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तमिलनाडु के तुतीकोरिन में स्टरलाइट कंपनी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग।ट्विटर

प्रदूषण से कम जानलेवा नहीं है पर्यावरण संरक्षण!

स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार हमें संविधान देता है और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण भी लगातार इसकी वकालत करता रहा है। हमारे प्रधानमंत्री पर्यावरण सुरक्षा को 5000 साल पुरानी परंपरा बताते नहीं थकते। इन सबके बीच हक़ीकत यह है कि इसी देश के नए संस्करण, न्यू इंडिया में अवैध खनन, जंगलों के कटने, बांधों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले, साफ़ पानी और साफ़ हवा की माँग करने वालों पर पुलिस, भूमाफिया और सरकारी संरक्षण प्राप्त हत्यारे गोली चलाते हैं, कभी ट्रैक्टर चढ़ाते हैं या फिर सड़क दुर्घटना करवाते हैं। इस न्यू इंडिया में यह सब इतने बड़े पैमाने पर किया जा रहा है कि दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण करते मारे गए लोगों की सूची में भारत का नाम तीसरे स्थान पर है।

वर्ष 2012 से ब्रिटेन के एक ग़ैर-सरकारी संगठन, ग्लोबल विटनेस, नामक संस्था ने हरेक वर्ष पर्यावरण के विनाश के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों की हत्या के सभी प्रकाशित आँकड़ों को एकत्रित कर एक वार्षिक रिपोर्ट को तैयार करने का कार्य शुरू किया था। इस वर्ष की हाल में ही प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हरेक सप्ताह तीन से अधिक पर्यावरण संरक्षकों की हत्या कर दी जाती है। वर्ष 2018 के दौरान दुनिया में कुल 164 पर्यावरण संरक्षकों की हत्या कर दी गयी। सबसे अधिक ऐसी हत्याएँ फिलीपींस में 30, कोलंबिया में 24 और भारत में 23 हत्याएँ की गयीं। इसके बाद ब्राज़ील में 20 और ग्वाटेमाला में 16 पर्यावरण संरक्षक मारे गए।

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तूतीकोरिन में 13 लागों की मौत

भारत में 23 हत्याओं में से अकेले तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर के विरुद्ध आन्दोलन के दौरान ही 13 लोग उद्योगपतियों के गुंडों और तमिलनाडु पुलिस की गोली से मार दिए गए थे। मामला 22 मई, 2018 का है। तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियाँ चलाईं और ख़बरों के मुताबिक़ 11 लोग मौक़े पर ही मारे गए और 2 घायल अस्पताल में इलाज के दौरान मर गए। इससे पहले तीन महीनों से इस उद्योग द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण के ख़िलाफ़ लगातार आन्दोलन किये जा रहे थे, पर न तो सरकार को और न ही विपक्षी दलों को इससे कोई मतलब था।

लोगों की शिकायतें थीं कि पूरे क्षेत्र की हवा साँस लेने लायक नहीं है, नदियाँ ज़हरीली हो चुकी हैं और भू-जल भी उपयोग लायक नहीं बचा है। फिर भी किसी को कोई मतलब नहीं था, क्योंकि उद्योग को सरकारी संरक्षण प्राप्त था और बाक़ी लोगों को ख़रीदने की ताक़त थी। यह उद्योग वेदांता समूह का है।

परियोजनाओं की मंज़ूरी में गड़बड़ियाँ

सभी उद्योग या दूसरी परियोजनाएँ पर्यावरण और प्रदूषण से सम्बंधित मंजूरियों के बाद ही अस्तित्व में आती हैं। दरअसल, ये मंज़ूरियाँ ख़रीदी जाती हैं, हरेक सम्बंधित सरकारी नुमाइँदा इसे बेचने को बेताब रहता है। यह सब मोटी कमाई का सौदा है। तभी आज तक आपने शायद ही कोई परियोजना देखी हो जो प्रदूषण नियंत्रण या पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ भी कर रहा हो। यदि ऐसा होता तो आज वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से सबसे अधिक मौतें हमारे देश में नहीं हो रही होतीं।

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संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण का हाल

अब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण का हाल देखिये। वायु और जल प्रदूषण से सबसे अधिक मौतों वाला देश (जून 2018 तक), जहाँ पूरी ज़मीन ही एक कचराघर है, वह देश 2018 में विश्व पर्यावरण दिवस का वैश्विक मेजबान था। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की मेहरबानी यहीं ख़त्म नहीं हुई, इस संस्था ने भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति को पिछले वर्ष अपने सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजकर साबित कर दिया था कि पर्यावरण से इस संस्था का कोई लेना देना नहीं है और अच्छे सम्बन्ध और फ़ायदे के लिए कोई भी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार किसी को भी मिल सकता है। सभी जानते हैं कि हमारे देश में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से दुनिया में सबसे अधिक मौते होतीं हैं और सभी प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी चल रही है। स्वामी सानंद समेत अनेक संतों ने गंगा सफ़ाई के मुद्दे पर अनशन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

अवैध खनन उजागर करने पर जेल!

ग्लोबल विटनेस की रिपोर्ट के अनुसार कुल 164 हत्याओं का आँकड़ा दरअसल वास्तविक आँकड़ा नहीं है। हत्याएँ इससे बहुत अधिक होती हैं, पर आँकड़े प्रकाशित नहीं किये जाते। भारत में भी अवैध खनन को उजागर करने वाले या फिर इसका विरोध करने वाले लगातार मारे जाते हैं, पर समाचार नहीं बनते। यदि हत्या न भी हो, तब भी ऐसे लोगों को बिना किसी जुर्म के जेल में डाल देना या फिर देशद्रोही क़रार देना सामान्य है। भारत समेत अनेक देशों में ऐसे लोगों को आतंकवादी तक क़रार देने में सरकारें पीछे नहीं रहतीं।

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सुरक्षाकर्मियों ने भी हत्याएँ कीं

रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में सबसे अधिक 43 हत्याएँ अवैध खनन का विरोध करने वालों की गई। दुनिया भर में सिकुड़ते जल संसाधनों के संरक्षण की माँग करने वाले 17 लोगों की हत्या की गई। सभी हत्याओं में से 40 हत्याएँ पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने की, और इतनी ही हत्या भाड़े के गुंडों या फिर भूमाफियाओं ने की। रिपोर्ट के अनुसार ब्राज़ील, जो 2012 से लगातार ऐसी हत्याओं के सन्दर्भ में शीर्ष पर था, पहली बार चौथे स्थान पर पहुँच गया है और शीर्ष पर फिलीपींस आ गया है। सबसे अधिक हत्याएँ खनन, बाँध, हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट और कृषि आधारित उद्योगों के विरोध करने पर की जाती हैं।

प्रदूषण और पर्यावरण के विनाश से दुनिया भर में लोग मर रहे हैं, पर पर्यावरण संरक्षण भी कम जानलेवा नहीं है।

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महेंद्र पाण्डेय
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