नरेंद्र मोदी इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री के दायित्वों को ताक में रखकर भारत के धर्म-मंत्री की तरह व्यवहार कर रहे हैं। देश के लिए ज़रूरी मुद्दों पर ध्यान ना देकर वो अपना सारा ज़ोर धर्म और धार्मिक मुद्दों की ओर लगा रहे हों, जब पूरी दुनिया में भारत अलग-थलग पड़ रहा है, भारत की विदेश नीति आज़ादी के बाद अपने सबसे निचले दौर में है और जब 140 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि यानी भारत के प्रधानमंत्री को दबाव में डालकर फैसले करवाए जा रहे हैं, उस समय बजाय इसके कि पीएम देश और इसके भविष्य पर ध्यान लगाते वो सोमनाथ मंदिर पर अपना फोकस कर रहे हैं। जैसे इस समय देश में सोमनाथ मंदिर के अलावा कोई मुद्दा ही नहीं। पीएम मोदी ख़ुद पर मुग्ध होकर सोमनाथ यात्रा कर रहे हैं, बीजेपी के प्रवक्ता अख़बारों में सोमनाथ मंदिर पर लेख लिख रहे हैं, और देश के पहले प्रधानमंत्री और आज़ादी की लड़ाई में दस सालों तक ब्रिटिश यातनाएँ झेलने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू को इसलिए भला-बुरा कह रहे हैं क्योंकि उन्होंने सरकारी पैसे से मंदिर निर्माण की इजाज़त नहीं दी थी।
नेहरू शताब्दियों से अंग्रेज़ों के ग़ुलाम रहे भारत, जहाँ चारों ओर भुखमरी, निरक्षरता और बेतरतीबी थी उसको आधुनिक भारत में तब्दील करना चाहते थे, संवैधानिक राष्ट्र और कानून से चलने वाले देश के रूप में स्थापित करना चाहते थे। नेहरू को आज पीएम और उनके प्रवक्ता सिर्फ़ इसलिए भला-बुरा बोल रहे हैं क्योंकि नेहरू ने धर्म और मंदिरों से पहले इस देश के लोगों को तवज्जो दी, इस देश की ताक़त और वैश्विक क़द को बढ़ाने को तवज्जो दी, यहाँ संस्थाओं के निर्माण और इस देश की सुरक्षा को तवज्जो दी। पीएम मोदी और आरएसएस नेहरू को इसलिए अपमानित कर रहे हैं क्योंकि नेहरू ग़रीबी से जूझ रहे भारत के पैसे, मंदिरों के निर्माण के लिए देने से न सिर्फ़ मना किया बल्कि उन्होंने अपनी पूरी सरकार से कहा कि धार्मिक स्थलों के निर्माण और संचालन से उनका कोई मतलब नहीं होना चाहिए।
मध्यकाल की बर्बरता!
जबकि आज के पीएम मोदी ख़ुद को इसलिए बड़ा मान रहे हैं, महान मान रहे हैं क्योंकि वो एक धर्म-निरपेक्ष देश में खुलकर एक धर्म की वकालत कर रहे हैं, मंदिर निर्माण में भागीदार बन रहे हैं, और संभवतया सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल भी इस उद्देश्य के लिए कर रहे हैं। हर तरफ़ मध्यकालीन युग के भारत की तुलना आज के संवैधानिक भारत से करने की कोशिश की जा रही है। हर तरफ़ मध्यकालीन बर्बरता की चर्चा है जिससे एक धर्म विशेष के प्रति नफ़रत फैलाई जा सके। जबकि असलियत तो यह है कि बर्बरता और निरंकुशता तो मध्यकाल की विशेषता थी। और यह पूरे विश्व के हर समाज में लागू होती थी। मध्यकाल में दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहाँ बर्बरता और निरंकुशता ना देखने को मिले। भारत में तो मुग़ल काल फिर भी अपेक्षाकृत सहिष्णुता का काल रहा। औरंगज़ेब के कुछ कामों को छोड़ दिया जाये तो भारत का मध्यकाल उतना बर्बर नहीं रहा जितना शेष विश्व।
आंद्रे विंक जैसे पश्चिमी इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि “भारत में इस्लामी विजय अभियानों का उद्देश्य भारतीय सभ्यता का विनाश करना नहीं था, बल्कि उसे एक व्यापक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में सम्मिलित करना था।” ऐसे ही मिलते जुलते विचार महान फ़्रांसीसी इतिहासकार फर्नां ब्रॉडेल के थे। अपने ‘दीर्घकालिक संरचना (longue durée)’ सिद्धांत के आधार पर उन्होंने माना कि इतिहास को सदियों तक टिके रहने वाली गहरी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं के स्तर पर समझना चाहिए, न कि केवल युद्धों, राजाओं या घटनाओं के आधार पर। और भारत को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।लेकिन लोकतान्त्रिक भारत के वर्तमान ‘शासकों’ का क्या जिन्हें चुनावी जीत के लिए बार-बार मध्यकाल पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अपनी उपलब्धियों में बार-बार ज़ीरो हासिल करने वाली मोदी सरकार बचाव के लिए अल्पसंख्यकों को ‘टारगेट’ करती है और नेहरू पर आरोप मढ़ती है।
मोदी सरकार 500-1000 साल पीछे की बात ऐसे करती है मानो यह आज की ही घटना हो। लेकिन आज के भारत में, जिससे संविधान और कानून के आधार पर चलने की आशा की जाती है, जहाँ कहने को स्वतंत्र न्यायपालिका और एक संसद भी है, वहाँ पिछले 12 सालों से हर दिन हो रही अल्पसंख्यकों की लिंचिंग पर ‘मौन’ मारकर बगल से निकल जाती है।
मीडिया और न्यायपालिका की भूमिका
मीडिया और न्यायपालिका जिस तरह का व्यवहार कर रही है उससे यही लगता है कि कानून के शासन और संवैधानिक लोकतंत्र में किसी अल्पसंख्यक को ‘जय श्री राम’ ना कहने पर पीट-पीट कर मार डालना आम बात है, तथाकथित चोरी और बांग्लादेशी होने के आरोप पर पीट-पीटकर बेदम कर देना आम बात है, गो-तस्करी के झूठे आरोपों पर सरिया और हॉकी से पीट-पीटकर मार देना, गोमांस के शक पर घर से खींचकर मार डालना ये सब आम बात है। अदालतें जिन्हें संविधान की रक्षा करना था, लोगों के मूल अधिकारों की रक्षा करना था उन्होंने ऐसे मामलों में न सिर्फ़ स्वतः संज्ञान लेना बंद कर दिया है बल्कि ऐसे अपराधियों को जमानत भी बहुत आसानी से प्रदान कर दी जाती है।
अगर मध्यकालीन भारत देखना है तो आज देखिए। ऐसी निरंकुशता और बर्बरता अद्वितीय है। इस तरह के आधुनिक भारत की कल्पना तो की ही नहीं गई थी। सितंबर 2015 में, उत्तर प्रदेश के एक गाँव दादरी में अफ़वाहों के आधार पर भड़की हिंसा में मोहम्मद अख़लाक की जान चली गई। गाँव के एक स्थानीय मंदिर से घोषणा के बाद यह अफ़वाह फैलाई गयी कि अख़लाक़ के घर में फ्रिज के अंदर गाय का मांस रखा है। इसके बाद उग्र भीड़ ने अख़लाक और उनके बेटे को घर से बाहर खींच लिया। भीड़ के हमले में अख़लाक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उनका बेटा गंभीर चोटों के साथ मुश्किल से बच पाया। इस घटना को लेकर बीजेपी का क्या रूख था इसे भाजपा सांसद साक्षी महाराज की बातों से समझा जा सकता है। “अगर कोई हमारी मां को मारने की कोशिश करता है तो हम चुप नहीं रहेंगे। हम मारने और मरने के लिए तैयार हैं।(अक्टूबर 2015)”पहलू ख़ान लिंचिंग
2017 में हरियाणा के किसान पहलू ख़ान, जो राजस्थान से मवेशी खरीदकर लौट रहे थे, अफ़वाहों के आधार पर भड़की भीड़ की हिंसा का शिकार बने। गायों को कथित रूप से क़त्ल के लिए ले जाने की बात फैलते ही लगभग 200 लोगों की भीड़ ने उन्हें रोक लिया और हमला कर दिया। इस हमले में पहलू ख़ान की मौत हो गई।
2017 में ही, 16 वर्षीय जुनैद ख़ान अपने भाई के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। एक बुज़ुर्ग यात्री द्वारा सीट माँगे जाने पर उन्होंने तुरंत सीट दे दी। इसके बावजूद, बाद में लगभग 25 लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और “बीफ़ख़ोर” तथा “पाकिस्तानी” जैसे नारे लगाने लगी। इस दौरान जुनैद पर चाकू से हमला किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। 2019 में झारखंड में तबरेज़ अंसारी को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। उन्हें एक पेड़ से बाँधकर “जय श्री राम” का नारा लगाने के लिए मजबूर किया गया। तबरेज़ पर बाइक चोरी की अफ़वाह के आधार पर हमला किया गया था।
2023 में नई दिल्ली के सब्ज़ी विक्रेता मोहम्मद इशाक़ को ‘प्रसाद चोरी’ के आरोप में भीड़ ने एक खंभे से बाँधकर पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित एक प्रार्थना कार्यक्रम के दौरान हुई। ये तो सिर्फ़ मुट्ठीभर घटनाएँ हैं।
ऐसी अनगिनत घटनाएँ घटी हैं जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब, लाचार और परेशान लोगों को गाय व धर्म के नाम पर या अन्य धार्मिक आडंबरों की वजह से मार दिया गया और यह देश घटना दर घटना सबकुछ भूलता गया।
मई, 2015, राजस्थान में मीट की दुकान वाले एक 60 वर्षीय बुजुर्ग को लाठी और रॉड से पीट-पीटकर मार डाला गया; 9 अक्टूबर 2015 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में गाय काटने की अफ़वाह पर एक मुस्लिम व्यक्ति को बेरहमी से पीटा गया; 14 अक्टूबर 2015 को हिमाचल प्रदेश के सराहन में गाय तस्करी के आरोप में 20 साल के नोमान अख़्तर को पीट-पीटकर मार डाला गया और चार अन्य लोग घायल हुए; 2 अगस्त 2015 को उत्तर प्रदेश के दादरी के कैमराला गाँव में भैंस ले जाने के शक में 17 साल के अनस क़ुरैशी, 26 साल के आरिफ़ क़ुरैशी और 15 साल के नाज़िम को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला; 18 मार्च 2016 को झारखंड के लातेहार में 32 वर्षीय मज़लूम अंसारी और 12 वर्षीय इम्तियाज़ ख़ान को गोरक्षकों ने पेड़ से लटका कर मार डाला; 5 मार्च 2016 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में 4 बच्चों के पिता 26 वर्षीय मुस्तैन अब्बास की मौत गोरक्षकों द्वारा पीछा करने के दौरान हो गई थी।
दलितों पर भी हमले
गोरक्षकों के घटियापन से दलित भी नहीं बच सके। 11 जुलाई 2016 को गुजरात के ऊना में गाय की खाल उतारने के आरोप में चार दलित युवकों को सार्वजनिक रूप से बाँधकर बुरी तरह पीटा गया; 25 अगस्त 2016 को हरियाणा के मेवात में गोमांस की अफ़वाहों के बाद दो मुस्लिमों की हत्या हुई और एक महिला के साथ गैंगरेप किया, उसकी नाबालिग बच्ची का यौन उत्पीड़न किया और कहा कि “तुम गाय खाते हो, इसलिए तुम्हारी बेइज्ज़ती कर रहे हैं"; 22 जून 2017 को हरियाणा के बल्लभगढ़ में 16 साल का जुनैद ख़रीदारी करके ट्रेन से घर लौट रहा था तभी ट्रेन में कुछ लोगों ने ‘गोमांस खाने वाले’, ‘देशद्रोही’ कहते हुए उस पर चाकू से हमला कर दिया जिससे उसकी मौत हो गई; 29 जून 2017 को झारखंड के रामगढ़ में उनकी गाड़ी में गोमांस होने के आरोप में अलीमुद्दीन अंसारी को मार डाला गया, इसमें स्थानीय बीजेपी नेता समेत 12 लोगों पर FIR हुई, जल्दी ही आरोपियों को जमानत भी मिल गई। अभियुक्तों को आर्थिक मदद देने वालों में एक नाम बीजेपी सांसद जयंत सिन्हा का भी है।
राजस्थान से असम तक हिंसा
10 नवंबर 2017 को राजस्थान के अलवर में उमर ख़ान को पशु ले जाने के आरोप में तथाकथित गोरक्षकों द्वारा गोली मार दी गई; 6 दिसंबर 2017 को राजस्थान के राजसमंद में शंभूलाल रैगर नाम के इंसानी दरिंदे ने अफराजुल ख़ान की बेरहमी से हत्या कर दी, फिर शव को जला दिया। यह पूरी घटना कैमरे में क़ैद भी की गई; 2017 में असम के नगांव जिले में अबू हनीफा (16) और रियाजुद्दीन अली (18) नामक दो मुस्लिम किशोरों की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी, क्योंकि उन पर गाय चोरी का संदेह था; 18 जून 2018 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ में मोहम्मद क़ासिम को पीट-पीटकर मार डाला गया और क़ासिम को बचाने आए समयदीन को बुरी तरह पीटा गया। इस घटना का एक वीडियो सामने आया जिसमें तीन पुलिसकर्मी, भीड़ द्वारा कासिम के खून से लथपथ शव को सड़क पर घसीटते हुए देख रहे थे। पुलिस ने बाद में माफी मांगते हुए कहा कि एम्बुलेंस न होने के कारण उन्हें कासिम के शव को जमीन पर घसीटने देना पड़ा। मामला गोहत्या से जुड़ा था लेकिन यूपी पुलिस ने लीपापोती करते हुए कहा कि मोटरसाइकिल दुर्घटना को लेकर हुई हाथापाई में मौत हुई; 21 जुलाई 2018 को राजस्थान के अलवर में अकबर ख़ान की भीड़ द्वारा पिटाई के बाद मौत हो गई, पुलिस पर ‘मदद में देरी’ का आरोप लगा। घटना के 4 दिन पहले ही सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा ने मॉब लिंचिंग पर कानून बनाने का सुझाव दिया था; 3 दिसंबर 2018 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गाय के शव मिलने के बाद भड़की हिंसा में मुस्लिमों को निशाना बनाया गया और एक पुलिस अधिकारी सुबोध सिंह की मौत हो गई।18 जून 2019 को झारखंड के खरसावां में 26 वर्षीय तबरेज अंसारी को घंटों पीटा गया, धार्मिक नारे लगवाए गए और बाद में उनकी मौत हो गई; 26 जून 2019 को पश्चिम बंगाल में एक मुस्लिम शिक्षक को धार्मिक नारा लगाने से इनकार करने पर ट्रेन से धक्का दे दिया गया; अगस्त 2021 में मध्य प्रदेश के इंदौर में हरदोई, यूपी के रहने वाले चूड़ी विक्रेता तस्लीम पर हमला किया गया; अगस्त 2021 में उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक मुस्लिम रिक्शा चालक को घुमाकर पीटा गया और धार्मिक नारे लगवाए गए; 27 अप्रैल 2025 को कर्नाटक के मंगलुरु के कुडुपु में भात्रा कल्लुर्ती मंदिर के पास में क्रिकेट मैच के दौरान मोहम्मद अशरफ़ की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई, उस पर आरोप था कि उसने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए थे; 9 मई 2025 को झारखंड के बोकारो में अब्दुल कलाम को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। उस पर छेड़खानी के आरोप लगाए गए थे। पर यह तो सिर्फ़ आरोप थे। कुलदीप सेंगर और बाबा राम रहीम जैसे लोगों के बलात्कार के आरोप तो साबित भी हो चुके और उन्हें सजा भी हो चुकी है पर कलाम गरीब और लाचार था जिसपर झूठे आरोप लगाकर मार डाला गया; 12 मई 2025 को बिहार के सारण में मवेशियों की चोरी के ‘शक’ में ज़ाकिर क़ुरैशी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और अभी तीन दिन पहले 15 जनवरी 2026 को ओडिशा के बालासोर में शेख मकरंद मुहम्मद को बुरी तरह पीटा और जान से मार दिया गया। शेख मकरंद को जब ये इंसानी दरिंदे बेरहमी से मार रहे थे तब उससे कहा कि “बोल जय श्री राम, बोल गौ माता है, मम्मी है”।
तमाम घटनाएँ और भी हैं जिन्हें यहाँ लिखा नहीं जा सका है। यह लिखने और रिपोर्ट करने से अधिक सरकार द्वारा कार्यवाही किए जाने, न्यायपालिका द्वारा संज्ञान लिए जाने और नागरिकों के धर्म से परे जाकर जागने का मामला है। मुस्लिमों के ख़िलाफ़ इस हिंसा को जब एक लोकतांत्रिक देश के ढांचे में देखेंगे तो यह भयावह है। ज़रा सोचकर समझिये और बताइए कि दुनिया का कौन सा प्रगतिशील देश है जो आज अतीत के आधार पर अपने देश के ही लोगों के साथ बर्बर व्यवहार कर रहा है? कौन सा देश है जिसका नेता अतीत में ही डूबा हुआ है? लगभग 1000 साल पहले नॉर्डिक देशों में बर्बरता एक सामान्य बात रही लेकिन क्या आज भी वो उसे जी रहे हैं? क्या आज भी उसी अतीत के गाने गाये जा रहे हैं? सत्ता में बने रहने की लालसा और सत्ता जाने का भय और असुरक्षा, भारत में इस तरह के कामों को बढ़ावा दे रही है। केसरिया रंग के कपड़े पहनकर जिस तरह लोग पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे लिंचिंग को अंजाम दे रहे हैं, खुलेआम नरसंहार की धमकी दे रहे हैं, तलवारे बाँट रहे हैं उससे यह साफ़ है कि राम और कृष्ण के भारत में दानवों की संख्या बढ़ गई है जो मानवता के दुश्मन हैं और भारत सबसे पुरानी सभ्यता से अब सबसे असभ्य सभ्यता की ओर अग्रसर है। यह तकलीफ़देह है लेकिन सच यही है!