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सोशल मीडिया : 5 लाख वाला अमीर, 8 लाख वाला ग़रीब क्यों?

8 लाख रुपये से कम की आमदनी वाले लोगों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के सरकार के फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर यह बात जोरदार ढंग से कही जा रही है कि इन लोगों को इनकम टैक्स के दायरे से भी बाहर रखा जाना चाहिए। ट्विटर और फ़ेसबुक पर कई लोगों ने लिखा कि अगर सरकार 8 लाख रुपये से कम की आमदनी वाले लोगों को ग़रीब मानती है तो उनसे इनकम टैक्स कैसे ले सकती है। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में अच्छा-खासा युद्ध भी छिड़ा है।सोशल मीडिया पर आए ऐसे ही कुछ सवालों को हम नीचे दे रहे हैं।
एक ट्विटर यूजर नरेंद्र नाथ मिश्रा का कहना है कि यह बिल्कुल अजीब बात है कि सालाना 5 लाख रुपये कमाने वाला आदमी संपन्न है, उसे इनकम टैक्स देना होता है। लेकिन 8 लाख रुपये कमाने वाला ग़रीब हो गया है। इसलिए अगर वह ग़रीब है तो उसे सभी टैक्स से छूट मिलनी चाहिए। नीचे देखें - 
सरकारी फ़ैसले के समर्थन में बहुत से लोग ये तर्क दे रहे हैं कि 8 लाख सालाना आय की सीमा एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे परिवार की कुल सालाना आय की है। नीचे देखें - 
लेकिन सवाल यह है कि देश में कितने ऐसे परिवार हैं जहाँ एक से ज़्यादा कमाने वाले लोग हैं। ज़्यादातर परिवार 1 व्यक्ति की कमाई पर ही निर्भर हैं। 

अभी ढाई लाख रुपये सालाना तक की आमदनी टैक्स से मुक्त है। ढाई लाख से ऊपर 5 लाख रुपये सालाना तक की आमदनी पर 5 प्रतिशत की दर से सरकार इनकम टैक्स लेती है। यानी इसका अर्थ यही माना जाना चाहिए कि सरकार की अब तक की परिभाषा के अनुसार जो भी व्यक्ति एक साल में ढाई लाख रुपये से कम कमाता है वह 'ग़रीब' है और टैक्स दे पाने की स्थिति में नहीं है, इसीलिए उस पर इनकम टैक्स लागू नहीं होता। 

इसीलिए सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आर्थिक पिछड़ेपन के दो पैमाने क्यों? अगर 8 लाख रुपये सालाना से कम कमाने वाला व्यक्ति या परिवार आर्थिक आधार पर आरक्षण पाने का पात्र है तो टैक्स मुक्त आय की सीमा भी ढाई लाख रुपये सालाना से बढ़ाकर 8 लाख की जानी चाहिए। 

ट्विटर पर एक यूजर ब्रजेश नाथ त्रिपाठी ने कहा कि 8 लाख तक कमाने वाले को अगर ग़रीब माना जाएगा तो ऐसा आरक्षण देने से तो बढ़िया होता कि उसकी कमाई को टैक्स फ़्री कर दिया जाता। नीचे देखें - 
एक यूजर सिद्धार्थ चतुर्वेदी ने भी सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर 8 लाख रुपये कमाने वाला ग़रीब है तो इसका मतलब यह हुआ कि वह महीने में 66666 रुपये कमाता है, ऐसे में वह ग़रीब कैसे हुआ। नीचे देखें - 
फ़ेसबुक पर एक यूजर रमन कथूरिया ने पीएम नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि साहब ने पूरी गिनती का ही विकास कर दिया है। नीचे देखें - 
दीपांशु वैष्णव नाम के ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया कि अगर कोई दलित चिंतक आपसे पूछे कि 8 लाख सालाना कमाने वाला सवर्ण ग़रीब कैसे है तो उसे यह जवाब दे दें। नीचे देखें - 
शिवरमन नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा कि इससे पता चलता है कि मंदी के इस दौर में 8 लाख रुपये सालाना कमाने वाला व्यक्ति भी महंगी एजुकेशन के खर्चे नहीं उठा सकता और उसे सरकारी कोटे की ज़रूरत है। नीचे देखें - 
रोशन नाम के ट्विटर यूजर ने लिखा कि बीजेपी को कोई बताए कि 7 लाख रुपये महीने कमाने वाला आदमी ग़रीब नहीं होता। नीचे देखें - 
इसके अलावा भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर कई यूजर ने इसे लेकर टिप्पणी की और सरकार के फ़ैसले के समर्थन और विरोध में तर्क दिए। 
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