1963 की बात है, संयुक्त राज्य अमेरिका के अलबामा राज्य के एक शहर बर्मिंघम में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध ‘अश्वेत’ अमेरिकी नागरिकों का एक आंदोलन चल रहा था। यहाँ से लगभग ढाई घंटे की दूरी पर अटलांटा में मार्टिन लूथर किंग जूनियर रहते थे। किंग एक बैप्टिस्ट पादरी और ‘अश्वेत’ नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे। वो महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। अलबामा के अश्वेत प्रदर्शनकारियों ने किंग को प्रदर्शन में आमंत्रित किया और किंग वहाँ पहुँच गए। इस बात से कुछ ‘श्वेत’ पादरी काफ़ी नाराज हुए और 8 श्वेत पादरियों ने मिलकर ‘ए कॉल फॉर यूनिटी’ नाम का एक संयुक्त और सार्वजनिक बयान अख़बार में प्रकाशित करवाया जिसमें किंग और उनके आंदोलन की आलोचना की गई थी। पादरियों ने आंदोलन की ‘टाइमिंग’ पर सवाल उठाया और आंदोलन को ‘बाहरी लोगों के समर्थन’ इत्यादि कहकर उसकी मांगों को हल्का करने की कोशिश की। पादरियों ने पुलिस के तथाकथित ‘धैर्य’ की भी प्रशंसा की थी। किंग को 12 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया, इसके बाद 16 अप्रैल 1963 को उन्होंने पादरियों के बयान का जो जवाब दिया वह न सिर्फ़ ऐतिहासिक है बल्कि इन दिनों भारत में जो चल रहा है उसकी ज़रूरी व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।
किंग ने कहा कि “कहीं भी होने वाला अन्याय, हर जगह न्याय के लिए ख़तरा है” इसलिए मैं यहाँ आया हूँ जिससे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ सकूँ। उनका कहना था कि चूँकि मेरे राज्य में सबकुछ ठीक है, मेरे लिए सबकुछ ठीक है इसका मतलब यह नहीं कि जहाँ अन्याय हो रहा है वहाँ मैं ना जाऊँ और वहाँ के लोगों के लिए ना लड़ूँ। इसलिए वो कहते हैं कि अन्याय के ख़िलाफ़ प्रदर्शन ज़रूरी है। किंग ने अपने पत्र में जवाब दिया कि जो सरकार अन्याय पर बात नहीं करती, और बचती है; उसे झुकाने के लिए, उसे बातचीत की टेबल पर लाने के लिए प्रदर्शनकारियों को प्रदर्शन करना पड़ता है। वो लिखते हैं “अहिंसक और प्रत्यक्ष कार्रवाई ऐसी परिस्थिति पैदा करती है कि जो लोग लगातार बातचीत से बच रहे हैं, उन्हें समस्या को सुनने के लिए मजबूर होना पड़े।”

मार्टिन लूथर किंग की नज़र में क़ानून दो तरह के

किंग अपने पत्र में लिखते हैं कि कानून दो क़िस्म के होते हैं, न्यायपूर्ण कानून और अन्याय पूर्ण कानून। “अन्यायपूर्ण कानून वह मानवीय कानून है जो… प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित नहीं है”। उनका तर्क है कि सिर्फ़ कानून का अस्तित्व ही उसकी नैतिक वैधता साबित नहीं करता। किसी कानून का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह लोगों की गरिमा और समानता का सम्मान करता है या नहीं। अपने गांधीवादी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए किंग ने लिखा कि “जो व्यक्ति किसी अन्यायपूर्ण कानून को तोड़ता है, उसे ऐसा खुले तौर पर, प्रेम और अहिंसा की भावना से तथा कानूनी दंड स्वीकार करने की तत्परता के साथ करना चाहिए।” उनका मानना था कि न्याय, समानता और मौलिक अधिकारों के प्रश्नों पर क़ानून की आलोचना करना भी लोकतांत्रिक जीवन का हिस्सा है।
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भारत में इन दिनों भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता के इस्तीफे की माँग को लेकर विपक्ष, युवा, वकील, कलाकार, लेखक, पूर्व अधिकारी और नागरिक समाज के असंख्य लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वैसे तो प्रदर्शन पूरे देश में कई स्तरों पर हो रहा है लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली इसका केंद्र बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भी नगरिकोन्मुखी क़दम नहीं उठाया है जिससे यह प्रदर्शन रुक सके या इसको लेकर कोई सकारात्मक बातचीत शुरू हो सके। गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में दिल्ली पुलिस अपनी तमाम मर्यादाओं को तोड़ती हुई लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रही है।

तिरंगा फहराने वालों की गिरफ़्तारी  

असहमति, विरोध और अहिंसक प्रदर्शनों को लेकर मोदी सरकार का डर इस क़दर बढ़ चुका है कि घर घर तिरंगा और हर घर तिरंगा जैसे अभियान चलाने वाली सरकार अब प्रदर्शनकारियों को तिरंगा फहराने को लेकर गिरफ्तार कर रही है। 12 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय गृहमंत्रालय की अनुशंसा पर दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध-प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया था। सरकार के इस निर्णय के विरोध में 12 अक्टूबर को ही CJP के दो प्रमुख नेताओं ने जंतर-मंतर जाकर तिरंगा फहरा दिया। उसके बाद पुलिस ने न सिर्फ़ इन्हें गिरफ्तार किया बल्कि 5 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। सरकार के ऐसे अड़ियल रवैये का विरोध करने के लिए 16 अक्टूबर को हजारों लोगों ने तिरंगा फहराने का प्रयास किया और फहराया भी। इस दौरान पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया और उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया।

आप ने शुक्रवार दोपहर को तिरंगा यात्रा निकाली

आज जो बात पूरे देश को समझनी चाहिए वो ये है कि अब ये ज़रूरी नहीं कि प्रदर्शनकारियों की माँग क्या है, सरकार उसे पूरा करेगी या नहीं! अहम यह है कि आज भारत में पहली बार यह महसूस हो रहा है कि भारतीयों के नागरिक अधिकार और मूल अधिकार अपने सार्वकालिक संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। 

भारत में ऐसी सरकार को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है जो शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की इजाजत ही न दे, जो लोगों को सड़क पर उतरने ही न दे, विरोध में नारे न लगाने दे और सरकार की आलोचना न करने दे।

ज्ञानेश कुमार ने जो किया है उसके लिए विरोध-प्रदर्शन चलता रहेगा लेकिन यह बात भी उतनी ही अहम है कि अमित शाह के नेतृत्व में दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ कितनी बर्बरता से पेश आ रही है, इस देश की युवा लड़कियों को थानों के बेसमेंट में ले जाकर पीटा जा रहा है, उनके साथ अमर्यादित और अभद्र, हिंसक व्यवहार करके उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जा रहा है, आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है, क्या पुलिस अचानक से ऐसी हो गयी है? क्या पुलिस बेहद बर्बर हो चुकी है? शायद हाँ भी, शायद नहीं भी?

प्रोटेस्टरों पर बर्रबरता कौन कर रहा?

पर मुझे नहीं लगता कि भारत की पुलिस इतनी बर्बर है, मुझे नहीं लगता कि भारत का संविधान इतना कमजोर है, मुझे नहीं लगता कि सर्वोच्च न्यायालय को जो शक्तियाँ मिली हैं वो लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए अपर्याप्त हैं। असल में यह सरकार ही बर्बर है जो पुलिस वालों को युवा प्रदर्शनकारियों को पीटने और उनके साथ निर्दयी व्यवहार करने के लिए कह रही है, यह सरकार ही है जो पुलिस वालों को इनसिग्निया और नेमप्लेट लगाने को रोक रही है, यह सरकार ही है जो सादी वर्दी में गुंडों को पुलिस के बीच भेजने को प्रोत्साहित कर रही है, अपने देश के युवाओं पर प्रहार करने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों का इस्तेमाल कर रही है। यह भारत के मुख्य न्यायाधीश की गलती है कि बार बार पुलिस के अत्याचार देखने के बाद भी वो चुप्पी साधकर बैठे रहते हैं। केंद्र सरकार का गृह सचिव, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करता है और कोर्ट कुछ कहता ही नहीं? आखिर क्यों? लोग न्यायालय पर आज भी भरोसा करते हैं और इस भरोसे को झकझोरा जा रहा है।

सरकार का आदेश ना मानना देशद्रोह नहीं

सरकार का आदेश ना मानना देशद्रोह नहीं है, हाँ यह ग़ैर-कानूनी हो सकता है। जैसा कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा कि अगर कोई कानून अन्यायपूर्ण है तो उसका विरोध किया ही जाना चाहिए यही बात गांधी भी बोलते रहे। आज सरकार ने जंतर-मंतर को डिनोटिफाई किया है कल अगर संसद को कर दे तो क्या होगा? सरकार हो या सर्वोच्च न्यायालय किसी के पास यह अधिकार नहीं कि वो भारत के लोगों को यह बताए कि कब और कैसे प्रदर्शन करना है। भारत के नागरिक जानते हैं कि उन्हें इसरो या कलपक्कम परमाणु संयंत्र के अंदर घुसकर प्रदर्शन नहीं करना है। भारत के लोग जानते हैं कि भारत की संसद और सर्वोच्च न्यायालय के अंदर घुसकर प्रदर्शन नहीं करना है। लेकिन अगर सीजेआई और सरकार ऐसा सोचते हैं कि सुप्रीम कोर्ट मार्च और संसद मार्च अवैध है तो उन्हें दोबारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़ लेनी चाहिए। प्रत्यक्ष, मज़बूत और ज़रूरी रूप से अहिंसक विरोध और प्रदर्शन भारत के नागरिकों का ना सिर्फ़ हक है, बल्कि यही भारत की लोकतांत्रिक नींव है जिसकी रक्षा करना सुप्रीम कोर्ट के लिए ‘ऑप्शनल’ नहीं बल्कि बाध्यकारी है।

प्रदर्शन कैसे होगा, उसे रास्ता कैसे दिया जाएगा, उसमें असामाजिक तत्व ना आने पायें यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पुलिस ले और सरकार ले, लेकिन नागरिकों को प्रदर्शन के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

किंग अपने पत्र में इस तर्क का विरोध करते हैं कि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को इसलिए रोक देना चाहिए क्योंकि उससे हिंसा भड़क सकती है। वो कहते हैं कि “क्या यह उस व्यक्ति को दोषी ठहराने जैसा नहीं है जिसे इसलिए लूटा गया क्योंकि उसके पास पैसा था?” वो एक और ज़रूरी सवाल उठाते हैं जिससे सहमति या असहमति हो सकती है। “सवाल यह नहीं है कि हम चरमपंथी होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि हम किस तरह के चरमपंथी होंगे।” मतलब कोई न्याय, सत्य और अहिंसा के लिए चरमपंथी बन गया है और कोई धार्मिक/जातीय नफ़रत और हिंसा को लेकर चरमपंथी बन चुका है। कोई व्यक्ति सरकार के एक भी अन्याय और झूठ को बर्दाश्त नहीं कर रहा है, वह संस्थाओं के दुरुपयोग और दमन को एक रत्ती भी स्वीकारने को तैयार नहीं है और वह इसके लिए पूरी तरह से अहिंसक प्रतिरोध कर रहा है, तो क्या ऐसा चरमपंथी किसी लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है? नहीं, बिलकुल नहीं।

‘आंदोलनजीवी’ कैसे कह सकते हैं?

सरकार को एक बात बहुत अच्छे से सुननी और समझनी चाहिए। प्रदर्शन चाहे किसी का भी हो, उसमें किसी अन्य का कोई मुद्दा हो या ना हो, कोई भी किसी के भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो सकता है, आप लोगों को ‘आंदोलनजीवी’ नहीं कह सकते। अगर किसी व्यक्ति या सिविल सोसाइटी संगठन ने अपना उद्देश्य ही प्रदर्शन बना लिया है तो उसकी आलोचना नहीं, बल्कि पूजा होनी चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। मोदी सरकार को होने वाली असुविधा के लिए भारत के लोकतंत्र का अंतिम संस्कार नहीं किया जा सकता। यदि अधिक असुविधा हो तो पीएम मोदी अपना पद त्यागकर आराम से घर बैठ सकते हैं।
भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग ने अनैतिक काम किया है, देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बिखेरने की कोशिश की है उनका बचाव नहीं किया जा सकता है। उन पर अब कोई भरोसा नहीं करता। जिसपर 65% जनता भरोसा नहीं करती वह अब भारत के चुनावों का संचालन के लिये योग्य व्यक्ति नहीं हैं। किंग ने अपने इसी पत्र में लिखा था कि “अनैतिक उद्देश्यों को बनाए रखने के लिए नैतिक तरीकों का इस्तेमाल करना भी उतना ही गलत है, शायद उससे भी अधिक।” इसलिए न्यायालय, पुलिस, संविधान और संसद का ‘इस्तेमाल’ करके यदि ज्ञानेश कुमार को बचाया जाता है तो यह अनैतिक होगा।
विमर्श से और
अलबामा के प्रदर्शन के दौरान पुलिस के रवैये की उन 8 पादरियों ने काफ़ी सराहना की थी। लेकिन किंग इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं थे। आज भी तमाम बिके हुए मीडिया चैनल और अख़बार पुलिस का पक्ष लेकर घूम रहे हैं। किंग के समय अलबामा में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से न सिर्फ़ दुर्व्यवहार किया, जेल में अमानवीय कृत्य किये बल्कि प्रदर्शन के दौरान उनपर कुत्ते भी छोड़े गए जिससे तमाम अश्वेत लोग घायल हो गए थे। किंग ने इसलिए कड़े शब्दों में कहा था कि ‘मैं पुलिस की प्रशंसा में शामिल नहीं हो सकता”।

प्रोटेस्टरों के साथ क्या-क्या हुआ?

आज भारत में भी कमोबेश यही स्थिति है। निश्चित ही पुलिस को भी धक्का-मुक्की में कुछ चोटें आई होगी लेकिन किसी भीड़ ने उनपर जानबूझकर दौड़ा-दौड़ाकर पीटने जैसा कोई काम नहीं किया, हाँ, इस तरह का काम पुलिस ने ज़रूर किया। महिलाओं के साथ पुरुष पुलिसवालों ने बदसलूकी की, महिला पुलिस ने भारत की युवा लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स पर लातें मारीं, उन्हें ऐसी जगह ले जाकर पीटा गया जहाँ सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। यह सब उन लड़कियों ने बयान किये जिन्हें निर्ममता से पीटा गया। भगवा रंग से सने कपड़ों को पहनकर घूम रहे हिंदुत्व के गुंडों को पुलिस ने समर्थन दिया या ये कहें कि उनके द्वारा आम छात्र और छात्राओं की पिटाई पर पुलिस ख़ामोश रही जैसे ‘ऊपर से कोई आदेश’ आया हो।

तीन महीने चली थी पैलेट गन  

दिल्ली पुलिस पिछले कुछ महीनों से आम भारतीय युवाओं के साथ लगातार आतंकवादियों जैसा व्यवहार कर रही है। अभी जुलाई में हुए संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन चलाई। कई युवा घायल हुए, कई की आँखें चली गईं। भारत के पूर्व गृह सचिव जी.के. पिल्लई ने कहा कि “मेरी जानकारी के अनुसार, 2010-11 में कश्मीर, विशेषकर श्रीनगर में, पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया था। इससे अनुमान से कहीं अधिक गंभीर नुकसान हुआ था। इसके बाद गृह मंत्रालय में इसकी समीक्षा की गई और यह महसूस किया गया कि पैलेट गन के इस्तेमाल से बचना चाहिए। विभिन्न समितियों ने पैलेट गन के विकल्प के रूप में दूसरे हथियारों के इस्तेमाल की सिफारिश की थी और उन सिफारिशों को आगे बढ़ाया गया था… इसलिए मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पैलेट गन का फिर से इस्तेमाल किया जा रहा था, जबकि उनका इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए था”।

जरा सोचकर देखिए भारत में कौन लोग हैं जो गृहमंत्रालय संभालकर बैठे हैं, कैसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री है जो भारत के युवाओं पर पैलेट गन चलाने की इजाज़त दे देता है। जो पैलेट गन 2010-11 के बाद श्रीनगर जैसे अस्थिर क्षेत्र में नहीं चली उसे देश की राजधानी में भारत के युवाओं पर चला दिया गया। क्यों चलाया गया? इसलिए कि वो एक भ्रष्ट, अकर्मण्य और अक्षम मंत्री का इस्तीफ़ा माँग रहे थे?

क्या भारत के प्रधानमंत्री भारत के नागरिकों द्वारा किए जा रहे प्रतिरोध को लेकर प्रतिशोध लेना चाहते हैं? क्या उनकी शब्दावली में सरकार का विरोध, सत्ताधारी दल का विरोध देशद्रोह के बराबर है? क्या उन्हें लगता है कि आँख-मूँदकर उनके फैसलों पर हाँ में हाँ मिलाई जाये? क्या वो सोचते हैं कि भारत का विकास और उत्थान उनकी ‘निर्विवाद आज्ञाकारिता’ से ही संभव है? क्या नरेंद्र मोदी, सरकार और सिविल सोसाइटी के भेद को समाप्त करना चाहते हैं? या वो अपने मन की सिविल सोसाइटी को तैयार करना चाहते हैं या फिर वो ‘आंदोलनजीवी’ कहकर सिविल सोसाइटी को ही समाप्त कर देना चाहते हैं?

2047 के विकसित भारत का कैसा सपना!

ऊपर से आदेश आयेंगे और नीचे जनता स्वीकार कर ले, हर भ्रष्टाचार को 2047 के विकसित भारत के सपने की वजह से ‘एडजस्ट’ कर लिया जाए, बलात्कार के आरोपी को राज्यपाल बनाया जाये और उसे भी आँख बंद करके मोदी जी का आशीर्वाद समझ लिया जाये, पेपर लीक हों, पैलेट गन चलें, नौकरियाँ ना मिलें, महंगाई बढ़ती रहे, देश के संसाधन दो लोगों की मुट्ठी में जाते रहें, संवैधानिक संस्थाओं में कठपुलियों को बिठाया जाये, मनचाहे फैसले किए जाएँ और नागरिकों को उनके मौलिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जाये, इसके बाद भी लोग आवाज़ ना उठायें, सड़कों पर न उतरें, संसद और सुप्रीम कोर्ट मार्च न करें, अपने देश को बचाने के लिए आगे ना बढ़ें, नारे ना लगाएँ, शोर ना मचायें, सवाल ना पूछें तो आप मतिभ्रम का शिकार हो चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मैं आपसे पूछ रही हूँ कि आपको क्या लगता है, क्या आप सोमालिया के प्रधानमंत्री हैं? क्योंकि भारत के लोगों ने भांग का नशा नहीं किया है, यह देश जागरूक है, अपने देश की संस्थाओं और प्रतिनिधियों और लोकतांत्रिक विरासत से प्यार करता है। गलतियों को माफ़ भी करता है लेकिन अगर आपको लगता है कि अनंत काल तक भारत को चुनावी निरंकुशता में रखेंगे और दोषपूर्ण लोकतंत्र बनाये रखेंगे तो आप गलतफहमी में हैं। मैं तो कहती हूँ एक बार फिर से सोचिए, थोड़ा विचार कीजिये क्योंकि आप भारत को अभी तक पहचान नहीं पाये हैं।