भारत में महिलाओं की आबादी लगभग 50% है। यदि मतदाता सूची की बात करें तो उसमें भी लगभग 50% महिलाएं हैं। यानी देश और प्रदेश हर स्तर पर नेतृत्व चुनने में महिलाएं 50% की भागीदार हैं। यह बात भी सबको पता है कि महिलाओं की समस्याओं का सबसे बड़ा हिस्सा उनके साथ होने वाला यौन उत्पीड़न, बलात्कार और संबंधित हिंसा से जुड़ा हुआ है। इसके बाद भी प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठने वाला व्यक्ति महिलाओं के यौन उत्पीड़न और बलात्कारों को लेकर न के बराबर बोलता और नीतियां बनाता नजर आया है। 

हर ऐतिहासिक कानून बदले जा रहे हैं, संसद के सैकड़ों घंटे अनावश्यक बहसों, कभी वन्दे मातरम तो कभी नेहरु, कभी गाँधी परिवार, कभी विशेष रूप से सोनिया गाँधी पर अपमानजनक टिप्पणी कर कर के वक़्त की बरबादी की जाती है और खुद का अपुष्ट गौरव शांत किया जाता है, हर राज्य में सत्ता आ जाये, तो मनमाने फैसले करने को मिलें इसलिए हर बार विधानसभा चुनावों के दौरान देश के प्रधानमंत्री ‘डबल इंजन’ नाम का जुमला जरूर फेंकते हैं लेकिन जब राज्य में इस तथाकथित डबल इंजन की सरकार बन जाती है तो वहां पर महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा बढ़ जाती है और इतने भयावह महिला अपराध के ख़िलाफ़ मौन धारण करने की आवृत्ति भी बढ़ जाती है। बिहार, ओडिशा और उत्तराखंड इसके जीते जागते उदहारण हैं और मैं इसे असाधारण श्रेणी की अनैतिकता मानती हूँ।

मुझे यह बिल्कुल नहीं समझ आता कि महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन अपराधों को लेकर सरकार और उसका मुखिया मुखर क्यों नहीं होता? आख़िर ऐसा क्या है कि हर बार जब किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो उस मामले को पुलिस दबाना और छिपाना चाहती है? आख़िर ऐसा क्यों होता है कि न्याय और जांच के लिए न ही राज्यों के बड़े अधिकारियों का समर्थन मिलता है और न ही सर्वोच्च नेतृत्व का? मैं तो यह सोचकर बहुत चुभन और भय महसूस करती हूँ कि यदि मीडिया, जैसा भी है, न होता तो पुलिस और सरकारें मिलकर महिलाओं के साथ कितना अधिक बर्बर व्यवहार करतीं?
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पटना के गर्ल्ड हॉस्टल में रेप

पटना के शम्भू गर्ल्स हॉस्टल में नीट की तैयारी कर रही छात्रा के बलात्कार और उसकी हत्या की ख़बर, अख़बारों और लोगों के लिए बस एक खबर भर है लेकिन यह जिस महत्वपूर्ण सवाल को खड़ा कर रही है वो ये है कि आख़िर स्त्रियों का जीवन भारत में इतना सस्ता और गरिमाविहीन क्यों हो गया है? क्यों किसी स्त्री के साथ छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे अपराधों को अंजाम देने से पहले अपराधी को भय नहीं लगता? उसे क्यों लगता है कि यह अपराध ज़्यादा तूल नहीं पकड़ेगा? वह आराम से अपराध करेगा और उसे कोई नुकसान नहीं होगा, न उसे सरकार की तरफ़ से कोई डर है न ही न्यायपालिका से?
 
मेरी नजर में इसका कारण शायद यह है कि सभी अपराधी इस बात को बहुत बेहतरी से जान गए हैं कि बलात्कार जैसे मामलों में मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री जैसे लोग कुछ नहीं बोलते, इन मामलों को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जाती। हाँ, बलात्कार के बाद यदि हत्या हो जाती है तो मामला थोड़ा बिगड़ जाता है लेकिन ये बड़े वाले नेता, जिन पर सरकार की जिम्मेदारी है वो फिर भी कुछ नहीं बोलते। उन्हें बिलकुल परवाह नहीं होती कि जिस देश या प्रदेश की गद्दी का आनंद वो ले रहे हैं, जो मन में आता है वो करते हैं पूरे देश की ताक़त को अपनी मुट्ठी में करके और चौड़े होकर चलते हैं, वह देश और उसका समाज किस दिशा में बढ़ रहा है, उन्हें परवाह नहीं कि ज्यादातर लोग महिलाओं का बलात्कार करने लगे हैं, वे महिलाओं की इज़्ज़त नहीं करते? शायद वर्तमान नेताओं को अपनी गद्दी बचाने भर के लिए राजनीति करनी है, समाज किस तरह सड़ता जा रहा है, इससे उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता।

जब बलात्कार जैसे मामलों पर बहस चलती है, जब जनता का एक वर्ग, छोटा ही सही, अगर उद्वेलित होता है, प्रदर्शन और कैंडल मार्च निकालने का काम करता है, तो उस समय प्रधानमंत्री बिल्कुल ही अलग और बकवास मुद्दे को लेकर टीवी में आ जाएँगे, जनता का ध्यान भटकाते हैं, बिल्कुल गैरज़रूरी मुद्दे को लेकर ट्वीट करेंगे, पूरा मीडिया उनके गैर ज़रूरी मुद्दे को बार बार टीवी पर दिखायेगा और जताएगा जैसे देश में कोई अपराध हुआ ही नहीं।

मणिपुर की वीभत्स घटना

सोचिये याद करिए और कल की भी घटना पर ध्यान ले जाइये कि मणिपुर में इतनी वीभत्स घटना घटी, हर दिन कइयों की मौत हो रही थी और अनगिनत महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न हो रहा था लेकिन केंद्र में जो सरकार बैठी है, उसके जो मुखिया हैं उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था, वो ऐसे व्यवहार कर रहे थे मानो मणिपुर में रामराज्य स्थापित हो रहा था। इतने बड़े और ऐतिहासिक देश का नेतृत्त्व ऐसा कैसे हो सकता है?

पटना में एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ और बाद में हत्या भी हो गयी, यह मुद्दा बहुत संवेदनशील है। एक भीड़ भरे लड़कियों के हॉस्टल में कोई कैसे घुस गया? उसने वहाँ पर कैसे बलात्कार कर दिया और हत्या करके फ़रार भी हो गया? एक आदमी था या कई लोग थे, यह भी तो नहीं पता। यह कैसी निकम्मी और उजड्ड सरकार है जो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चेतना शून्य बनी बैठी है। क्या डबल इंजन सरकार का मतलब बलात्कार है?

उत्तराखंड का अंकिता भंडारी केस

सितंबर 2022 में बलात्कार और फिर हत्या की शिकार हुई उत्तराखंड की अंकिता भंडारी के केस को लेकर फिर से खुलासे शुरू हो गए, बीजेपी के एक बड़े नेता का नाम साफ़-साफ़ सामने आने लगा लेकिन मजाल है कि पुरुषों से ठूँसी हुई पार्टी ने एक बार भी यह कहा हो कि जब तक निष्पक्ष जाँच नहीं हो जाती तब तक इस नेता को पार्टी के सभी पदों से बर्ख़ास्त किया जाता है। शायद इन्हें अंकिता भंडारी जैसे लड़कियों की चिंता नहीं है, इन्हें हर पल बस इस बात की ही चिंता है कि पार्टी सत्ता में रहे और ये लोग मनमाने तरीक़े से कुछ भी करते रहें।
विमर्श से और
देश और प्रदेश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों की सामूहिक चुप्पी यह सन्देश देती है कि या तो बलात्कार/सामूहिक बलात्कार या हत्या, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई है जिसे जेल में डालने, सज़ा देने से उनकी सत्ता को नुकसान पहुँचेगा, या फिर ये सभी नेता यह ज़रूरी ही नहीं समझते कि इस मुद्दे पर कुछ बोला जाये। कहने का मतलब ये है कि उनकी नज़र में एक स्त्री का बलात्कार या बलात्कार के साथ उसकी हत्या कोई बड़ा मुद्दा ही नहीं है। उन्हें स्त्रियों की चिंता नहीं है बल्कि उन्हें स्त्रियों से डर लग रहा है, वे कहते हैं कि “मुझे हर दिन भर-भर के गाली दी जाती हैं”, “मैं अकेला” और यह भी ब्रम्हास्त्र कि संसद में महिलाएं इन महाशय पर ‘हमला’ कर सकती थीं इसलिए सदन में नहीं पहुँचे। यह सोच की कंगाली और अंधी दूरदर्शिता की निशानी है।

भारत में भी 'एपस्टीन'?

आज पूरी दुनिया एपस्टीन फाइल्स पर चर्चा कर रही है। इन फाइल्स में एक ऐसे आदमी की ‘कहानियाँ’ हैं जो देश-विदेश के लोगों को मासूम और नाबालिग बच्चों को यौन तुष्टि के लिए परोसता था। ऐसे घिनौने आदमी के साथ नाम जुड़ना, उससे बात-चीत का संबंध रखना, डील करना, मानसिक बीमारी का प्रतीक है। ऐसे आदमी के साथ भारत के प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों का नाम जुड़ना, कारण चाहे जो भी रहा हो, पूरे देश को शर्मिंदा करने वाला है। भारत में भी ऐसे एपस्टीन हैं और उन्हें सत्ता का व्यापक समर्थन प्राप्त है। आसाराम और राम-रहीम जैसे लोग इसी भारत की धरती में पैदा हुए, यहीं पर इन्होंने तमाम महिलाओं के साथ आश्रम और आस्था की आड़ में बलात्कार किए, हत्याएं कीं और आरोपी साबित होकर जेल गए। लेकिन चूँकि ये वर्तमान सत्ता के करीब रहे, इनका कुछ संख्या में ‘मतदाताओं’ पर प्रभाव रहा है और शायद अब भी हो इसलिए इन्हें कानून की ही आड़ लेकर, कानून का दुरुपयोग करके बार बार जेल से छोड़ा जाता है। 2017 में सजा पा चुके राम-रहीम को तो अबतक 15 बार पैरोल के बहाने हरियाणा की बीजेपी सरकार छोड़ चुकी है। लेकिन हिम्मत है कि पीएम ने कभी भी एक शब्द इसके ख़िलाफ़ बोला हो, क्या उन्हें कभी भी इस फैसले से निराशा हुई? कारण बेहद साफ़ है, असल में इन्हें महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और प्रगति से कोई वास्ता नहीं है। इन्हें सिर्फ़ उन लोगों से वास्ता है जो इनकी सत्ता बनाये रखने में मदद कर सकते हों, फिर चाहे वो मदद अनैतिकता से भरी और पतोन्मुख ही क्यों न हो! चाहे वह एक गंदे समाज का निर्माण क्यों न करती हो।
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महिला सुरक्षा का हाल

मुझे इस बात का पूरा आभास हो चुका है कि वर्तमान में इस देश में महिलाओं की सुरक्षा कर सके, ऐसा कोई नेतृत्व उपलब्ध नहीं है। वर्तमान सरकार, केंद्र, राज्य, बिहार और उत्तराखंड, या ऐसी सभी डबल इंजन सरकारें इस काबिल ही नहीं हैं कि उनपर भरोसा किया जा सके। महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए राजनैतिक चेतना की सर्वाधिक आवश्यकता है। अगली बार ऐसे किसी भी नेता को नकार दें जिसके नेतृत्व में बलात्कार होते रहे हों और वो ‘मौन साधना’ में लगा हो। चाहे वो नेता आपके सामने ‘विकास पुरुष’ बनकर आया हो या फिर किसी ‘संत’ या ‘तपस्वी’ के रूप में। चाहे वो नेता देश का तथाकथित ‘डंका’ दुनिया भर में बजवा रहा हो या उसकी वजह से दुनिया भर के युद्ध ही क्यों न रोके जा रहे हों। चाहे वो धर्म गुरु बनकर आया हो, या धर्म को बचाने वाले अंतिम मसीहा के रूप में। चाहे वो दिन रात ‘मन की बात’ करता हो, या हर महीने ‘परीक्षा पे चर्चा’! यह सभी काम और विज्ञापन मक्कारी के लक्षण हैं, नेतृत्व के नहीं। 

सवाल ये है कि जिसे तुम नेता समझ रहे हो, जिसके हाथ में पूरी सत्ता है, पुलिस प्रशासन सब जिसके हाथ में है उसमें संवेदना की कमी क्यों है? आख़िर वो रात में सो कैसे पाता है और खाना कैसे खा पाता है, जब उसकी ‘डबल इंजन’ सरकार में एक मासूम का बलात्कार होता है और फिर उसे मार दिया जाता है?

वो अपनी उस पार्टी को उल्टा क्यों नहीं खड़ा कर देता जिसके एक बड़े नेता का नाम एक लड़की के सामूहिक बलात्कार और हत्या में आ जाता है? वो अपने लिए तो गाली पाने पर भी रोने लगता है लेकिन क्या कभी भी इन मासूम लड़कियों के बलात्कारों और हत्याओं पर उसे रोते देखा है आपने? मणिपुर में हुई भयावह और अमानवीय त्रासदी के लिए रोते देखा है आपने उसे? वो कठुआ पीड़िता के लिए कब रोया? वो अलीगढ़ और हाथरस की पीड़िताओं के लिए कब रोया? वो अंकिता भंडारी के लिए रोया? वो शाह बानो के लिए तो रुदाली बन जाता है, चीख़मचिल्ली मचा सकता है लेकिन जैसे ही उसके सामने बिलकिस बानो आएगी उसके आँखों से पानी ही गायब हो जाएगा। यह बदबूदार सोच है, यह भारत की आधी आबादी को लज्जित और शर्मिंदा करने वाली सोच है, ये भारत का सर, शर्म से झुका देने वाली सोच है। ऐसी सोच और उस सोच को लेकर सत्ता पर राज करने वाले लोगों को सत्ता के आसपास भी भटकने नहीं देना चाहिए।