संविधान दिवस के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश केनाम एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने संविधान को पवित्र दस्तावेज बताया और साथ ही यह भी कहा कि उनके जैसे सामान्य व्यक्ति को इतनी ऊँचाई तक पहुँचाने में संविधान का ही योगदान है. मोदी यह बताना नहीं भूले कि कैसे उन्होंने संसद कीसीढ़ियों को चूमा था और किस तरह उन्होंने संविधान को सिर से लगाया था. अख़बारों ने संविधान दिवस के अगले दिन पीएम मोदी के हवाले से मुख्य पृष्ठ पर छपाई की, और लिखा “संविधान सपने पूरे कर रहा है”.
मुझे पीएम मोदी का ‘चिट्ठी लेखन कार्य’ बिलकुल उनके चुनावी भाषण जैसा लग रहा था. जिसमें जो बोला जाता है वो पूरा नहीं किया जाता और न ही पूरा किए जाने की मंशा या सम्भावना होती है.

संविधान एक दस्तावेज है जिसने आज़ादी के बाद के भारत को ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य’ के रूप में गढ़ा है. पीएम मोदी की एक बात सही है कि संविधान एक पवित्र दस्तावेज है लेकिन उन्होंने जिस तरह संविधान का ग़ैर ज़िम्मेदाराना इस्तेमाल किया है उससे संविधान की गरिमा गिरी है, लोगों का विश्वास उस पर कम हुआ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने संवैधानिक मूल्यों और मर्यादाओं के विपरीत जाकर काम करना जारी रखा है और इसके लिए भी उन्होंने संविधान का ही ग़लत इस्तेमाल किया है इसलिए संविधान के मुख्य शिल्पी डॉ भीमराव अंबेडकर का संविधान सभा मेंअंतिम भाषण का यह कथन महत्वपूर्ण हो जाता है कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं- तो वह बुरा सिद्ध हो सकता है.” भारत का संविधान सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करता है, यही भारतीय संविधान की विशेषता है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि सरकार खुद को किसी धर्म से जोड़कर देखेगी या किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होगी.राम मंदिर विवाद एक भूमि विवाद था जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया. 
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इसमें कुछ ख़ामियाँ हो सकती हैं लेकिन फिर भी सभी समुदायों ने इसे स्वीकार किया. सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं होना चाहिए था लेकिन जब से राम मंदिर भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है तब से नरेंद्र मोदी लगातार ख़ुद को राम मंदिर सेजोड़ रहे हैं. चाहे भूमि पूजन हो या उद्घाटन या अभी हाल में हुआ राम मंदिर ध्वजारोहण. पूरी सरकार एक धर्म विशेष के साथ खड़ी और झुकी हुई दिख रही है. जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, जब तक वो पूरे देश का प्रतिनिधित्वकर रहे हैं, तब तक वो अपने को सिर्फ़ एक धर्म से जुड़ा हुआनहीं दिखा सकते, या मैं यह कहूँ कि उन्हें नहीं दिखाना चाहिए.
प्रधानमंत्री ‘राज्य’ का मानवीय स्वरूप होता है और राज्य का कोई धर्म नहीं होता ऐसे में पीएम मोदी संविधान की मूल भावना का उल्लंघन कर रहे हैं. ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य के एम मुंशी ने मौलिक अधिकारों पर बहस के दौरान स्पष्ट किया था कि राज्य और धर्म का संबंध कैसा होना चाहिए. उन्होंने कहा कि “धर्म-निरपेक्ष राज्य,धर्म-विरोधी नहीं होता, बल्कि वह किसी एक धर्म के साथ अपनी पहचान नहीं जोड़ता.” और पीएम मोदी धर्मनिरपेक्ष राज्य भारत की पहचान सिर्फ़ एक धर्म से जोड़ रहे हैं इसके बावजूद वो कह रहे हैं कि “संविधान सपने पूरे कर रहा है.” यह कैसा सपना है जो न संविधान की मूल भावना से मेल खा रहा है और न ही संविधान निर्माताओं की सोच से? पीएम मोदी जिस तरह व्यवहार कर रहे हैं उससे लगता है उन्होंने संविधान की ‘प्रस्तावना’ पर कभी गौर नहीं किया है.

संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ हैं न कि हम भारत के बहुसंख्यक लोग हैं! पीएम को भारत के लोगों का नेतृत्त्व करने वाला होना चाहिए भारत के हिंदुओं का नहीं लेकिन पीएम अपने को सबसे बड़ा हिंदू दिखाने में लगे हैं यह देश के लिए अच्छा नहीं है.

आज की युवा पीढ़ी को और उनको, जिन्होंने आज़ाद देश की मलाई तो खाई है लेकिन धर्मान्धता को हार की तरह गले में डाले घूमते रहते हैं, उन्हें शहीदे-आज़म भगत सिंह के विचारों को पढ़ना चाहिए. भगत सिंह का मानना था कि “धर्म इंसान का निजी मामला है जिसमें किसी को दख़ल देने का अधिकार नहीं है. इसमें राजनीति को नहीं घुसाना चाहिए क्योंकि यह सबको मिलकर काम नहीं करने देता..” भगतसिंह जो कह रहे हैं वो उनकी मौत के 19 सालों बाद तैयार हुए भारत के संविधान में इसकी मूल भावना के रूप में समाहित किया गया. भगत सिंह कहते हैं कि “..यदि धर्म को राजनीति से अलग कर दिया जाय तो हम सब राजनीति में इकट्ठे हो सकते हैं.” जो भगत सिंह की सोच थी वही सोच संविधान निर्माताओं की भी थी.उसी सोच से भारत दशकों तक चलता रहा लेकिन आज का भारत जिन लोगों के हाथ में है वो धर्म का इस्तेमाल करके राजनीति कर रहे हैं और नागरिक के तौर पर हम सभी उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं पा रहे हैं. यह सिर्फ़ संविधान का ही उल्लंघन नहीं है यह समूचे स्वतंत्रता आंदोलन के साथ धोखा है छल है.
संसद की सीढ़ियों पर सर झुकाने को लेकर पीएम मोदी अपनी पीठ थपथपाने में क्यों लगे हैं? वो क्यों नहीं बताते कि उसी संसद में वे चुपचाप बैठे रहते हैं कुछ नहीं बोलते जब एक जनप्रतिनिधि को उनके दल का एक सांसद सिर्फ़ इसलिए गालियाँ देता है क्योंकि वह जनप्रतिनिधि एक मुस्लिम हैं. फिर भी वे कहते हैं कि संविधानअपना काम कर रहा है? क्या वे सोच भी पाते हैं कि जब एक मुस्लिम सांसद को संसद में गालियाँ दी जा सकती हैं तब सामान्य मुस्लिमों के साथ संसद के बाहर देश के अन्य क्षेत्रों में क्या क्या सलूक हो रहा होगा? संसद सत्ता का आश्रयस्थल नहीं है जहाँ जो चाहें मनमानी कर ली जाय. वास्तव में संसद भारत के प्रतिनिधित्व का मंच है.अगर पीएम मोदी को लग रहा है कि संविधान सपने पूरे कर रहा है तो उन्हें इसका जवाब देना चाहिए कि यूपी में उनकी डबल इंजन की सरकार मॉब लिंचिंग के दोषियों को बचाने में क्यों लगी हुई है? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मरने वाला अख़लाक़ था और मारने वाले हिंदू?
भारत के संविधान को लोकतंत्र के ढांचे में तैयार किया गया है और लोकतंत्र की बुनियाद होती है ‘असहमति’. जिस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में असहमति के ढांचे को कुचला जा रहा हो वो यह दावा तो बिल्कुल नहीं कर सकता कि भारत का संविधान सपने पूरा कर रहा है. जिस तरह पिछले 11 सालों के दौरान मोदी के नेतृत्व वाले केंद्र ने ग़ैर-बीजेपी सरकारों के अधिकारों का हनन किया है, उन्हें फंड्स के लिए परेशान किया है, राज्यपालों के माध्यम से विधानसभाओं को बौना बनाने की कोशिश की है, टारगेट करके विपक्ष के नेताओं को ज़लील और परेशान किया गया, यहाँ तक कि मुख्यमंत्रियों को भी जेल भेजा गया और सत्ता के साथ ‘सहमति’ दिखाने वालों को मलाई बाँटी गई उन्हें प्रोत्साहन दिया गया. 
इन सब के बाद उनके मुख से यह कहा जाना फिर से एक भ्रम पैदा करने की दुस्साहसिक कोशिश है कि संविधान सपने पूरे कर रहा है. मोदी सरकार ने अपनी उल्टी पुल्टी नीतियों से संविधान को सिर्फ़ कमजोर किया है. यहाँ तक कि 2024 के आम चुनावों से पहले 400 पार के नारे के साथ कई भाजपा के नेताओं ने अपने चुनावी भाषणों में यह जोड़ा कि अगर 400 से अधिक सीटें आयें तो संविधान बदल दिया जाएगा. अगर यह संविधान पवित्र है और सपने पूरा कर रहा है तो इसे क्यों बदलना चाहते थे? कितना अंतर है न दोनों बातों में? ये कैसी मिलावट वाली सोच है?
संविधान निर्माताओं ने जिन संस्थाओं- निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट-के माध्यम से संविधान को सुरक्षा प्रदान की थी पिछले 11 सालों मेंउनकी गरिमा को तार-तार कर दिया गया है जिससे संविधान स्वतः ही कमजोर होकर धराशाई हो जाय. पिछले 11 सालों से सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसले कर रहा हैउनका झुकाव केंद्र सरकार की तरफ़ लगातार बना हुआ है. अगर कोई फ़ैसला (इलेक्टोरल बांड्स का मामला) विरोध में किया भी गया तो उस पर कभी कोई अमल नहीं किया गया, कई मामलों (महाराष्ट्र में शिवसेना पार्टी का मामला) को तो सालों के लिए टाल दिया गया जिससे मोदी सरकार को कोई परेशानी न हो. 
केंद्रीय निर्वाचन आयोग आज़ादी के बाद से अपनी विश्वसनीयता के मामले में सबसे नीचे स्तर पर है. निर्वाचन आयोग केंद्र के एजेंट के रूप में काम करता दिख रहा है. जिस तरह से विपक्ष के नेता-राहुल गांधी के वोट चोरी पर सवालों को टाला गया, उन्हें अनदेखा किया गया और असभ्यअनावश्यक भाषा का इस्तेमाल किया गया, यह स्पष्ट हो चुका है कि यह देश ‘निष्पक्ष चुनाव प्रणाली’ से कोसों दूर आ चुका है.
जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में सरकार के कहने से जजों की नियुक्ति की जा रही है, कॉलेजियम पर दबाव बनाया जा रहा है और अभी से यह प्लान किया जा रहा है कि भावी मुख्य न्यायधीश (CJI) कौन बने जिससे एक खास विचारधारा को ही फ़ायदा हो, टारगेट करके कुछ जजों को सुप्रीम कोर्ट में पहुँचने से ही रोका जा रहा है, न्यायपालिका को धर्मोत्थान का केंद्र (जस्टिस शेखर यादव का मामला) बनाया जा रहा है उससे यह साफ़ साफ़ दिखाई पड़ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट बहुत दिनों तक संविधान के अभिरक्षक की भूमिका को नहीं निभा पाएगा.

भारत एक ऐसे संकट के दौर से गुज़र रहा है जिसकी चिंता सभी भारतीय नागरिकों को होनी चाहिए. पिछले 11 सालों से देश में नेतृत्व का संकट बना हुआ है, प्रधानमंत्री की कुर्सी ख़ाली पड़ी है, जिसे प्रधानमंत्री कहा जा रहा है वो सिर्फ़ संस्थाओं को मैनेज करने, चुनाव लड़ने और भाषण देने में व्यस्त हैं. आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, विधि आयोग, संसदीय समितियां आदि संस्थाओं का इस तरह से ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है कि किसी ने कभी सोचा ही नहीं था और परिणामस्वरूप लोगों का वर्तमान व्यवस्था से भरोसा उठ रहा है. विश्वसनीयता नष्ट की जा रही है. मुझे पूरा विश्वास है कि जानबूझकर इस भरोसे को कम/ख़त्म किया जा रहा है जिससे एक ‘ऑल्टरनेटिव’ व्यवस्था की माँग उठे और इसी माँग की आड़ में भारत के संविधान को बदल दिया जाय. 
वह संविधान जिसने हजारों साल पुरानी अस्पृश्यता को समाप्त किया, लैंगिक, जातीय और क्षेत्रीय भेदभाव को समाप्त किया, जिसने 75 सालों से लगातार एक अत्यधिक विविध देश को एकता के सूत्र में बाँधे रखा और तमाम चुनौतियों का सामना किया, लोगों की जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश की, शोषण को रोकाऔर बराबरी को बढ़ावा दिया, वो आज खतरे में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और नीतियों की वजह से नेहरू, आंबेडकर और गांधी के देश को आज ‘त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र’, ‘चुनावी निरंकुशता’ और ‘आंशिक रूप से आज़ाद’ जैसे अपमानजनक विशेषण मिल रहे हैं. इसके बावजूद पीएम मोदी कह रहे हैं कि संविधान सपने पूरे कर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय संगठन कह रहे हैं कि भारत के आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं. अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष(IMF) ने भारत द्वारा प्रदान किए जाने वाले आंकड़ों को विश्वसनीय नहीं माना है. IMF का कहना है कि भारत द्वारा दिए गए GDP और GVA के आंकड़े संदिग्ध हैं और इसलिए भारत के आंकड़ों के स्तर को C ग्रेड प्रदान किया है. यह सिद्ध करता है कि तथाकथित ‘विकसित भारत’ का सपना भी झूठे आंकड़ों पर स्थापित किया जाना है. झूठ के इर्द-गिर्द तैयार किए जा रहे 21वीं सदी के भारत को किस आधार पर ‘विश्व गुरु’ बनाया जाना है, यह बात मोदी जी को बतानी चाहिए. झूठे आंकड़े जारी करना, आंकड़ों को चुनाव के बाद जारी किया जाना, यह सब कुछ सिर्फ़ सत्ता में बने रहने के तौर-तरीके हैं जिन्हें संविधान को माथे से लगाने और संसद की सीढ़ियों पर माथा टेकने की फ़ोटोजेनिक घटनाओं के माध्यम से छिपाया जा रहा है.
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संविधान के अत्यधिक दुरुपयोग ने बीजेपी, आरएसएस और कुछ उद्योगपतियों के सपने तो पूरे किए हैं लेकिन आम भारतीय की हालात आज बहुत ही ख़राब है. महंगी शिक्षा, महंगे लोन, महंगी ब्याज दरें, महंगा स्वास्थ्य, महंगी सब्जियां, महंगी बिजली, घटता जल स्तर, प्रदूषित पेयजल, बदहाल होती हवा और इस प्रदूषण से जूझते/मरते लोग, बदहाल किसान, असुरक्षित मजदूर, असुरक्षित महिलाएं और अल्पसंख्यक यही वो दृश्य है जो आम लोगों के लिए है और निश्चित रूप से यह वो तो नहीं जिसे ‘सपने पूरा होना’ कहा जाय. प्रधानमंत्री झूठ कह रहे हैं और लोगों को यह समझना होगा. मोदी भारत के लिए थोपे हुए नेतृत्व की तरह हैं जिन्हें मीडिया और झूठे प्रचार ने लोगों के सामने बिठा दिया है. सामान्य मीडिया, निष्पक्ष चुनावों और सशक्त न्यायपालिका का दौर होता तो नरेंद्र मोदी कभी इस देश का नेचुरल सिलेक्शन नहीं होते.