पीएम मोदी और उनकी एक्स पर प्रोफाइल फोटो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए क्योंकि वो भारत और भारतवासियों के हितों से समझौता कर रहे हैं। समझौता करने के इस रवैये का विस्तार राष्ट्रीय और घरेलू मसलों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों और भारत के दुश्मन देशों तक पहुँच गया है और पीएम मोदी रुक नहीं रहे हैं।
22 अप्रैल 2025 को बैसरन घाटी, पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले में 26 भारतीय नागरिकों की पाकिस्तानी आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इसमें कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार उन भारतीय नागरिकों की, जो बैसरन घाटी में घूमने के लिए गए थे, उनकी सुरक्षा करने में नाकाम रही। लेकिन घटना घटने के बाद, 7 मई से भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया और पाकिस्तान को बहुत अंदर तक नुकसान पहुंचाया। सेना ने बताया कि पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकाने तबाह किए गए। 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया। पाकिस्तान ने भी जवाबी गोलाबारी की जिसकी वजह से पुंछ जिले में 15 नागरिकों की मौत हो गई। इसका मतलब यह हुआ कि भारत के 40 से अधिक नागरिक मारे जा चुके थे और भारतीय सेना कड़ा रूख अख्तियार कर चुकी थी। यह अच्छा मौक़ा था पाकिस्तान के ज्यादातर आतंकी ठिकानों को नष्ट करने का। लेकिन अचानक 10 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के माध्यम से बताया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवा दिया है।
भारत की संप्रभुता पर प्रहार
यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ था कि किसी विदेशी ताक़त ने भारत की संप्रभुता पर प्रहार किया हो। जो सूचना भारत सरकार और भारतीय सेना की तरफ़ से आनी चाहिए थी वह सूचना एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष दे रहा था। ट्रम्प ने यह दावा भी किया कि उन्होंने युद्ध बंद करने की धमकी दी थी और कहा था कि वो 200% टैरिफ़ लगाएंगे और इसलिए दोनों देशों ने डरकर युद्ध बंद कर दिया। यह भारत के प्रधानमंत्री द्वारा भारत की संप्रभुता से किया गया एक समझौता है। पीएम मोदी कभी भी खुलकर नहीं बोले कि ट्रम्प ग़लत कह रहे हैं, ट्रम्प झूठ बोल रहे हैं। आज तक यह पता नहीं चला कि पीएम मोदी ने भारत के हितों से समझौता क्यों किया?
और यह मामला कोई इकलौता मामला भी नहीं है जहाँ उन्होंने देश के हितों से समझौता किया हो। लम्बी लिस्ट है…
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए चीन को छूट!
मोदी सरकार ने 2 मई 2026 को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित नियमों में ढील दी गई है। यह ढील सामान्य नहीं है क्योंकि इसमें डोकलाम विवाद के बाद से, 6 साल से चली आ रही नीति को चीन के पक्ष में बदल दिया गया है। सरकार ने चीनी कंपनियों को छूट देते हुए कहा है कि जिन कंपनियों में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 10% तक है वो कम्पनियाँ भारत में ‘ऑटोमैटिक रूट’ से FDI के लिए पात्र होंगी। यह एक बार फिर वही क़दम है जिसे मैं कह रही हूँ कि पीएम मोदी ने भारत के हितों से समझौता किया है। आजकल पीएम मोदी अपने ‘एक्स’ की प्रोफाइल फोटो में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की तस्वीर लगाए हुए हैं। मोदी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें याद है कि ऑपरेशन सिंदूर क्यों चलाया गया और देश ने आतंकियों के ख़िलाफ़ क्या कार्यवाही की। मुझे लगता है कि यह सब दिखावा है। यह सबको पता था कि चीन, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की मदद कर रहा था। मतलब, चीन भारत के ख़िलाफ़ अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ने में लगा हुआ था। जुलाई 2025 में भारतीय सेना ने भी कहा कि पाकिस्तान की 80% से अधिक मिलिट्री हार्डवेयर चीनी मूल का है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन दे रहा था पाक को मदद
भारतीय सैन्य अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि चीन अपनी सैन्य तकनीकों के परीक्षण के लिए पाकिस्तान को "लाइव लैब" के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। 8 मई को यह आरोप अब आधिकारिक रूप से सत्य साबित हो चुके हैं। चीन के सरकारी टीवी नेटवर्क CCTV को दिए गए एक इंटरव्यू में Aviation Industry Corporation of China (AVIC) के इंजीनियरों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान वायुसेना को ऑन-साइट ऑपरेशनल और तकनीकी सहायता दी। यह बीजिंग की ओर से पहली आधिकारिक सार्वजनिक पुष्टि है कि भारत के साथ सक्रिय संघर्ष के दौरान चीनी इंजीनियर पाकिस्तान में तैनात थे।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन भारत के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहा था, चीन डोकलाम में भी भारत को धोखा दे चुका है, इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने चीनी कंपनियों को FDI में ‘ऑटोमैटिक रूट’ से राहत प्रदान की, यह भारत के हितों के साथ समझौता नहीं तो और क्या है?
रूसी तेल नहीं खरीदने दिया!
नरेंद्र मोदी अपनी नाकामियों को देश से छिपाना चाहते हैं लेकिन वो बार बार खुलकर सामने आ जाती है। प्रेसिडेंट ट्रम्प लगातार कहते रहे कि उन्होंने न सिर्फ़ युद्ध रुकवाया बल्कि रूस से क्रूड ऑयल ख़रीदने से मना भी किया। ट्रम्प के अनुसार, मोदी सरकार ने उनकी आज्ञा मानी। मोदी जी ने कभी खुलकर ट्रम्प की मुख़ालफ़त नहीं की लेकिन हाल में आरएसएस-भाजपा के अंतरराष्ट्रीय मामलों के रणनीतिकार और 'इंडिया फाउंडेशन' के प्रमुख और मोदी सरकार के अमेरिका समर्थक झुकाव का मजबूती से बचाव करने वाले ‘बड़े स्वयंसेवक’ राम माधव ने हडसन इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन डी.सी. के 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' में बोलते हुए 23 अप्रैल 2026 को बड़ी दीनता और हीनता से कहा कि “हमने ईरान से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई। विपक्ष की इतनी आलोचना के बावजूद हमने रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति दी। भारत ने बिना ज्यादा कुछ कहे 50% टैरिफ को स्वीकार किया। हमने अपना धैर्य बनाए रखा। अब ‘नई ट्रेड डील’ में हम 18% टैरिफ पर सहमत हुए हैं, जो कि पहले की तुलना में अधिक है। तो फिर भारत, अमेरिका के साथ मिलकर काम करने में कहां कमी छोड़ रहा है?”
मतलब, यह हुआ कि भारत अमेरिका की तरफ़ सिर्फ़ झुका नहीं बल्कि अमेरिका भारत की विदेश नीति चलाता हुआ दिख रहा है। यह कैसी संप्रभुता है जिसमें अमेरिका यह तय कर रहा है कि भारत किससे, क्या और कब ख़रीदे? भारत के संबंध अन्य देशों के साथ कैसे होंगे यह भी अमेरिका ही तय कर रहा है। भारत कभी इससे पहले इतना दयनीय नहीं दिखा सामने कोई भी सुपरपावर हो तो क्या। मोदी के करीबी राम माधव का इस तरह झुकना यह साबित करता है कि पीएम मोदी न सिर्फ़ भारत के हितों के साथ समझौता कर रहे हैं बल्कि किसी ऐसी चीज से भी भयभीत हैं जिसका इस्तेमाल करने की धमकी ट्रम्प कई बार मीडिया के सामने खुलकर दे चुके हैं जैसे- मैं चाहूँ तो मोदी का करियर तबाह कर सकता हूँ। मोदी का करियर रहे या बर्बाद हो भारत की संप्रभुता उसका ख़ामियाज़ा क्यों भुगते?
चुनाव आयोग की साख
इसी तरह लगातार चुनाव जीतने के लिए भारत की लोकतांत्रिक विरासत से समझौता किया जा रहा है। भारतीय चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय संवैधानिक संस्था अब भरोसे के लायक नहीं रही। आयोग निष्पक्ष चुनाव आयोजित करवाने में नाकाम रहा है। आयोग बीजेपी के एजेंट की तरह काम करता दिख रहा है जिससे इसके प्रति भरोसा लगातार खोता जा रहा है। यही कारण है कि जिस निर्वाचन आयोग को पवित्र माना जाता था उसके ख़िलाफ़ संसद में विपक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाया गया लेकिन स्पीकर ने बिना किसी कारण उसे रद्द कर दिया था। लेकिन विपक्ष इतना आहत है कि उसने दोबारा प्रस्ताव पेश करने की तैयारी कर ली है। हालत यह है कि जिस लोकसभा स्पीकर को अपेक्षाकृत निष्पक्ष माना जाता था वह भी संदेह के घेरे में है। उन पर न सिर्फ़ आरोप हैं बल्कि पूरे देश ने लाइव देखा कि किस तरह स्पीकर ओम बिरला नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने नहीं देते। जबकि निशिकांत दुबे जैसे सांसदों को खुलेआम पूर्व प्रधानमंत्रियों के ख़िलाफ़ अभद्र और अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने की इजाज़त दी जाती है। इसीलिए भरोसे के इस पद, स्पीकर के ख़िलाफ़ भी उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव संसद में लाया जा चुका है।
पीएम मोदी और लोकतंत्र
अंग्रेजों के ख़िलाफ़ स्वतंत्रता संघर्ष जीतने के बाद जो मूल्य भारतीय लोकतंत्र में संविधान सभा के माध्यम से समाहित किए गए थे उन्हें दरकिनार किया जा रहा है। जिस बहुदलीय प्रणाली को भारतीय लोकतंत्र की विशेषता समझी गई उसे ही नरेंद्र मोदी सरकार समाप्त करने में जुटी है। पीएम मोदी निर्लज्जता से ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत का नारा देते हैं और एक झटके में बिना शर्म के लोकतंत्र के ख़िलाफ़ जाकर खड़े हो जाते हैं। वो सरकारी मशीनरी के लगातार दुरुपयोग से चुनाव दर चुनाव जीतते जा रहे हैं, विरोधियों को जेल भेज रहे हैं और जो उन्हें या उनके दल को स्वीकार कर लेता है उसके ‘100 ख़ून भी माफ़’ कर दिए जाते हैं। ताज़ा उदाहरण बीजेपी के नए-नए मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी का है। शुभेंदु का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो खुलेआम कैमरा में रिश्वत लेते हुए दिखाई पड़े थे। पीएम मोदी को 2016 के चुनाव प्रचार के दौरान शुभेंदु को महाभ्रष्ट बताते हुए सुना जा सकता है। शुभेंदु पहले TMC में थे और आज बीजेपी में हैं। चूँकि बंगाल की सत्ता चाहिए थी इसलिए पीएम मोदी ने एक बार फिर ‘समझौता’ कर लिया। मोदी जी ने एक ‘बेईमान’ और ‘भ्रष्ट’ नेता के साथ समझौता किया और उसे बंगाल का मुख्यमंत्री बना दिया। मोदी के लिए आज शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के सबसे ईमानदार नेता बन चुके हैं।
पीएम मोदी और अडानी समूह
पीएम नरेंद्र मोदी ने भारत में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के माहौल के साथ समझौता किया है। उन्होंने भारत में स्वस्थ औद्योगिक प्रतियोगिता के माहौल को तबाह कर दिया है। आज भारत में हर कोई जानता है कि अगर किसी प्रतियोगिता में अडानी सामने होगा तो लाभ अडानी को ही मिलेगा। यही नहीं, पीएम मोदी ने यह भी तय किया है कि नियमों और विनियमों को इस तरह तोड़ा-मरोड़ा जाये जिससे लाभ गौतम अडानी को ही हो। यही कारण है कि 2014 में जिस गौतम अडानी का धन 48 हज़ार करोड़ रुपये था वो 2022 में 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। ऐसा नहीं था कि इसमें गौतम अडानी की कोई विशेष योग्यता थी। असल में उनपर पीएम मोदी की विशेष कृपा थी। और जिसके ऊपर भी यह कृपा हो जाये उसका ‘कुबेर’ बनना तय है। मोदी ने अडानी पर कैसे कृपा की, यह देखा जाना चाहिए…
हवाईअड्डों का निजीकरण
फ़रवरी 2019 में मोदी सरकार ने अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, मंगलुरु, तिरुवनंतपुरम और गुवाहाटी समेत 6 हवाईअड्डों के निजीकरण के लिए बोली आमंत्रित की। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अडानी ग्रुप ने सभी 6 एयरपोर्ट के ठेके हासिल कर लिए। अडानी एयरपोर्ट प्रबंधन में नए खिलाड़ी थे इसके बावजूद उन्हें यह कैसे मिल गया? यह इसलिए मिला क्योंकि पीएम मोदी ने अडानी पर विशेष कृपा बरसाने के लिए नियमों से समझौता किया और नए नियम बना डाले। मोदी सरकार ने एयरपोर्ट प्रबंधन में “पूर्व अनुभव” की अनिवार्यता तक हटा दी। एक झटके में अडानी देश के टॉप एयरपोर्ट्स के मालिक बन गए। जबकि पहले दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट के निजीकरण के दौरान, एकमात्र योग्य बोलीदाता होने के बावजूद GMR ग्रुप को दोनों परियोजनाएं एक साथ नहीं दी गई थीं। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि तब वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग ने अपने मूल्यांकन नोट में स्पष्ट सुझाव दिया था कि एक ही कंपनी को 2 से अधिक एयरपोर्ट नहीं दिए जाने चाहिए, लेकिन अडानी के मामले में इस सिफारिश को दरकिनार कर दिया गया। यहाँ तक कि आर्थिक कार्य विभाग और नीति आयोग की उन तकनीकी, वित्तीय और कानूनी आपत्तियों को भी प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अनदेखा कर दिया गया जिसमें अडानी को एकसाथ इतने एयरपोर्ट्स ना देने के बारे में कहा गया था। इन संस्थानों ने ‘एक ही कंपनी के एकाधिकार’ का विरोध किया लेकिन पीएम मोदी प्रतिस्पर्धा से समझौता कर चुके थे। CPI(M) सांसद एलामारम करीम ने 2020 में केंद्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि 6 एयरपोर्ट 50 वर्षों के लिए सौंपना ‘द एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया एक्ट-1994’ की भावना के खिलाफ है, क्योंकि यह कानून 30 वर्ष से अधिक की लीज की अनुमति नहीं देता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इस प्रक्रिया में असामान्य जल्दबाज़ी दिखाई। लेकिन जब पीएम मोदी तय कर चुके थे तो कुछ नहीं किया जा सकता था। असल में गौतम अडानी उनके ‘पर्सनल’ उद्योगपति बनकर उभरे हैं। और ऐसे में भारत में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जैसी संस्थाएँ अप्रासंगिक हो चुकी हैं।
पीएम मोदी के कारनामे प्रधानमंत्री के रूप में कैसे याद किए जाएँगे मैं भरोसे के साथ नहीं कह सकती। लेकिन यह जरूर कह सकती हूँ कि पीएम मोदी का कार्यकाल एक ऐसे पीएम का कार्यकाल है जिसने देश की संप्रभुता से कई बार समझौता किया और यहाँ कि संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं को पतन के मार्ग की ओर अग्रसर किया। पीएम मोदी ने जिस तरह बृजभूषणों और सेंगरों को लगातार प्रोटेक्शन दिया, जिस तरह देश के किसानों को महीनों सड़क पर बैठने को मजबूर किया और सबसे ज़रूरी बात, जिस तरह देश के लोकतांत्रिक स्वभाव को चोटिल किया है और मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य को महीनों तक जलने के लिए छोड़े रखा है यह साबित करता है कि उनमें नेतृत्व क्षमता नहीं है। साथ ही यह भी कि वो अपने फायदे के लिए समझौता करने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। नरेंद्र मोदी को अब प्रधानमंत्री के गरिमामयी पद को छोड़ने के बारे में विचार करना चाहिए क्योंकि भारत को एक सशक्त नेता चाहिए समझौतेबाज़ नेता नहीं।