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यूपी चुनाव में बेरोज़गारी पर कौन घिरेगा- योगी या अखिलेश?

उत्तर प्रदेश चुनाव में बेरोजगारी मुद्दा होगी या नहीं? युवा किसे वोट देंगे? बेरोज़गारी के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ घिरेंगे या अखिलेश यादव? आख़िर दोनों में से किसके कार्यकाल में बेरोज़गारी ज़्यादा रही? रोजगार देने के योगी आदित्यनाथ सरकार के दावे और अखिलेश यादव के दावों की हकीकत क्या है?

उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी बढ़ने और पिछले पाँच साल में रोजगार देने के वादों पर विफल रहने का आरोप योगी आदित्यनाथ की सरकार पर लग रहा है। अखिलेश यादव से लेकर प्रियंका गांधी और मायावती तक राज्य में युवाओं को रोजगार नहीं देने पर घेर रहे हैं। प्रियंका ने दो दिन पहले ही ट्वीट किया, ‘उत्तर प्रदेश में पिछले 5 सालों में 16.5 लाख युवाओं की नौकरी छिन गई। 4 करोड़ लोगों ने हताश होकर नौकरी की आशा छोड़ दी। लेकिन योगी आदित्यनाथ जी इस पर न बात करते हैं, न ट्वीट… क्योंकि उन्हें मालूम है कि पर्दा जो उठ गया तो राज खुल जाएगा। युवाओं, आप रोजगार के एजेंडे पर डटे रहना।’

ऐसे आरोपों पर योगी आदित्यनाथ बड़ी संख्या में नौकरियाँ देने का दावा करते हैं। योगी ने अभी हाल में 'लल्लनटॉप' से एक इंटरव्यू में कहा था, 'जहां तक नौकरी का सवाल है तो साढ़े चार लाख लोगों को नौकरी हमने दी है। इसमें से डेढ़ लाख तो केवल पुलिसकर्मी और पुलिस अधिकारी शामिल हैं। डेढ़ लाख से ऊपर शिक्षकों की भर्ती हमने की है।'

वैसे, योगी सरकार द्वारा नौकरियों के जो दावे किए जाते रहे हैं उन पर सवाल भी उठते रहे हैं। नवंबर महीने में यूपी के मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने दावा किया था कि जब 2017 में योगी सरकार सत्ता में आई थी तो उस समय उत्तर प्रदेश में बेरोज़गारी दर 17.5 फ़ीसदी थी। बीजेपी समर्थकों ने इसे सोशल मीडिया पर ख़ूब ट्वीट किया था और तुलना कर कहा था कि मौजूदा समय में बेरोजगारी दर कम होकर 4.2 फ़ीसदी हो गई है।

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लेकिन ये दावे तभी ध्वस्त हो गए थे जब फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइटों ने सीएमआईई के आँकड़े रख दिए थे। पहले तो यह तथ्य है कि बेरोज़गारी के आँकड़े मासिक या साप्ताहिक रूप में जारी किए जाते हैं। उस आँकड़े के अनुसार उस साल के किसी भी महीने में बेरोज़गारी दर दो अंकों भी नहीं पहुँची थी। 2017 के मार्च में जब योगी सरकार सत्ता में आई थी तब वहाँ बेरोज़गारी दर 2.4 फ़ीसदी थी। ऑल्ट न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, उससे पहले 2017 में ही बेरोज़गारी दर फरवरी में क़रीब 3 और जनवरी में पौने चार फ़ीसदी थी।

लेकिन 2017 में योगी सरकार बनने के अगले महीने यानी अप्रैल में वह बेरोजगारी दर क़रीब 5 फ़ीसदी हो गई थी। बाद के महीनों में वह दर घटती और बढ़ती रही। लेकिन उस पूरे साल के दौरान सबसे ज़्यादा अगस्त में बेरोजगारी दर 6.5 फ़ीसदी रही थी।

यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ यूके के विजिटिंग प्रोफेसर संतोष महरोत्रा भी एक लेख में लिखते हैं कि हाल वर्षों में यूपी में आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हुई हैं और इस कारण रोजगार के अवसर भी। उन्होंने लिखा है कि इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। वह लिखते हैं कि बफैलो मीट का निर्यात 2016-17 में क़रीब 26 हज़ार करोड़ से घटकर 2019-20 में क़रीब 22 हज़ार करोड़ रह गया। आगरा और कानपुर का चमड़ा उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गो रक्षा के नाम पर जो हमले हुए उसका असर इस उद्योग पर पड़ा, किसान प्रभावित हुए, फ़सलें बर्बाद हुईं, अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई और लाखों का रोजगार प्रभावित हुआ। 

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महरोत्रा लिखते हैं कि इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी साफ़ देखा जा सकता है। उन्होंने आँकड़ा दिया है कि अखिलेश यादव सरकार में 2012-17 के दौरान जहाँ राज्य की विकास दर 6.92 फ़ीसदी प्रतिवर्ष रही थी वहीं योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में 4.88 फ़ीसदी प्रतिवर्ष रही है। वह भी कोरोना काल 2020-21 को हटा देने के बाद। यदि कोरोना काल को जोड़ दिया जाए तो औसत रूप से यह आँकड़ा और कम हो जाएगा। प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में भी यही हालात हैं। अखिलेश के कार्यकाल में प्रति व्यक्ति आय 27.6 फ़ीसदी बढ़ी थी जबकि योगी के कार्यकाल में 9.23 फ़ीसदी ही बढ़ी, वह भी कोरोना काल को छोड़ दें तो।

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यह गिरावट का दौर डिमोनेटाइजेशन और जीएसटी के लागू किए जाने के बाद देखा जा सकता है। इसी बीच 2017-18 के लिए बेरोजगारी के जो आँकड़े आए वह एक रिकॉर्ड था। 45 साल में सबसे ज़्यादा बेरोजगारी हो गई थी। ऐसा तब था जब मोदी सरकार ने हर साल 2 करोड़ नयी नौकरियों का वादा किया था। ख़बरें आईं कि नयी नौकरियाँ तो पैदा नहीं हुईं और दूसरी नौकरियाँ भी कम होती गईं। 

यही हाल उत्तर प्रदेश में भी हुआ। यदि कोरोना काल को छोड़ दें तो भी प्रदेश में रोजगार के हालात ख़राब होने के ही संकेत मिले हैं। कोरोना काल में तो हालात और बदतर ही हुए हैं। 

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