बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार को नफ़रती भीड़ से बचाने वाले कोटद्वार के जिम मालिक दीपक कुमार उर्फ 'मोहम्मद दीपक' आर्थिक संकट में हैं। कुछ महीने का किराया न दे पाने वाले दीपक को क्या मुस्लिम के साथ खड़ा होना भारी पड़ा?
उत्तराखंड के कोटद्वार में एक वृद्ध मुस्लिम के साथ खड़ा होने वाले 'मोहम्मद दीपक' को अब जिम खाली करने को कह दिया गया है। कुछ महीने का मकान किराया देने में देरी होने की बात मानते हुए मोहम्मद दीपक ने कहा कि मकान मालिक की बातों से लगा कि 'क्योंकि मैं मुस्लिमों के लिए खड़ा हुआ इसलिए वह मुझे किराए पर कमरा नहीं देना चाहते हैं।' कर्ज लेकर जिम शुरू करने वाले दीपक के सामने अब होम लोन की EMI को चुकाना भी मुश्किल हो रहा है।
दरअसल, मोहम्मद दीपक की यह मुश्किल आज नहीं खड़ी हुई है। जब से मुस्लिम के पक्ष में खड़े होने वाला उनका वीडियो वायरल हुआ तब से वह लगातार संकट में घिरे हुए हैं। अब तो वह भारी आर्थिक संकट में फँस गए हैं। उनका जिम बंद होने की कगार पर है।
दीपक से बन गए 'मोहम्मद दीपक'
26 जनवरी 2026 को कोटद्वार में दीपक कुमार ने 70 साल के मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की मदद की। दुकान का नाम ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ था। कथित तौर पर बजरंग दल से जुड़े कुछ लोग दुकानदार से ‘बाबा’ शब्द हटाने को कह रहे थे। दीपक ने बीच में आकर विरोध किया। जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने कहा– 'मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।' यह वीडियो वायरल हो गया।मुस्लिम विरोधी नफ़रत का शिकार हुए एक मुसलमान के लिए खड़े होने पर दीपक को देशभर में सराहना मिली, लेकिन स्थानीय स्तर पर उन पर दबाव बढ़ गया। 31 जनवरी को बजरंग दल के कई कार्यकर्ता उनके जिम के बाहर जमा हो गए। पुलिस ने उन्हें बचाया।
जिम का बुरा हाल
इस घटना के बाद दीपक के 'हल्क जिम' में सदस्यों की संख्या तेजी से घटी। पहले रोजाना 150 लोग आते थे, जो घटकर सिर्फ 15 रह गए। बाद में कई लोग मदद को आगे आए। वकीलों और आम नागरिकों के समर्थन से सदस्य संख्या बढ़कर क़रीब 70 रोजाना हो गई, लेकिन आर्थिक नुक़सान पहले ही हो चुका था। जिम का मासिक किराया 40000 रुपये है। दीपक चार महीने का किराया नहीं दे पाए।
अब मकान मालिक ने उन्हें जगह खाली करने को कह दिया है। दीपक ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, 'मैं लगातार किराया नहीं दे पाया। हालत सुधर रही थी क्योंकि 70 लोग आने लगे थे, लेकिन मकान मालिक का कहने का मतलब था कि मैंने मुसलमानों की मदद की थी, इसलिए वह किराए पर नहीं देना चाहते हैं।'
घर का लोन भी डूबा
दीपक ने घर बनाने के लिए लोन लिया था। उसकी ईएमआई 16000 रुपये महीना है। सदस्यता कम होने से आय घट गई, इसलिए ईएमआई भी प्रभावित हुई। उन्होंने कहा, 'जब सदस्यता अभियान चला तो उस पैसे से मैं ईएमआई और बच्चे की फीस भर रहा था, किराया नहीं दे पाया। अब मालिक बाहर निकालने की धमकी दे रहा है।'परिवार की एकमात्र आय दीपक की ही थी। अब उनकी 70 साल की माँ सड़क किनारे चाय की दुकान चलाकर मदद कर रही हैं।
कुछ मदद मिली, लेकिन काफी नहीं
सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों ने दीपक के जिम की वार्षिक सदस्यता भरने की पेशकश की। देशभर से कुछ लोग सदस्यता लेकर मदद कर रहे हैं, लेकिन दीपक कहते हैं कि जिम चलाने के लिए इससे ज़्यादा की ज़रूरत है। मार्च 2026 में दीपक ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में एफ़आईआर रद्द करने की याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने कहा कि जाँच में सहयोग करने के लिए वे सोशल मीडिया पर वीडियो या मैसेज न डालें।
कोर्ट ने दीपक की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि जाँच चल रही है, इसलिए सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने से जाँच प्रभावित होगी। कोर्ट ने साफ़ कहा, 'सोशल मीडिया पर संदेश या वीडियो भेजने से जांच प्रभावित होगी। हम ऐसा कोई काम नहीं होने देंगे।'हाई कोर्ट ने फटकार लगाई थी
पुलिस सुरक्षा की मांग पर जस्टिस थपलियाल ने पहले फटकार लगाते हुए कहा था कि ये दीपक की अतिरिक्त मांगें जांच को प्रभावित करने की कोशिश हैं। आरोपी खुद संदिग्ध है तो पुलिस सुरक्षा की मांग कैसे? उन्होंने पूछा- 'आरोपी जांच के दौरान पुलिस सुरक्षा मांगेगा? यह पूरी तरह अनुचित है। यह जांच एजेंसी पर दबाव डालने की कोशिश लगती है।' राज्य सरकार की तरफ़ से वकील ने बताया कि जांच अधिकारी ने फोन पर कहा है कि दीपक को कोई ख़तरा नहीं है। कोर्ट ने दीपक के वकील नवनीश नेगी से कहा, 'पहली घटना 26 जनवरी, दूसरी 31 जनवरी की। फरवरी पूरा हो गया, मार्च आधा बीत गया। किसी ने आपको हाथ भी नहीं लगाया।'
नफ़रत फैलाने वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की मांग पर हाई कोर्ट ने कहा कि इसके लिए दीपक के पास मजिस्ट्रेट के पास जाने का क़ानूनी रास्ता है। इसने कहा कि हाई कोर्ट में याचिका डालकर एफ़आईआर दर्ज करवाना गलत है, खासकर जब याचिकाकर्ता खुद आरोपी है।दीपक का संदेश
दीपक अभी भी कहते हैं कि उन्होंने जो किया, वह इंसानियत के लिए था। उन्होंने कहा था कि हर कोई बराबर है और गलत के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। ‘मोहम्मद दीपक’ की कहानी सामाजिक सद्भाव का प्रतीक बनी, लेकिन आर्थिक बहिष्कार ने उनके रोजगार को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। अब उनके जिम के बंद होने की नौबत आ गई है।
यह मामला दिखाता है कि नफरत के ख़िलाफ़ खड़ा होना और इंसानियत का क़दम उठाना भी कितना भारी पड़ सकता है। दीपक जैसे लोग कहते हैं- 'ईमानदारी की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है।' घटना के बाद कई विपक्षी नेता और आम लोग दीपक से मिल चुके हैं और समर्थन जता चुके हैं। लेकिन जिम का भविष्य अभी अनिश्चित है।