नसीमुद्दीन सिद्दीकी के समाजवादी पार्टी में शामिल होने से यूपी की सियासत में हलचल। क्या इससे कांग्रेस की संगठनात्मक और चुनावी रणनीति को बड़ा नुकसान होगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ी उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस को तब बड़ा झटका लगा जब इसके पूर्व नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इसके गठबंधन सहयोगी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सिद्दीकी ने एक महीने पहले ही कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन के सहयोगी हैं तो क्या सिद्दीकी के सपा में शामिल होने से दोनों दलों के बीच तल्खियाँ बढ़ेंगी? क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में ज़्यादा सीटों के लिए सपा से मोलभाव करने में अब कमजोर पड़ेगी?
इन सवालों के जवाब बाद में, पहले यह जान लें कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बड़ा उलटफेर कैसे हुआ है और यह कितना अहम है। पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने एसपी प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में लखनऊ में पार्टी में शामिल हुए। उनके साथ ही पूर्व बसपा मंत्री अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू भी एसपी में आए।
कौन हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बड़ा चेहरा माना जाता है। वह बसपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। वे मायावती के क़रीबी रहे और कई बार मंत्री बने। 1995, 1997 और 2002 में बसपा सरकारों में मंत्री थे। 2007-2012 में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार में वे सबसे ताकतवर मंत्रियों में गिने जाते थे।
2014 लोकसभा और 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा की बुरी हार के बाद कई बड़े नेता पार्टी से निकल गए। मायावती ने नसीमुद्दीन और उनके बेटे को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निकाल दिया। उसके बाद उन्होंने मायावती पर कई बड़े आरोप लगाए। 2015 में काफ़ी मंथन के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए। तब ग़ुलाम नबी आज़ाद और राज बब्बर की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। कांग्रेस में उन्हें अहम ज़िम्मेदारियां मिलीं। 2019 में वे कांग्रेस के पश्चिमी जोन के अध्यक्ष बने।
सिद्दीकी ने पिछले महीने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने वजह बताई कि पार्टी में उन्हें कोई अहम भूमिका नहीं मिल रही थी। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की, संगठन में जिम्मेदारी देने का वादा किया, लेकिन वे नहीं माने। और अब आख़िरकार एसपी में चले गए।
एसपी में शामिल होने पर क्या कहा?
एसपी कार्यालय में समर्थकों से बात करते हुए नसीमुद्दीन ने कहा, 'हम जहां भी रहे, अब हमें इस पार्टी की विचारधारा के साथ चलना है। समाजवादी पार्टी की सरकार 2027 में बनानी है, अखिलेश यादव को यहां का मुख्यमंत्री बनाना है।' उन्होंने समर्थकों से अनुशासन बनाए रखते हुए त्याग करने की अपील की। वे राम मनोहर लोहिया और मुलायम सिंह यादव का ज़िक्र करते हुए बोले कि चाहे पहले किसी भी पार्टी में रहे हों, उन्होंने हमेशा मुलायम सिंह को अपना नेता माना है।
अखिलेश यादव ने क्या कहा?
अखिलेश यादव ने उनका स्वागत करते हुए कहा कि यह बड़ा क़दम है। इससे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए की जीत मज़बूत होगी। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज और समाजवादी पार्टी का रिश्ता गहरा होता जा रहा है। उन्होंने इसे होली मिलन से पहले पीडीए मिलन बताया।साथ में और कौन शामिल हुए?
पूर्व बसपा मंत्री अनीस अहमद खान 'फूल बाबू' भी सपा में शामिल हुए। वह 2024 लोकसभा चुनाव में बसपा से लड़े थे लेकिन हार गए थे। कुछ रिपोर्टों में 15000 से ज्यादा समर्थकों के एसपी में शामिल होने की बात कही गई है। पूर्व अपनादल (एस) के राज्य अध्यक्ष राजकुमार पाल, पूर्व देवरिया विधायक दिनानाथ कुशवाहा जैसे नेता सपा भी शामिल हुए।
राजनीतिक असर क्या होगा?
नसीमुद्दीन मुस्लिम चेहरा थे और यूपी में कांग्रेस की अल्पसंख्यकों तक पहुंच बढ़ाने में मदद करते थे। कांग्रेस यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए उनसे काफी बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी थी। ऐसा माना जा रहा था कि इनके चेहरे के नाम पर इंडिया गठबंधन में कांग्रेस 2027 चुनाव में ज्यादा सीटें भी मांग रही थी, अब यह मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा कांग्रेस को मिलने वाले अल्पसंख्यक वोटों पर भी असर पड़ सकता है।
अखिलेश यादव पीडीए फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। इसमें पिछड़े और दलितों के साथ अल्पसंख्यक मुसलमानों को साथ लाने की बात है। अखिलेश यादव लगातार मुसलमानों को रिझाने में जुटे हैं और विधानसभा चुनाव से पहले इसकी जोर शोर से तैयारी कर रहे हैं। बसपा के पुराने नेता का आना बहुजन और मुस्लिम वोटों को मज़बूत करेगा। 2027 में एसपी की सरकार बनाने की कोशिश तेज़ हो गई है।
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मायावती के पुराने साथी का एसपी में जाना बसपा की कमजोरी दिखाता है। यह घटना यूपी की राजनीति में 2027 चुनाव से पहले बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है। अब देखना है कि गठबंधन कैसे संभलेगा और वोटरों पर क्या असर पड़ेगा।
यह क़दम कांग्रेस के लिए झटका और एसपी के लिए बड़ा बूस्ट माना जा रहा है। दोनों पार्टियां इंडिया गठबंधन में साथ हैं, लेकिन 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले यह बदलाव गठबंधन की सीट बंटवारे पर असर डाल सकता है।