20 अप्रैल 2026 को देश के तमाम हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों में मुख्य पृष्ठ पर एक बार फिर से ‘योगी की पाती’ (यानी, योगी का पत्र) नाम का कॉलम प्रकाशित हुआ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी लोगों से सीधे जुड़ना चाहते हैं. शायद इसलिए ‘योगी की पाती’ नाम का जो प्रयोग मुख्यमंत्री ने 2022 में हर घर तिरंगा कार्यक्रम के दौरान किया था उसे अक्टूबर 2025 से नियमित साप्ताहिक कार्यक्रम में बदल दिया गया है. यह कुछ वैसा ही ‘मोनोलॉग’ कार्यक्रम है जैसा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मन की बात’ नाम से करते हैं. फ़र्क़ यह है कि मोदी का कार्यक्रम ‘ऑडियो’ फॉर्मेट में है और योगी का ‘टेक्स्ट’ लेकिन दोनों ही उद्देश्य लोगों के साथ एक खास तरह का संवाद करना है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि चाहे योगी का कार्यक्रम हो या मोदी का, दोनों ही में जो बात सबसे ज़्यादा कॉमन है वो यह कि इन दोनों में ‘मोनोलॉग’ के पीछे देश और प्रदेश की मुख्य समस्याओं को ढकने का प्रयास किया जाता है. दोनों ही नेता एक ऐसा देश/प्रदेश दिखाने की कोशिश करते हैं जो असल में या तो अस्तित्व में नहीं है या फिर एक ‘टोकन’ के रूप में कहीं कहीं दिख सकता है. 20 अप्रैल वाले अपने पत्र में योगी ने ‘मौसम’, ‘ग्रीष्म ऋतु’, ‘हीट वेव’, ‘परशुराम’ और ‘अक्षय तृतीया’ जैसे मुद्दों पर बातचीत की है. उन्होंने ‘श्रमिकों’ के विषय पर लिखा है लेकिन वो नहीं जो असल में लिखा जाना चाहिए.
एक तो यह कोई संवाद नहीं है जैसा कि मीडिया में प्रचारित किया जाता है. फिर भी अगर इसे थोड़ी देर के लिए ‘संवाद’ मान भी लें तो एक मुख्यमंत्री द्वारा अपने राज्य की जनता से किया जाने वाला संवाद सिर्फ़ ‘अच्छाई’ और ‘अच्छी बातों’ पर आधारित नहीं होना चाहिए. संवाद का उद्देश्य ‘जरूरी बातों’ पर ध्यान से जुड़ा हुआ होना चाहिए. जब लोग परेशान हों, तकलीफ़ और मजबूर महसूस कर रहे हों तब संवाद सीधे उनकी तकलीफ़ों से जुड़ा होना चाहिए भले ही उस संवाद से सवाल ख़ुद मुख्यमंत्री पर ही क्यों न उठें!
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‘स्टैंडिंग फायर एडवाइजरी कौंसिल’(SFAC), 1955 में स्थापित, केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत एक महत्वपूर्ण संस्था है जो पूरे देश में अग्नि सेवाओं (Fire Services) के संगठन और विकास के लिए तकनीकी सलाह देती है. SFAC ने आग लगने की सूचना मिलने के बाद अग्नि-शमन सेवाओं के ‘रिस्पॉन्स टाइम’ पर कुछ जरूरी मानक तय किए हैं. यह मानक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग हैं. इसके अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 5-7 मिनट के भीतर फायर सर्विस को पहुँच जाना चाहिए, साथ ही शहरी क्षेत्र के हर 10 वर्ग किमी के दायरे में एक फायर स्टेशन अवश्य होना चाहिए. ग्रामीण क्षत्रों में रिस्पॉन्स टाइम 20 मिनट रखा गया है और हर 50 वर्ग किमी के अंदर एक फायर स्टेशन की अनुशंसा की है. इसके अलावा हर 50 हज़ार की जनसंख्या पर एक फायर गाड़ी होनी चाहिए.
पिछले सप्ताह, 15 अप्रैल बुधवार, को लखनऊ के विकास नगर स्थित एक झुग्गी-बस्ती में आग लग गई. इसमें 500 परिवार और उनकी चल-अचल संपत्ति जलकर ख़ाक हो गई. किसी के 3.50 लाख जल गए, किसी के एक लाख तो किसी के 10 हज़ार. किसी के गहने जल गए तो किसी के मवेशी. घर तो किसी का भी नहीं बचा. कई पीड़ित तो यह मानने को तैयार ही नहीं कि आग किसी प्राकृतिक कारण से लगी है. उनका संदेह है कि आग लगवाई गई है. मुझे नहीं पता सच क्या है, लेकिन इसकी जांच तो होनी ही चाहिए.
‘योगी की पाती’ में विकास नगर में लगी आग को लेकर अपराधबोध होना चाहिए था, अफ़सोस और तकलीफ़ का ज़िक्र होना चाहिए था. ख़ुद पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री जी को लिखना चाहिए था कि निश्चित रूप से उनका प्रशासन पर्याप्त रूप से दक्ष नहीं है इसलिए तो आग लगने के बाद जो दमकल की गाड़ियाँ 7 मिनट में पहुँचनी चाहिए थीं उन्हें पहुँचने में 2 घंटे लग गए.
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, आपको अपने ‘सम्मानित प्रदेशवासियों’ को यह बताना चाहिए कि क्या आपके द्वारा शासित राज्य, उत्तर प्रदेश, में SFAC की सिफारिशों के अनुसार मानक स्थापित किए गए हैं? प्रदेश की समस्याओं पर संवाद करना अपमान की बात नहीं बल्कि साहस का विषय है. योगी आदित्यनाथ जी को साहस दिखाकर अपनी ‘पाती’ में उस रुदन का ज़िक्र करना चाहिए था जो इन 500 परिवारों में स्थायी रूप से बस गया है. उन्हें दर्द साझा करते हुए दो छोटी बच्चियों की जलकर हुई मौत का ज़िक्र भी अपनी ‘पाती’ में जरूर करना चाहिए था. मुख्यमंत्री इस बात का ज़िक्र कर रहे हैं कि “घर के बाहर पशु-पक्षियों के लिए पानी रखें. आप भी पर्याप्त मात्रा में पानी, शिकंजी, छाछ या नारियल पानी पीते रहें. बच्चों एवं बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें”. लेकिन यह नहीं लिख रहे हैं कि 500 परिवार उजाड़ गए हैं, उसमें बुजुर्ग भी हैं, बच्चे भी हैं और ऐसी भीषण गर्मी में वो लोग कैसे जिंदा रहेंगे? ‘शिकंजी’ पीना तो बहुत दूर की बात है जिन्हें साँस की बीमारी है उनका इस भीषण गर्मी में साँस लेना भी मुश्किल है. जिस धूप में 10 मिनट भी बाहर रुकना मुश्किल है उसी धूप में ये 500 परिवार कैसे रहेंगे?
वैसे तो मुख्यमंत्री की ‘पाती’ साफ़-सुथरी है उसमें तमाम बातों का ज़िक्र है लेकिन अगर प्रदेश में पीड़ितों की नज़र से इसे देखा जाएगा तो स्पष्ट रूप से यह संवेदनहीन दिखेगी. विकासनगर, लखनऊ की आग एकमात्र आग नहीं जो इस सप्ताह लगी. ग़ाज़ियाबाद में इंदिरापुरम के पास स्थित एक बस्ती में लगभग 200 झुग्गियाँ जलकर ख़ाक हो गईं. यह घटना सुबह 11:30 के आसपास लगी. यहाँ भी पीड़ितों का रुदन भीतर से झकझोर देता है लेकिन इस घटना का ज़िक्र भी योगी जी की पाती में नहीं मिला.
एक प्रदेश के मुखिया द्वारा इस तरह अपनी जनता तक पहुँचना एक किस्म की ‘छद्म-वार्ता’ है जिसकी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं. एक प्रदेश का नेता क्या सोचता है यह उसके कार्यों में दिखना चाहिए. योगी अपनी पाती में लिखते हैं कि “भगवान श्री परशुराम के आशीर्वाद से प्रदेश में सत्य, न्याय और धर्म की स्थापना हुई है, जो अक्षय है”. यह संविधान से विमुख होने का नजरिया दिखाता है क्योंकि सिर्फ़ उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत में कहीं भी यदि न्याय की स्थापना हुई है, यदि कहीं भी भेदभाव कम या ख़त्म  हुआ है तो इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘संविधान’ का योगदान है. 
यह भारत का संविधान ही था जिसने अनुच्छेद-17 के माध्यम से घोषणा की, कि भारत में अस्पृश्यता एक अपराध माना जाएगा. यह भारत का संविधान ही था जिसने अनुच्छेद-14-18 के माध्यम से पूरे देश के लोगों को ‘समानता के अधिकार’ का आश्वासन दिया. वरना यदि किसी धर्म विशेष की चलती तो धर्म अपने मनमाने क़ानूनों को अपनी तरह लागू करते. वैसे ही जैसे सबरीमाला में लागू किए जाने की कोशिश है जिसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संवैधानिक पीठ सुनवाई कर रही है. जिसमें मंदिर प्रशासन अडिग खड़ा है कि अय्यप्पा स्वामी मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष उम्र वाली महिलाएं प्रवेश की हक़दार नहीं.
मुझे नहीं पता योगी आदित्यनाथ किस सत्य, न्याय और धर्म की बात कर रहे हैं. क्योंकि भारत में चुनी हुई सरकारों का सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही धर्म है- संविधान. यही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जिसने सदियों पुरानी शोषण की मनमानी परंपराओं को 26 जनवरी 1950 को, एक झटके में पूरी तरह नकार दिया. भारत में न्याय व्यवस्था किसी भी धर्म के किसी भी देवी-देवता या पैगंबर की मोहताज नहीं है. अगर कुछ ‘अक्षय’ है तो वो है भारत का संविधान, भारत की संप्रभु स्थिति और भारत के लोग.
एक ‘नेता’ अपने पक्ष में शीतलता का आग्रह नहीं कर सकता उसे ‘रोष’ के बीच ही रहकर बढ़ना होता है. यह रोष एक भूखे मज़दूर का हो सकता है, बलात्कार से पीड़ित किसी बच्ची के पिता का हो सकता है या उनका भी जिनके घर जल चुके हैं, जिनकी बेसिक आवश्यकताएं भी उनकी आमदनी के सामने बेबस हैं. अपनी जनता के गुस्से, तनाव और परेशानियों का समाधान करने वाला व्यक्ति ही नेता है वो नहीं जो अपने मन से चुनकर कुछ हरी-भरी खबरें अपने मन मुताबिक जोड़कर सामने रख देता है. उसे रूखी और आकर्षण-विहीन दिखने वाली समस्याओं- ग़रीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य सेवाएं, बीमारियां, बर्बाद होती खेती आदि- पर समाधान पेश करना होगा, तभी उसे नेता कहा जाएगा. क्योंकि ये वही समस्याएं हैं जिनसे देश की 95% आबादी लड़ रही है.
अगर अपनी पाती में परशुराम का ज़िक्र करना ही था तो मेरठ में तैनात DSP शुचिता सिंह के माध्यम से करते जो परशुराम जयंती पर फरसा लहरा रहे लोगों को ‘कानून के शासन’ से चेतावनी दे रही थीं. ज़िक्र करना ही था तो लिखना था कि यह अच्छा नहीं हुआ कि लोगों ने परशुराम जयंती पर फरसा लहराया.
प्रदेश के कासगंज में जिस तरह डॉ अंबेडकर जयंती के जुलूस को कुछ उपद्रवियों ने रोका, योगी जी को खुलकर लिखना चाहिए था कि उन्हें अफ़सोस है कि डॉ अंबेडकर जयंती पर इस किस्म का उपद्रव हुआ. एक व्यक्ति जिसने देश का संविधान बनाया उसके जन्मदिन का जुलूस तक जो लोग बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं आख़िर वो किस विचारधारा के लोग हैं? उनकी मानसिकता क्या है? योगी जी को इस पर कुछ कहना ही चाहिए था. लेकिन इन सब बातों पर न बोलकर योगी जी ने एक खास संदेश दिया है जिसे उनके मानने और चाहने वाले समझ लेंगे.
एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को प्रदेश में बदल रहे और भयावह हो रहे अपराधों की प्रकृति पर बात करना चाहिए था, उदाहरण के लिए- एक 55 वर्षीय सिपाही रामवीर सिंह ने खुद को मृत घोषित करवाकर अपने खिलाफ चल रहे दर्जनों आपराधिक मुकदमों से बचने के लिए एक बेकसूर भिखारी की हत्या कर दी. आरोपी रामवीर सिंह ने टिन शेड के नीचे सो रहे एक बुजुर्ग भिखारी पर केरोसिन डालकर उसे जिंदा जला दिया. लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस के बारे में यह एकमात्र खबर नहीं है जिस पर चर्चा होनी चाहिए. यूपी पुलिस किस तरह पीड़ित को ही प्रताड़ित करती है, यह हाल में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में भी सामने आया. 
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गाजियाबाद में 4 साल की बच्ची के साथ बलात्कार और उसके बाद की गयी क्रूरता के बाद जिस तरह का उत्तर प्रदेश देखने को मिला वह बहुत ही भयावह है. यूपी के अस्पताल किस तरह पीड़ितों के साथ मनमाना व्यवहार करते हैं, किस तरह यूपी पुलिस पीड़ितों को प्रताड़ित करती है यह मामला इसका क्लासिक उदाहरण है. यौन क्रूरता की शिकार 4 साल की इस बच्ची के पिता ने जब उसे अस्पताल में दिखाना चाहा तो प्राइवेट अस्पतालों ने बच्ची को भर्ती करने से ही मना कर दिया. जिसकी वजह से बच्ची मर गई. जब परिजन शिकायत करने थाने पहुँचे तो उनके साथ मार-पीट की गई, उन्हें लॉकअप में बंद कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस असंवेदनशीलता को अपने आदेश में दर्ज करते हुए कहा कि, "ऐसे भयावह अपराध का संज्ञान लेने के बजाय, याचिकाकर्ता (बच्ची के पिता) और उसकी पत्नी सहित उनके परिवार के सदस्यों को लॉकअप में बंद कर दिया गया और उनके साथ शारीरिक रूप से मारपीट की गई, साथ ही इस घटना के बारे में चुप रहने की चेतावनी भी दी गई."
मेरा सवाल यह है कि ‘योगी की पाती’ में ऐसी बातों का ज़िक्र क्यों नहीं है? उत्तर प्रदेश कस्टोडियल डेथ के मामले में देश में पहले स्थान पर है, इस बात का ज़िक्र क्यों नहीं है? पुलिस में आम नागरिकों के ख़िलाफ़ क्रूरता क्यों है? इसे संबोधित क्यों नहीं किया जाता? इस संबंध में योगी जी अपनी पाती में क्यों कुछ नहीं लिखते?
जब कोई पत्र, जैसे कि ‘योगी की पाती’ हर अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हो रहा है जिसमें निश्चित ही बहुत पैसे खर्च किए जा रहे होंगे तो उसमें बहुत अहम संदेश, जानकारियाँ और चिंताएँ शामिल की जानी चाहिए थीं. ऐसे अपराधों और बातों पर उचित संदेश देने से जनता सतर्क होती है. लेकिन संभवतया योगी जी को डर यह है कि यदि इन सब बातों का ज़िक्र अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर ख़ुद ही कर दिया तो कहीं उनके द्वारा ‘कानून के शासन’ का बनाया गया बुलबुला फूट ना जाये.