मोदी जी आजकल बहुत गुस्से में हैं। यह स्वाभाविक है। आदमी बूढ़ा होने पर या तो धार्मिक हो जाता है या चिड़चिड़ा। मोदी जी ने दूसरा रास्ता चुना है।
हालाँकि वे पहले भी गुस्से में रहते थे, मगर अब वे ओल्ड एंग्रीमैन हो गए हैं। उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा है। बात-बात पर गुस्सा आ रहा है। इसी गुस्से की वजह से फुफकारते हुए वे फूफालॉजी तक पहुँच गए और दिमाग़ी नक्सल का जुमला भी दे मारा।
दरअसल, सत्ता का अहंकार बूढ़ा होने पर क्रोध में बदलने लगता है। मोदी जी के साथ यही हो रहा है।  
इसीलिए मुझे मोदी जी पर दया आती है। बुढ़ापे में उनको ये दिन भी देखने पड़ रहे हैं। पार्टी उनके सत्ता में बने रहने का पचीसवाँ वर्ष मना रही है। जन्मदिन पर दिए जलवा रही है, मगर उन दीयों में उत्सव के उजाले से ज़्यादा विदाई की बुझती लौ दिखाई देती है। ऐसे में उन्हें गुस्सा नहीं आएगा तो क्या होगा।
किसी भी नेता की सबसे बड़ी समस्या जनता नहीं होती, जनता की कृतघ्नता होती है। मोदी जी इसी कृतघ्न जनता पर क्रोधित हैं। 
हालाँकि गुस्सा सबको आता है। अमित शाह, योगी आदित्यनाथ यहां तक कि कंगना रनौत को भी गुस्सा आता है। लेकिन मोदी जी की मुसीबत ये है कि वे गुस्सा करते हैं और लोग उस गुस्से पर हँसने लगते हैं। उनके मीम बनाकर उनका गुस्सा और बढ़ा देते हैं। मुझे उनके बीपी की चिंता लगी रहती है। इतने गुस्से को उनकी धमनियाँ आख़िर कब तक सहन कर पाएँगी।
वैसे गुस्सा निकालने की भारतीय थिरेपी भी है। बाहर का गुस्सा घरवालों पर उतारो। बाहर अपमान हुआ, किसी ने गाली दे दी, तो वहीं हिसाब चुकता मत करो, क्योंकि हो सकता है वह उल्टा पड़ जाए। सामने वाला दो की चार सुना दे या हाथ-पैर ही चला दे। इसलिए घर आओ और बीवी-बच्चों पर टूट पड़ो। भारतीय परंपरा और संस्कृति इसकी पूरी इज़ाज़त देती है।
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हालांकि लोग मानते हैं कि ये कायरता का सबसे लोकप्रिय रूप है। जहाँ जवाब देना चाहिए वहाँ चुप रहो और जहाँ कोई जवाब न दे सके वहाँ गरजो।
अब ज़रा मोदी जी के बारे में सोचिए। जिस आदमी की बाहर वाले रोज़ धुनाई कर रहे हों, वह अपना गुस्सा उतारने कहाँ जाएगा। आए दिन ट्रम्प अपमानित करते रहते हैं। कुछ नहीं तो पत्रकार ही सवाल पूछ-पूछकर जुलूस निकालने लगते हैं। 

कभी गलवान का ज़िक्र करके 56 इंची सीना पिचका देते हैं, कभी लाल आँखें बंद करने को मजबूर कर देते हैं।

अब मोदी जी ट्रम्प को तो कुछ कह नहीं सकते, न ही शी जिनपिंग से भिड़ सकते हैं। विदेशी पत्रकार और अगर वह महिला हो तो और भी नहीं। अपमान के घूँट पीकर रह जाना पड़ता है। मगर अपमान के ये घूँट पेट में नहीं जाते, दिमाग़ में चले जाते हैं। ऐसे में आदमी किसी और को डाँटने के अवसर खोजता है। जो काम वे शक्तिशाली विदेशी नेताओं के साथ नहीं कर सकते, वह घरवालों के साथ करने लगते हैं। गुस्सा निकालने का यह विशुद्ध भारतीय तरीका है।
भारतीय शक्ति-सिद्धांत कहता है कि आदमी उतना ही बहादुर होता है जितना सामने वाला कमज़ोर हो। या यूं कहिए कि हमारे यहाँ साहस का मापदंड यह नहीं कि आप किससे लड़ते हैं, बल्कि यह है कि आप किससे नहीं लड़ते।
लिहाज़ा आए दिन विपक्षियों को गरियाने का एक कारण यह भी हो सकता है। विरोधियों पर गुस्सा करके वे ट्रम्प से मिले अपमान का बदला लेते हैं। बाहर का गुस्सा घर में निकालते हैं। सब भारतीय यही करते हैं, वे भी कर रहे हैं। अब बीवी-बच्चे नहीं हैं तो विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं।
वैसे भी जब तर्क हारने लगते हैं तो जुमलों से लड़ाई शुरू कर दी जाती है।
भारतीयों के गुस्सा निकालने की एक दूसरी थिरेपी भी है। घर में अगर खरी-खोटी सुननी पड़ जाए और जवाब न दे सकें तो दफ़्तर में चपरासी को डॉट दो, कोई ग़रीब रिक्शे वाला कम किराया न ले तो ये कहकर पीट दो कि लूट मचा रखी है।
अगर घर में पिटने का सिलसिला लंबा चले तो आदमी किसी भीड़ का हिस्सा बन जाता है। भीड़ उसे वह साहस दे देती है जो अकेले में कभी नहीं था। भीड़ वह जगह है जहाँ डरपोक आदमी भी अपने आपको शेर समझने लगता है। मॉब लिंचिंग करने वाले ऐसे ही डरपोक लोगों का समूह है।

मोदी जी चाहें तो अपने मंत्रियों और अफसरों को डॉटकर गुस्सा शांत कर सकते हैं। क्या पता वे ऐसा करते भी हों। लेकिन वह एक सीमा में रहकर ही किया जा सकता है। पूरा गुस्सा निकालने के लिए इससे भी ज़्यादा बड़ा पंचिंग बैग चाहिए।

फिर मुश्किल ये हो गई है कि अब तो तो घर में यानी देश में भी फ़ज़ीहत हो रही है। कोई उनकी डिग्री पूछता है, कोई मैरिटल स्टेटस याद दिलाने लगता है, कोई गुजरात दंगों का ज़िक्र छेड़ देता है। कभी जीडीपी की फ़र्ज़ी ग्रोथ का विवाद खड़ा हो जाता है, कभी रोज़गार का। नीट, जीट, पीट के पेपर लीक होते हैं तो सब उन पर टूट पड़ते हैं। अडानी के साथ रिश्ते पर निरंतर हमले तो जैसे क्रोध का स्थायी कारण बन चुके हैं।
अब जब दिन-रात धुनाई हो रही हो तो वे गुस्सा निकालने वे कहाँ जाएँ। ले-देकर पाकिस्तान बचता है। मगर वहाँ भी ऑपरेशन सिंदूर के बहाने लोग चुटकुले बनाने लगते हैं। चीन की सैन्य क्षमता और टू फ्रंट वार का चर्चा छेड़ देते हैं। इसलिए पाकिस्तान पर भी पूरा गुस्सा उतर नहीं पाता।
एक और समस्या है। मोदी जी मोहन भागवत पर भी गुस्सा नहीं उतार सकते। भागवत जी बीच-बीच में ऐसे बयान देते रहते हैं जो किसी भी स्वाभिमानी प्रधानमंत्री का रक्तचाप बढ़ाने के लिए काफ़ी हों। मगर यहाँ कुर्सी का प्रश्न आड़े आ जाता है।
प्रधानमंत्री होने और सर्वशक्तिमान होने में वही अंतर है जो सरकारी बंगले और अपने घर में होता है। बंगला बड़ा हो सकता है, मालिक कोई और भी हो सकता है।
वैसे भारतीय राजनीति का कुर्सी सिद्धांत कहता है कि स्वाभिमान त्यागा जा सकता है, सत्ता नहीं।
ये भारतीयों का पुराना मनोरोग है। इसे मैं "कावर्डिस सिंड्रोम" कहता हूँ। कावर्डिस सिंड्रोम का रोगी शेर को देखकर राष्ट्रभक्ति और बकरी को देखकर वीरता महसूस करता है। इस बीमारी की पहचान यह है कि आदमी हर ताक़तवर के सामने व्यावहारिक और हर कमज़ोर के सामने राष्ट्रवादी हो जाता है।
मोदी जी को एक तीसरे प्रकार का सिंड्रोम भी है। इसका संबंध इतिहास से है। कुछ लोग इतिहास में पिट चुके होते हैं, इसलिए वर्तमान में पीटकर हिसाब बराबर करना चाहते हैं। वे चार-पाँच सौ साल पीछे जाकर औरंगज़ेब से तो नहीं लड़ सकते। और सच पूछिए तो लड़ पाते तब भी नहीं लड़ते। अगर लड़ने की कूवव्त होती तो इतिहास कुछ और होता। मगर अब वे उन लोगों को सबक सिखाने निकले हैं जिनका औरंगज़ेब से उतना ही संबंध है जितना किसी मोबाइल ऐप का महाभारत से।

यही समस्या नेहरू के साथ भी है। मृत शत्रु राजनीति का सबसे सुरक्षित शत्रु होता है क्योंकि वह जवाब नहीं देता। नेहरू जीवित नहीं हैं, मगर संघ परिवार को लगता है कि वे अभी भी रोज़ सुबह उठकर उनके एजेंडे में पलीता लगा रहे हैं। जिस दुश्मन को वर्तमान में हराया न जा सके, उसे इतिहास से निकालकर रोज़ पीटा जाता है।

वैसे भी इतिहास और राष्ट्रवाद दो ऐसे लॉकर हैं, जिनमें प्रधानमंत्री अपनी ग़लतियाँ छिपाते हैं।
नतीजतन नेहरू को पीटने की जुगत चलती रहती है। उनके खानदान को पीटने की कोशिश होती रहती है। जब लगता है कि असर नहीं हुआ तो लाठियाँ और ज़ोर से भाँजी जाती हैं। मगर इतिहास पर बरसाई गई लाठी हवा में ही घूमकर रह जाती हैं या कभी-कभी ख़ुद पर बरस पड़ती हैं।
वैसे इस समय मोदी जी को सबसे ज़्यादा गुस्सा इस बात से आ रहा है कि उनके क्रोध से अब कोई डर नहीं रहा है। नई उम्र के लड़के-लड़कियाँ तो बिल्कुल नहीं डर रहे। जेन ज़ी ने बड़ी मेहनत से गढ़ी गई विश्वगुरु और शक्तिशाली नेता की छवि को मीम और रील में बदल दिया है। उन्हें परजीवी कहा गया, दिमाग़ी नक्सल कहा गया, मगर वे डरने को तैयार नहीं हुए।
तानाशाह की सबसे बड़ी त्रासदी सत्ता खोना नहीं है; लोगों का डर खो देना है। जब तानाशाह सवाल से भागने लगे तो समझ लीजिए कि वह बहुत डरा हुआ है।
किसी भी व्यक्ति का गुस्सा जब नहीं निकल पाता तो वह कुंठा बन जाता है। कुंठा भय पैदा करती है। भय साज़िशें पैदा करता है। फिर हर सवाल दुश्मनी लगता है और हर असहमति राष्ट्रद्रोह।
मोदी जी का गुस्सा शायद अब इसी मंज़िल पर पहुँच चुका है। यह स्थिति केवल उनके लिए ख़तरनाक़ नहीं है। लोकतंत्र के लिए भी है क्योंकि लोकतंत्र में सबसे डरावना आदमी वह नहीं होता जो गुस्से में हो। सबसे डरावना वह होता है जो अपने गुस्से को राष्ट्रहित समझने लगे।