।
कुछ समय तक सब ठीक चला। फिर मीडिया ने उनकी पुरानी फाइलें खोलनी शुरू कर दीं। सवाल उठे, दस्तावेज़ सामने आए और आरोपों की बौछार होने लगी। ज्ञानू ने पाया कि चालाकी और डर से हर मुसीबत नहीं टलती। कुछ मुसीबतें ऐसी होती हैं जिनसे बचने के लिए आदमी को शर्म छोड़नी पड़ती है।
उन्होंने सुअर की योनि में जन्म लिया।
अब उनकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई कि आलोचना उस पर पड़कर लौट जाती। पत्रकार पूछते, “आप पर गंभीर आरोप हैं। क्या कहेंगे?”
ज्ञानू कहते, “ये निराधार हैं।”
पत्रकार दस्तावेज़ छापते।
वे कहते, “जाँच होनी चाहिए।”
पत्रकार पूछते, “जाँच तो आपके ही विभाग को करनी है?”
वे मुस्कराते, “संस्था की प्रक्रिया पर भरोसा रखिए।”
इस तरह सवाल पूछने वाला ही असहज हो जाता। आरोपों का जवाब देने के बजाय ज्ञानू आरोप लगाने वाले की नीयत पर सवाल उठाने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने समझ लिया कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित आदमी वह नहीं है जिस पर आरोप न हों, बल्कि वह है जिसे आरोपों से शर्म न आती हो।
शर्म आदमी को रोकती है; बेशर्मी उसे पदोन्नति के लिए उपलब्ध कराती है।
इन योनियों की यात्रा में ज्ञानू ने खूब तरक्की की। कुत्ते की वफादारी, लोमड़ी की चालाकी, भेड़िए की दहशत, बिल्ली की चुप्पी, चूहे की बच निकलने की कला और सुअर की मोटी चमड़ी—सब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए। मगर एक पुरानी बीमारी अब भी बची थी। उनकी रीढ़ कभी-कभी सीधी होने की कोशिश करती थी।
किसी निर्दोष पर अन्याय होता तो भीतर से आवाज़ आती। कोई ग़लत आदेश मिलता तो विवेक सिर उठाता। कोई सत्ता का आदमी कानून को अपनी ज़ेब में रखकर घूमता तो ज्ञानेश्वर का पुराना मनुष्य करवट लेता।
यह ज्ञानेश्वर अब ज्ञानू के लिए सबसे बड़ा ख़तरा था। वह बार-बार याद दिलाता कि पद अस्थायी है, चरित्र स्थायी; सत्ता बदलती है, कर्मों का हिसाब नहीं। ज्ञानू ने उसे समझाया कि ये सब क़िताबी बातें हैं। क़िताबी बातें पढ़ने से नौकरी नहीं चलती। लेकिन भीतर का मनुष्य पूरी तरह मरने को तैयार नहीं था।
तब ज्ञानू ने रीढ़ को लचीला बनाने का अभियान चलाया। वह हर परिस्थिति में झुकने लगी। पहले वह दबाव में झुकती थी, अब संकेत पर झुक जाती थी। पहले झुकने के बाद दर्द होता था, अब दर्द भी नहीं होता था। फिर भी सत्ता को संदेह था। लचीली रीढ़ कभी सीधी हो सकती है। सत्ता को ऐसा आदमी चाहिए था जिसकी रीढ़ सीधी होने की संभावना भी समाप्त हो चुकी हो।
आखिर ज्ञानू के सामने एक बड़ा अवसर आया। उन्हें बहुत बड़े पद पर बैठाने की बात हुई। पद के साथ एक कठिन ज़िम्मेदारी थी—चुनावी व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील फ़ैसले लेने की, करोड़ों मतदाताओं को अधिकारों से वंचित करने की और सत्ता के दबाव के बावजूद निष्पक्ष बने रहने की।
ज्ञानू ने शर्त सुनी। उनके सामने दो रास्ते थे। एक तरफ संविधान और स्वतंत्र विवेक था, दूसरी तरफ पद, प्रतिष्ठा और सत्ता की कृपा। पहले रास्ते पर रीढ़ की जरूरत थी, दूसरे पर केवल उसका अभाव।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
जब पद की क़ीमत पर विवेक गिरवी रखा जाता है, तो नियुक्ति सम्मान नहीं, चरित्र की नीलामी बन जाती है।
ज्ञानू केंचुआ बन गए।
अब वे जमीन के भीतर रेंग सकते थे, किसी भी दिशा में मुड़ सकते थे और मिट्टी के रंग में अपना रंग मिला सकते थे। उनके पास हर परिस्थिति के लिए एक वाक्य था—“हम स्वतंत्र हैं।” कोई पूछता कि स्वतंत्रता दिखाई कहाँ देती है, तो वे कहते, “हम अपना काम नियमों के अनुसार कर रहे हैं।” कोई नियमों के इस्तेमाल पर सवाल उठाता तो वे प्रक्रिया का हवाला देते। प्रक्रिया पर सवाल उठता तो संस्था की गरिमा सामने रख देते।
इस तरह संस्था की गरिमा ज्ञानू की ढाल बन गई और उनकी चुप्पी संस्था की आवाज़।
उन्हें लगता था कि वे अब तक के सबसे योग्य मनुष्य हैं। वे भूल गए थे कि जानवर अपनी प्रकृति के अनुसार जीते हैं; मनुष्य अपनी प्रकृति पर सवाल भी उठा सकता है। कुत्ता कुत्ता होने पर शर्मिंदा नहीं होता, केंचुआ केंचुआ होने पर सफाई नहीं देता। सफाई ज्ञानू दे रहे थे, क्योंकि वे अपने केंचुआपन को भी मनुष्यता का प्रमाणपत्र बनाना चाहते थे।
यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—वे केंचुआ बने, मगर अपने को ज्ञानेश्वर समझते रहे। फिर एक दिन किताब का वही वाक्य उनकी नज़रों के सामने आ गया—“जिस आदमी में रीढ़ की हड्डी न हो, वह जानवर बन जाता है और इंसानियत से भी परे चला जाता है।”
ज्ञानू आगबबूला हो गए। उन्हें जानवर कहलाने से ज़्यादा बुरा यह लगा कि किसी ने उनकी पहचान उनके पद से नहीं, उनके चरित्र से कर दी थी। उन्होंने क़िताब फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रुक गए। आजकल क़िताब फाड़ने का वीडियो भी वायरल हो जाता है। उन्होंने क़िताब दराज में बंद कर दी और उसके ऊपर सरकारी फाइलें रख दीं।
सच को मिटाना मुश्किल हो तो उसे फाइलों के नीचे दबा दो; व्यवस्था इसे ही निस्तारण कहती है।
बाहर बारिश हो रही थी। बग़ीचे की गीली मिट्टी से कुछ केंचुए निकल आए थे। वे बिना पद, बिना सुरक्षा और बिना किसी नियुक्ति के अपने स्वभाव के अनुसार रेंग रहे थे। ज्ञानू ने उन्हें देखा और खिड़की बंद कर दी।
उन्हें डर था कि कहीं कोई उनकी तुलना इन जीवों से न कर दे। वे यह नहीं समझ पाए कि असली फ़र्क़ केंचुए और मनुष्य के बीच नहीं था। फर्क उस जीव और उस मनुष्य के बीच था, जो अपनी प्रकृति के प्रति ईमानदार हो, और उस आदमी के बीच, जो अपने स्वार्थ के लिए हर प्रकृति अपनाकर भी खुद को निर्दोष घोषित करता रहे।
ज्ञानू आज भी अपने नाम के आगे लगी पदवी पढ़कर आश्वस्त हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि पद बचा है तो प्रतिष्ठा बची है, कुर्सी बची है तो चरित्र भी बचा है। उन्हें कौन समझाए कि कुर्सी आदमी को ऊँचा जरूर बैठाती है, ऊँचा बनाती नहीं।
उनकी अगली योनि के बारे में चर्चा है कि वे अब दीमक बनने की तैयारी में हैं। केंचुआ जमीन में रास्ता बनाता है, दीमक भीतर-ही-भीतर इमारत खोखली करती है। जिस संस्था में ज्ञानू बैठे हैं, वहाँ दीमक के लिए पर्याप्त अवसर हैं। बाहर संविधान की तस्वीर टँगी है, दीवारों पर निष्पक्षता के नारे लिखे हैं और भीतर हर सवाल को प्रक्रिया के हवाले किया जा रहा है।
हो सकता है ज्ञानू अगली योनि में भी तरक्की कर जाएँ। इस व्यवस्था में पुनर्जन्म की कोई सीमा नहीं, बशर्ते हर जन्म में पुरानी रीढ़ का कोई अवशेष साथ न चला आए।
और यदि कभी कोई बच्चा उनकी जीवनी पढ़कर पूछे कि इतने बड़े पद पर पहुँचकर भी ज्ञानू केंचुआ क्यों बने, तो उसे इतना ही बताना पर्याप्त होगा-
वे केंचुआ इसलिए नहीं बने कि उनकी रीढ़ नहीं थी; वे केंचुआ इसलिए बने कि रीढ़ होने के बावजूद उन्होंने उसे अपने स्वार्थ के रास्ते की बाधा समझ लिया।
और यही इस कथा का सबसे डरावना सच है। केंचुए तो मिट्टी में रहते हैं, लेकिन जब मनुष्य अपनी रीढ़ त्याग देता है, तब वह पूरी व्यवस्था को मिट्टी में मिला सकता है।