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प्रतीकात्मक तस्वीर।

मणिपुर: महिलाएँ पुलिस जिप्सी तक पहुंचीं, पर भीड़ के हवाले छोड़ा गया: चार्जशीट

मणिपुर हिंसा के दौरान पुलिस के रवैये पर गंभीर सवाल उठे हैं। अब सीबीआई चार्जशीट में ही बड़ा आरोप लगाया गया है। पिछले साल राज्य में जिन महिलाओं को नंगे घुमाए जाने और यौन उत्पीड़न किए जाने के मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, उन महिलाओं ने पहले पुलिस से सहायता की गुहार लगाई थी। यहाँ तक कि वे भीड़ से बचते हुए पुलिस जिप्सी तक पहुँच गई थीं, लेकिन पुलिस से सहायता नहीं मिल पाई थी और उन्हें भीड़ के हवाले छोड़ दिया गया था। इसके बाद ही हैवानियत वाली वह घटना घटी थी। यह सीबीआई के आरोपपत्र में दावा किया गया है।

सीबीआई के आरोपपत्र से पता चला है कि पिछले साल 3 मई को मणिपुर में पुरुषों की भीड़ द्वारा दो महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और नग्न परेड की घटना से ठीक पहले दोनों पुलिस जिप्सी में चढ़ने में कामयाब रही थीं। उनके साथ दो पुरुष पीड़ित भी जिप्सी में चढ़ने में कामयाब रहे थे। इंडियन एक्सप्रेस ने सीबीआई के आरोपपत्र के हवाले से रिपोर्ट दी है कि जब उन्होंने सहायता के लिए गुहार लगाई और गाड़ी बढ़ाने को कहा तो पुलिस ने 'कार में चाबी नहीं है' कहकर उनकी मदद करने से इनकार कर दिया।

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रिपोर्ट में सीबीआई की चार्जशीट के हवाले से दावा किया गया है कि जब भीड़ ने पीड़ितों को हमला करने के लिए जिप्सी से बाहर निकाला तो पुलिस मौके से चली गई। अक्टूबर में छह लोगों और एक किशोर के ख़िलाफ़ गुवाहाटी की एक विशेष अदालत के समक्ष आरोपपत्र दायर किया गया था। पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के बारे में मणिपुर के डीजीपी राजीव सिंह ने अंग्रेज़ी अख़बार को बताया कि 'विभागीय कार्रवाई की गई है' लेकिन चूंकि मामले की जांच सीबीआई कर रही है, इसलिए कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकी है।

बता दें कि महिलाओं का एक वीडियो पिछले साल जुलाई में वायरल हुआ था। एक खेत की ओर जाते समय पुरुषों को महिलाओं को घसीटते और उनका यौन उत्पीड़न करते देखा गया था।

आरोपपत्र में उस घटना के बाद हुई हिंसा का भी जिक्र है जिसमें मैतेई समुदाय ने घरों में आग लगाकर पड़ोसी गांव पर हमला किया था। उसमें कहा गया, 'जांच से पता चला कि 4 मई को मैतेई गांवों के प्रधानों ने अन्य सामुदायिक गांवों के प्रमुखों के साथ हमलों पर चर्चा करने के लिए एक बैठक की। हालाँकि, बैठक में कोई बदलाव नहीं हुआ और भीड़ ने घरों, चर्च और आसपास के कुछ गाँवों को जला दिया।'
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सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, "जाँच में आगे पता चला कि जब पीड़ित परिवार ने जंगल में भीड़ से छिपने की कोशिश की, तो सदस्य हाथ में एक बड़ी कुल्हाड़ी लेकर उनकी ओर दौड़े और कहा, 'जिस तरह चुराचांदपुर में आप लोगों ने हमारे (मैतेई लोगों) साथ व्यवहार किया, हम भी वैसा ही करेंगे।' इसके बाद भीड़ जबरदस्ती परिवार के सदस्यों को सड़क पर ले आई और उन्हें अलग कर दिया, एक पीड़िता और उसकी पोती को एक दिशा में ले गई। दो महिलाएँ और उनके पिता और उनके गाँव के मुखिया एक दिशा में, जबकि दो महिलाएँ और दो पुरुष दूसरी दिशा में।"

चार्जशीट के हवाले से कहा गया है कि पुलिस जिप्सी के पास जाने की कोशिश करते समय भीड़ ने फिर से पीड़ितों को अलग कर दिया लेकिन महिलाएँ किसी तरह वाहन में चढ़ने में सफल रहीं। दो पुलिसकर्मी कार के अंदर पीड़ितों के साथ थे और तीन-चार अन्य बाहर खड़े थे। जब एक पीड़ित पुरुष ने पुलिसकर्मी से कार स्टार्ट करने के लिए कहा तो उसने जवाब दिया, 'चाबी नहीं है।' आरोपपत्र से पता चला कि पीड़ितों ने पुलिस से मदद की गुहार लगाई लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली।

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आरोप पत्र में कहा गया है, "...जिप्सी के चालक ने अचानक वाहन चलाया और लगभग 1,000 लोगों की हिंसक भीड़ के पास वाहन को रोक दिया, और पीड़ित पुरुष ने फिर से पुलिस से वाहन शुरू करने का अनुरोध किया, लेकिन उसे चुप रहने के लिए कहा गया। कुछ समय बाद पुलिस कर्मी आए और अपने सहयोगियों से कहा कि आदमी की मौत हो गई। यह सुनकर पुरुष पीड़ित ने महिला पीड़िता से कहा कि उसके पीता की पीटकर हत्या कर दी गई।"

इसके बाद भीड़ ने पीड़ितों को गाड़ी से बाहर निकाला तो पुलिस मौके से भाग गई। सीबीआई ने आरोपपत्र में कहा, "उन्होंने दोनों पीड़ित महिलाओं के कपड़े फाड़ दिए और एक पुरुष पीड़ित की पिटाई शुरू कर दी... पीड़ितों में से एक महिला पास की जगह पर मौजूद थी और उसने पूरी घटना देखी।"

बता दें कि मणिपुर सरकार के अनुरोध और केंद्र की अधिसूचना पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया था। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की सामूहिक बलात्कार, हत्या, आपराधिक साजिश और महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं।

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क़मर वहीद नक़वी
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