उत्तर प्रदेश में 33 नाबालिगों के यौन शोषण और आपत्तिजनक वीडियो बेचने के मामले में एक दंपति को मौत की सज़ा सुनाई गई। पढ़ए, अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस क्यों माना?
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने एक दंपति को 33 नाबालिग लड़कों के साथ यौन शोषण करने और उनके वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने के मामले में मौत की सजा सुनाई है। यह फ़ैसला 20 फरवरी 2026 को आया, जो बच्चों के खिलाफ सबसे बड़े और सबसे क्रूर अपराधों में से एक है।
दोषी ठहराए गए 50 साल के राम भवन और उनकी 47 वर्षीय पत्नी दुर्गावती को अदालत ने दुर्लभतम अपराधों के लिए फांसी की सजा दी है। राम भवन उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर थे। अदालत ने कहा कि इन अपराधों में असाधारण क्रूरता और व्यवस्थित तरीका था, जिससे बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो गई और समाज की नींव हिल गई। जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने फ़ैसला पढ़ते हुए कहा, 'ऐसे अपराधों में कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है। नरमी बरतना समाज के लिए खतरनाक संदेश देगा।'
अपराध कैसे हुआ?
यह अपराध 2010 से 2020 तक चला, यानी करीब 10 साल। राम भवन और दुर्गावती ने बांदा और चित्रकूट इलाकों में गरीब और कमजोर परिवारों के छोटे-छोटे लड़कों को निशाना बनाया। कुछ बच्चे सिर्फ 3 साल के थे, जबकि ज्यादातर 5 से 16 साल के बीच के थे।
वे बच्चों को ऑनलाइन वीडियो गेम खेलने, पैसे, खिलौने या मिठाई देकर लुभाते थे। फिर अपने किराए के मकान में ले जाकर यौन शोषण करते थे। पत्नी दुर्गावती भी इसमें शामिल रहती थीं। हर बार शोषण की वीडियो और फोटो बनाते थे। इन वीडियो को डार्क वेब पर बेचते थे। जांच में पता चला कि लगभग 2 लाख वीडियो और फोटो बनाए गए, जो 47 देशों में बेचे गए, जिसमें विदेशी खरीदार भी शामिल थे।अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि अपराध की संख्या, लंबे समय तक चलना, बच्चों पर शारीरिक और मानसिक चोट, ब्लैकमेल करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामग्री बेचना- ये सब इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी दुर्लभतम बनाते हैं। बच्चों को इतनी बुरी चोट लगी कि कई के प्राइवेट पार्ट्स में गंभीर चोटें आईं, कुछ अस्पताल में भर्ती रहे, कुछ की आँखें तिरछी हो गईं। कई बच्चे आज भी गंभीर मानसिक आघात से जूझ रहे हैं।
सजा क्या सुनाई गई?
दोनों को पोक्सो एक्ट, धारा 377 के पुराने प्रावधान वाली आईपीसी, आईटी एक्ट और आपराधिक साजिश के तहत दोषी ठहराया। दोषियों को फांसी तक मौत की सजा सुनाई गई। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 33 पहचाने गए पीड़ित बच्चों के परिवारों को 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाए। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों के पुनर्वास, मनोवैज्ञानिक इलाज और सुरक्षित भविष्य के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
जांच और ट्रायल
सीबीआई ने 2020 में जांच शुरू की। घर की तलाशी में 8 लाख रुपये नकद, 12 मोबाइल फोन, 2 लैपटॉप, एक हार्ड डिस्क और 6 पेन ड्राइव बरामद हुए। फॉरेंसिक जांच से पुष्टि हुई कि इनमें बड़े पैमाने पर बच्चियों का यौन शोषण सामग्री थी। सीबीआई ने 2020 में दंपति को गिरफ्तार किया था। 2021 में चार्जशीट दाखिल की गई। 2023 में आरोप तय हुए। ट्रायल में 74 गवाहों के बयान दर्ज हुए। दिल्ली के एक व्यक्ति को भी इस केस में गिरफ्तार किया गया था और जांच जारी है।
यह फ़ैसला बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। समाज में ऐसे अपराधों पर सख्ती की मिसाल बनेगा। पीड़ित बच्चों के परिवारों को न्याय मिलने से थोड़ी राहत मिली है, लेकिन उनके दर्द को कोई नहीं मिटा सकता।