महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में 12 साल गुज़ारने के बाद राम के पुत्र लव और कुश जब पहली बार उनसे मिलते हैं तो वो अपने पिता राम पर दो आक्षेप लगाते हैं। पहला तो यह कि राम के भीतर प्रेम नहीं है। दूसरा ये कि राम न्याय प्रिय नहीं हैं। राम जिन्हें प्रेम का अग्रदूत माना जाता है और न्याय प्रियता के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम की संज्ञा दी जाती है, उनके प्रेम और न्याय प्रियता पर उनकी ही संतान के द्वारा सवाल उठाया जाना निश्चित ही एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है। वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में यह विवरण मिलता है। नौटंकी शैली के नाटककार आगा हश्र कश्मीरी ने अपनी कृति ‘सीता बनवास’ में इस प्रकरण को बहुत शिद्दत से उठाया है।

करीब सौ साल पहले लिखे गए इस नाटक में सीता और उनके संतान के दृष्टिकोण से राम को समझने की कोशिश की गयी है। प्रचलित कथा के अनुसार लंका से लौट कर अयोध्या का राजा बनने के बाद प्रजा के आक्षेप पर राम ने गर्भवती सीता को बनवास दे दिया था। ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में लव कुश का जन्म हुआ। 

इस घटना के 12 वर्षों के बाद राम से पहली बार सामना होने पर लव कुश ने सवाल उठाया कि राम में अगर प्रेम भाव था तो उन्होंने उनकी माता सीता को क्यों ठुकराया? राम की न्याय प्रियता पर भी उनका सवाल था कि यह जानते हुए भी कि सीता पवित्र थीं, उनको अन्यायपूर्ण ढंग से बनवास की सजा क्यों दी। यह स्त्री की दृष्टि से राम को समझने की कोशिश है जिसे आगा हश्र कश्मीरी ने बहुत असरदार ढंग से उठाया है।
पारसी शैली के इस नाटक को प्रसिद्ध नाटककार अतुल तिवारी ने पारंपरिक मूल्यों के साथ आधुनिक आवरण में तैयार किया है। भारत रंग महोत्सव में पेश इस नाटक में एक तरफ़ पारसी शैली की गरिमा को क़ायम रखा गया तो दूसरी तरफ़ आधुनिक तकनीक के उपयोग से सम सामयिक बनाने की कोशिश भी की गयी। अतुल ने मूल नाटक के संवाद को बरक़रार रखा, लेकिन गीतों की रचना नए सिरे से करके ज़्यादा मनोरंजक बना दिया।

गायन और वादन पारसी शैली की एक ख़ास विशेषता है। सारे संवाद पद्य में होते हैं और पात्र गीतों को या तो ख़ुद गाते हैं या फिर पार्श्व से अन्य कलाकार साथ देते हैं। अतुल की टोली में गायकों और वादकों ने पारसी शैली के मूल स्वाद से परिचय कराया। नगाड़ा, ढोलक और सितार जैसे वाद्य यंत्रों की युगलबंदी में पारसी थिएटर का रंग बखूबी दिखाई दिया। अतुल ने सीता के दर्द और राम की दुविधा को आज के समय में महिलाओं की स्थिति से जोड़ने में निर्देशन की महारत को मंच पर उतार दिया।
प्रस्तुति मुंबई के अंक थिएटर ग्रुप की थी। प्रोडूसर प्रीता माथुर ठाकुर ने सीता की भूमिका में उस स्त्री के दर्द को उभारा जिसे बिना किसी अपराध के सजा भोगने के लिए मजबूर किया जाता है। लव कुश के विरोध के बावजूद राम ने सीता को स्वीकार नहीं किया और सीता ने धरती में समाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। लव कुश के सवाल अनुत्तरित रह गए।

अमन गुप्ता के अभिनय में राम की दुविधा की झलक साफ़ नजर आई। लव कुश की भूमिका में देव अधिया और जय आदित्य ने अपनी स्वाभाविकता से प्रभावित किया। हनुमान शिवा चोपड़ा ने पूंछ पर लिखे गीत में हास्य का पुट डालकर उसे मजेदार बना दिया। पारसी थिएटर में दृश्यों को बदलने और अलग स्थानों को दिखाने के लिए चित्रित पर्दों का उपयोग किया जाता था। अतुल ने सांकेतिक रूप में इस परंपरा से भी परिचित कराया और साथ में लाइट का उपयोग करके उसे नया रूप भी दिया। 

यह प्रस्तुति राम की विवशता और सीता की अगाध श्रद्धा के ज़रिए भारतीय समाज खासकर, हिंदू समाज की विडंबनाओं को सामने लाता है जो आज भी मौजूद है और हिंदू नव जागरण के नाम पर इस कुरीति को मजबूत करने की साज़िश अब और बढ़ती दिखाई देती है।