131वाँ संविधान संशोधन विधेयक 17 अप्रैल को लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इस विधेयक की असफलता को केंद्र सरकार महिला आरक्षण क़ानून की असफलता का नाम देकर और उससे ही जोड़कर पेश करना चाहती है जबकि सच्चाई पूरी तरह अलग है। लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के प्रावधान वाला संविधान संशोधन विधेयक-2023 (106वाँ संशोधन विधेयक) 3 साल पहले ही एकमत से पारित किया जा चुका है लेकिन तब नरेंद्र मोदी सरकार की नीयत साफ़ नहीं थी इसलिए विधेयक में यह शर्त जोड़ दी गई थी कि यह आरक्षण तभी लागू होगा जब विधेयक पारित होने के बाद पहली जनगणना होगी और जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा। इस तरह मोदी सरकार ने दिखावे के लिए महिला आरक्षण कानून तो पास करवा लिया लेकिन उसे लागू करने की नीयत नहीं दिखाई।

चुनाव के बीच संशोधन विधेयक क्यों?

अब जबकि कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, तमाम सांसद और पार्टियां अपने अपने क्षेत्रों में चुनाव प्रचार में लगी हैं तब अचानक बिना किसी राय-मशविरे के, बिना विपक्षी दलों को साथ लिए, बिना सर्वदलीय बैठक बुलाये, मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र आयोजित करके 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश कर दिया। इस विधेयक के साथ परिसीमन विधेयक-2026 और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित बिल-2026 भी लाए गए। मोदी सरकार का प्रमुख उद्देश्य महिला आरक्षण विधेयक के नाम पर परिसीमन विधेयक को पास करवाना था जिसके लिए विपक्ष बिल्कुल तैयार नहीं था। विपक्ष का कहना था कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार की नीयत साफ़ है, अगर सरकार वाक़ई महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना चाहती है तो इस आरक्षण को बिना परिसीमन करवाए, वर्तमान में उपलब्ध लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों में ही लागू क्यों नहीं करती? लेकिन सरकार के पास इसका कोई जवाब ना ही आज था और ना ही 2023 में। मोदी सरकार चाहती तो महिलाओं को आरक्षण, 2024 के लोकसभा चुनावों में प्राप्त हो जाता लेकिन चूँकि इस सरकार की मंशा कभी भी महिलाओं को आरक्षण देने की नहीं रही इसलिए महिला आरक्षण बिल को नया नाम भले दे दिया पर लागू नहीं होने दिया।
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पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की निगाह में सिर्फ़ और सिर्फ़ परिसीमन विधेयक ज़रूरी था इसलिए उनकी इस ज़िद के कारण उन्हें विपक्ष का साथ नहीं मिला। परिसीमन आयोग का गठन कोई हंसी ठहाके का काम नहीं है। यह एक बेहद महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा काम है। इसके लिए सभी दलों के साथ विचार-विमर्श करना बहुत जरूरी होता है लेकिन जिस तरह वर्तमान मोदी सरकार काम कर रही है उस पर किसी भी विपक्षी दल को कोई भरोसा नहीं है। परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त जज, भारत का मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। इसके अलावा इन्हें सहयोग देने के लिए कुछ चुनिंदा सांसदों और विधायकों को शामिल किया जाता है लेकिन इनकी भूमिका सिर्फ़ सलाहकारी होती है।

ज्ञानेश कुमार की भूमिका  

आज भारत एक ऐसे वक़्त से गुज़र रहा है जहाँ वर्तमान सुप्रीम कोर्ट के जज पर विश्वास करने से भी डर लगता है, यह भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान जज सरकार के ख़िलाफ़ भी कोई काम कर सकते हैं, ऐसे में एक सेवानिवृत्त जज पर कितना भरोसा किया जा सकेगा? इसके अलावा इस परिसीमन आयोग का जो दूसरा प्रमुख सदस्य है वो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) होता है यानी अगर आज की नजर से देखें तो वो हैं श्री ज्ञानेश कुमार जी।
सोचना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि जो CEC मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी के साथ अभद्रता कर सकता है, जो इस देश की दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को ‘गेट आउट’ कह सकता है, जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष पर असंसदीय टिप्पणी कर सकता है, उस पर कौन भरोसा करेगा? क्या उस पर इतना भरोसा किया जा सकता है कि वो ईमानदारी से इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी का काम करेगा? 

यदि एक बार परिसीमन आयोग की रिपोर्ट बनकर गज़ट में प्रकाशित हो जाती है तो उसे भारत के भीतर किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, इसलिए जबतक विपक्ष का इस देश की संस्थाओं, न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर भरोसा पुख़्ता ना हो जाये, तब तक ऐसी किसी भी एक्सरसाइज का विरोध किया जाना चाहिए।

जनगणना के बाद भी परिसीमन!

यहाँ पर सिर्फ़ परिसीमन आयोग की बात नहीं है उस पर भरोसे की बात ज्यादा है। इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर 4 बार परिसीमन आयोग का गठन हो चुका है। 1952, 1963, 1973 और 2002 में। हर बार इसका गठन जनगणना के फ़ौरन बाद हुआ है लेकिन मोदी सरकार इसे जनगणना के 15 सालों बाद शुरू करना चाहती है। कोविड महामारी का असर 2021-22 तक ही था, जब इस दौर में पंचायत चुनाव हो सकते थे, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के चुनाव हो सकते थे तो जनगणना क्यों नहीं की जा सकती थी? टेक्नोलॉजी के दौर में जिस तरह आज जनगणना का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल तरीके से किया जा रहा है उस समय क्यों नहीं किया गया? बात सिर्फ़ कोविड महामारी की नहीं थी, बात थी इस महामारी के दौरान मारे गए भारतीय लोगों की, जिनकी संख्या मोदी सरकार की लापरवाही और अनदेखी की वजह से बेतहाशा बढ़ गई थी। अगर 2022 में जनगणना होती तो कोविड से मरने वालों की वास्तविक संख्या देश और दुनिया के सामने आ जाती और ‘जादूगर’ द्वारा बनाया गया भ्रम टूट जाता। अपनी नाकामी छिपाने के लिए सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों की बलि चढ़ाई गई, और लाखों लोगों को सामाजिक सुरक्षा से वंचित किया गया।
ऐसा कहा जा रहा है कि पिछले 12 सालों में पहली बार हुआ है जब मोदी सरकार संसद में किसी विधायी कार्य में असफल हुई है। यह बात सच है लेकिन एक बात और भी है, सच्चाई ये है कि मोदी सरकार की प्रमुख पहचान ही एक नाक़ाम और अक्षम सरकार की है। भारत की संस्थाओं पर लगातार कंट्रोल बनाकर, मीडिया पर एक पक्षीय नैरेटिव चलवाकर पीएम नरेंद्र मोदी जी ने अपनी छवि को बड़ा बनाकर दिखाया है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जिस भी राज्य में बीजेपी की सरकार है वहाँ गरीबों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। ‘कानून का शासन’, महिला सुरक्षा और गरीबों का मसीहा बनने का सिर्फ़ ढोंग ही किया जा रहा है। एक तरफ़ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल हो रही है तो दूसरी तरफ़ भारत भीतर से लगातार कमजोर होता जा रहा है।
विमर्श से और

चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था से फिसलकर छठी बने 

नरेंद्र मोदी ने देश को यह तो बताया कि भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है लेकिन अप्रैल 2026 में आई IMF की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ ने जब कहा कि भारत ना तो अब चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था रहा और न ही पाँचवी, भारत अब छठे स्थान पर खिसक गया है तब पीएम मोदी यह बताने देश के सामने नहीं आए कि भारत आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर क्यों खिसक रहा है? भारत का पड़ोसी पाकिस्तान, जिसने कभी भारत के बारे में अच्छा नहीं सोचा, जो हमेशा एक आतंकवादी देश के रूप में जाना गया, आज वो पूरी दुनिया में सबसे बड़ा मीडिएटर बनकर कैसे उभर गया? भारत की लोकतांत्रिक छवि कहाँ गई? कहाँ गई वो (नेहरू के जमाने की) छवि जो दुनियाभर में युद्ध रुकवाती थी (कोरिया युद्ध), शांति स्थापित करवाती थी (स्वेज नहर क्राइसिस)। जब भारत आर्थिक महाशक्ति नहीं था। आज सबकुछ होने पर भी भारत इतना कमजोर कैसे पड़ता दिख रहा है?

भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा

भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा धीरे-धीरे बिखर रहा है। अदालतें या तो समृद्ध लोगों के साथ खड़ी हैं या फिर सत्ताधीशों के। पुलिस हमेशा से सत्ता के साथ थी पर आज हालात और भी भयावह हैं, संवैधानिक संस्थाएं अपने नैतिक पतन का सर्वोच्च निचला स्तर पाने को बेताब हैं। निष्पक्ष चुनाव अब भारत की विशेषता नहीं रहा, निष्पक्ष स्पीकर अब भारत की विशेषता नहीं रहा। अगर हम सिर्फ़ 2025-26 के आंकड़े ही देख लें तो ‘डेमोक्रेसी इंडेक्स’ भारत को त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र बोल रहा है, ‘वेराइटीज़ ऑफ़ डेमोक्रेसी रिपोर्ट भारत को ‘चुनावी निरंकुशता’ बता रहा है और ‘फ्रीडम हाउस’ की प्रतिष्ठित रिपोर्ट ने भारत को ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ देश का दर्जा दिया है। 

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के हिसाब से भारत ‘अत्यधिक गंभीर’ अवस्था में है। जब कानून के शासन से संबंधित सूचकांक पर नज़र जाती है तो पता चलता है भारत 86वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार बोध सूचकांक में भारत 96वें स्थान पर है।

मज़दूर प्रोटेस्ट कर रहे हैं, उनकी आमदनी उनका पेट नहीं भर पा रही है, वे अपनी बात रख रहे हैं तो इस बात के कारण उनपर मुक़दमा हो रहा है और लाठियाँ बरस रही हैं। बस्तियाँ जलकर ख़ाक हो रही हैं। बलात्कार थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कोई महिलाओं पर एसिड फेंक रहा है, तो कोई चाकू से मार डालता है। अंकिता भंडारी जैसे महिलाएं बीजेपी के बड़े नेताओं का शिकार बन रही हैं लेकिन मजाल है किसी के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही हो जाये! कार्यवाही उनपर हो रही है जो भूख बर्दाश्त ना होने पर सड़कों पर उतर आए हैं।

बीजेपी और महिला सम्मान!

एक ऐसा दल, जो आज सत्ता में है, महिलाओं के हितैषी होने की बात कर रहा है, असल में वो कभी महिलाओं का पक्षधर नहीं रहा। ना आरएसएस, न जनसंघ और न ही बाद में बीजेपी। इस दल ने क्यों कभी भी किसी भी महिला को इतना काबिल नहीं समझा कि उसे उनके संगठन की राष्ट्रीय कमान दी जा सके? जबकि कांग्रेस ने 1917 में ही एनी बेसेंट को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था और कुल मिलाकर 5 महिलाएं कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। आज की सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय इतिहास में जाने से फटीग महसूस करती है और सरकार की कुर्सी पर और संसद में बैठकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को कोसती रहती है, पर 72 लोगों की मंत्रिपपरिषद में नरेन्द्र मोदी ने मात्र 7 महिलाओं को ही शामिल किया है, आखिर क्यों? और इसमें से भी मात्र 2 ही महिलाएं कैबिनेट रैंक की हैं बाक़ी 5 राज्य मंत्री के पद पर हैं। 21 राज्यों में बीजेपी और सहयोगी दलों की सरकार है लेकिन दिल्ली जैसे अर्धराज्य को छोड़कर, एक भी राज्य ऐसा नहीं जहाँ बीजेपी ने किसी महिला को मुख्यमंत्री बनाया हो। ऐसा दल इस तरह का दावा क्यों कर रहा है कि उसे महिलाओं की चिंता है, या उन्हें सशक्त बनाना है?
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बात अगर प्रतिनिधित्व ना देने तक ही रहती तो भी ठीक था। यह तो ऐसा दल है जो बलात्कारियों को माला पहनाता है। बिलकिस बानो के मामले को कैसे भुलाया जा सकता है? एक महिला जो 2002 में जब गर्भवती थी तब उसके साथ 11 लोगों ने बलात्कार किया, उसकी तीन साल की बेटी समेत 14 लोगों की हत्या कर दी। इतनी विक्षिप्त मानसिकता वाले 11 लोगों को गुजरात की बीजेपी सरकार ने 2022 में अपनी ‘माफ़ी नीति’ के तहत जेल से रिहा कर दिया था। क्या यह शर्म की बात नहीं है? क्या ऐसा दल महिलाओं का नाम भी लेने का हक़दार बचा हुआ है? शर्म की बात है कि ऐसे दल को कोई महिला अपना वोट देती है। शर्म की बात है अगर कोई महिला इस दल में जाकर अपना राजनीतिक करियर बनाना शुरू करती है!

बीजेपी वही दल है जिसके नेता आसाराम जैसे बलात्कारी के करीबी माने जाते हैं, ये वही दल है जो राम-रहीम जैसे धूर्त और बलात्कारी को असंख्य बार पेरोल पर बाहर छोड़ने का काम करता है, ये वही दल है जो कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप करने वालों के समर्थन में रैलियां निकालते हैं।

मोदी का महिला सम्मान!

इनके छोटे-मोटे नेताओं से क्या आशा की जा सकती है जब इनका नेतृत्व ही महिला विरोधी है। कोई भूल नहीं सकता और किसी को भूलना भी नहीं चाहिए जब पीएम मोदी ने भाषण देते हुए ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’ और ‘कांग्रेस की विधवा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। थोड़ी देर के लिए यह भूल जाएँ कि यह किसके बारे में कहा गया था तो भी यह शब्दावली भारत के प्रधानमंत्री की नहीं होनी चाहिए क्योंकि ऐसी शब्दावली सड़क में लोफर इस्तेमाल करते हैं। इस क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल करने वाले पीएम मोदी किस नैतिक बल से दूसरों को महिला विरोधी साबित कर रहे हैं? पहले अपने इस कृत्य के लिए मंच से माफ़ी मांगे और देश माफ़ कर पाए तब बात आगे बढ़े।

सिर्फ़ चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहने की रणनीति बनाना ही लीडर का काम नहीं है, न ही ऐसा व्यक्ति ‘चाणक्य’ कहलाता है। लीडर वो होता है, चाणक्य उसे कहते हैं जो इस तरह रणनीति बनाता है, जिससे राज्य के भविष्य, राज्य में रहने वाले लोगों को अपने भविष्य और जीवन से समझौता ना करना पड़े। लोकतंत्र में हमेशा ‘सिर्फ़’ पद में बने रहना और इसी के लिए प्रयास करते रहना कोई योग्यता नहीं बल्कि एक लाइलाज बीमारी है।