सरकार मज़दूरों के मामले में लापरवाही के कीर्तिमान रच रही है। रेलवे उनसे किराया माँग रहा है और पुलिस उन पर लाठियाँ चमका रही है। वे अपने पैसों से चंदा करके परमिट लेकर भी घरों तक लौट नहीं पा रहे हैं और न ही सरकार उनके खाने पीने की सुध ले रही है। सर्वत्र फैले इस हाहाकार की मीमांसा कर रहे हैं शीतल पी सिंह।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।














.jpg&w=3840&q=75)








