loader

क्या उत्तर प्रदेश में ख़त्म हो रही है बीएसपी की सियासी ज़मीन? 

कुछ साल पहले तक उत्तर प्रदेश में बड़ी सियासी ताक़त रही बीएसपी क्या अपने अवसान की ओर बढ़ रही है। क्या बीएसपी की ज़मीन पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है? दलितों, पिछड़ों को आधार बनाकर और बाद में सोशल इंजीनियिरंग के फ़ॉर्मूले के तहत अगड़ों को जोड़कर देश के सबसे बड़े प्रदेश में चार बार सरकार बनाने वाली बीएसपी का सियासी भविष्य बहुत उज्जवल नहीं कहा जा सकता। 2012 तक यूपी में सरकार चलाने वाली बीएसपी 2014 के लोकसभा चुनाव में इसी प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। इसके बाद 2017 के लोकसभा चुनाव में भी वह बेहतर प्रदर्शन करने में नाकामयाब रही और 2012 के 80 सीटों के मुक़ाबले उसे सिर्फ़ 19 सीटें मिलीं। 
समाज के कमजोर, शोषित और और दलित वर्ग के उत्थान का लक्ष्य लेकर राजनीति में उतरने की बात कहने वालीं मायावती से क्या उनका परंपरागत वोट बैंक छिटक चुका है और उनकी सियासी हैसियत अब पार्टी को सत्ता में लाने की नहीं है। चुनाव नतीजे तो यही कहते हैं।
बेहद सख़्त मिजाज की नेता मानी जाने वाली मायावती ने नहीं सोचा था कि उन्हें अपनी सियासी ज़मीन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश में किसी दल के साथ गठबंधन करना पड़ेगा लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तमाम कड़वे अनुभवों को भुलाकर अपनी चिर विरोधी समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाना पड़ा। हालाँकि एसपी से गठबंधन का फ़ैसला उनके लिए अच्छा रहा और 2014 में शून्य सीटों के मुक़ाबले वह 10 सीटें जीतने में कामयाब रहीं। 
ताज़ा ख़बरें

2019 के चुनाव परिणाम के बाद मायावती को ऐसा लगा कि वह एक बार फिर से ताक़तवर बन चुकी हैं और अकेले दम पर यूपी में सियासत कर सकती हैं। नतीजतन, उन्होंने एसपी के साथ गठबंधन तोड़ दिया। गठबंधन तोड़ने के बाद पहली परीक्षा यूपी का उपचुनाव थी और इसमें जो नतीजे आये हैं, वह साफ़ बताते हैं कि बीएसपी इस मुगालते को छोड़ दे कि वह राज्य में अकेले दम पर चुनाव लड़कर कोई करिश्मा कर सकती है। 

11 सीटों पर उपचुनाव हुआ जिसमें बीएसपी एक सीट जीतना तो दूर अपनी पुरानी सीट को ही गँवा बैठी जबकि एसपी ने अपनी एक सीट बरक़रार रखी और एक-एक सीट बीजेपी और बीएसपी से छीन भी ली, इस तरह एसपी को कुल 3 सीटें मिलीं।
कई विधानसभा सीटों पर बीएसपी के वोट शेयर में भी बड़ी गिरावट आई है और 6 सीटों पर उसके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई है। 

उत्तर प्रदेश से और ख़बरें

दो सीटों पर बीएसपी का वोट शेयर बुरी तरह कम हुआ है। रामपुर में जहाँ बीएसपी को 2017 में 25.36% वोट मिले थे लेकिन इस बार उसे सिर्फ़ 2.14% वोट मिले हैं। दूसरी सीट गोविंद नगर में उसे 2017 के 15.65% के मुक़ाबले 4.62% वोट मिले हैं। 

इसी तरह गंगोह में 2017 में मिले 17.44% वोट के मुक़ाबले बीएसपी को इस बार 14.37%, घोसी में 33.89% के मुक़ाबले 23.02%, बल्हा में 28.91% के मुक़ाबले 17.06%, जलालपुर में 37.75% के मुक़ाबले 31.25%, लखनऊ कैंट में 13.98% के मुक़ाबले 9.64%, प्रतापगढ़ में 22.82% से 12.74% वोट, हमीरपुर में 24.29% के मुक़ाबले 14.92% वोट मिले हैं। 

ज़ैदपुर (सुरक्षित) सीट पर एसपी के गौरव कुमार ने बीजेपी के अबंरीश को 4,165 वोट से हराया है। एसपी को ज़ैदपुर में 2017 में 1.73% वोट मिले थे लेकिन इस बार उसे 35.28% वोट मिले हैं। दूसरी ओर बीएसपी 2017 के 18.99% वोटों के मुक़ाबले सिर्फ़ 8.21% वोट ही ला पायी है। 
सिर्फ़ 2 सीटें ऐसी हैं, जहाँ बीएसपी का वोट शेयर बढ़ा है। ये सीटें हैं - मानिकपुर और इगलास। दूसरी ओर एसपी ने पाँच सीटों पर अपना वोट शेयर बढ़ाया है और तीन सीटें जीती हैं।
उपचुनाव के नतीजों से समझा जा सकता है कि बीएसपी का वोट शेयर बुरी तरह गिरा है और कहा जा सकता है कि एसपी से गठबंधन तोड़ने का उसे नुक़सान ही हुआ है।

मुसलिम, दलित वोट भी छिटका 

गंगोह, कानपुर, जैदपुर, लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़ सदर में बीएसपी के प्रत्याशी चौथे नंबर पर लुढ़क गए। उपचुनाव के नतीजे साफ़ बताते हैं कि बसपा की राजनीति को कम से कम यूपी में मुसलिमों का सहारा नहीं मिलने वाला है। दलितों में भी महज जाटव वोट ही उसके पाले में आ सके हैं। हालाँकि इस सबसे बेपरवाह मायावती ने नतीजों के बाद अजीबोगरीब बयान देते हुए कहा कि बीजेपी ने बसपा को कमज़ोर करने के लिए सपा के कुछ प्रत्याशियों को जितवा दिया है। 

संबंधित ख़बरें

मायावती के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनकी पार्टी में उनके अलावा कोई और स्टार प्रचारक नहीं है। हाल ही में मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तो भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाया है और  संगठन में भी फेरबदल किया है। लेकिन क्या ये दोनों उत्तर प्रदेश की बेहद कठिन राजनीति में बीएसपी को खड़ा कर सकते हैं। 

मायावती के ख़ासमख़ास लोग जिनमें नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य और कई अन्य लोग शामिल हैं, उन्हें छोड़कर जा चुके हैं। दलितों, पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ रहा है क्योंकि बीजेपी इन दोनों वर्गों के नेताओं को आगे बढ़ा रही है।
बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पिछड़े समुदाय से आने वाले नेता स्वतंत्र देव सिंह को सौंपी है और वह दलितों में भी वह खटीक, केवट, सोनकर,  वाल्मीकि आदि बिरादरियों के नेताओं को आगे बढ़ा रही है। ऐसे में निश्चित रूप से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या मायावती उपचुनाव के नतीजों से सबक लेंगी या वह अकेले ही चलती रहेंगी। 
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

उत्तर प्रदेश से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें