संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2015 में तय किये गए सतत विकास लक्ष्यों के मुताबिक़, यदि कोई देश बेहतर मेडिकल शिक्षा और व्यवस्था की बात करता है तो उस देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात कम से कम 1:1000 होना चाहिए। मतलब प्रत्येक 1000 जनसंख्या पर कम से कम एक डॉक्टर तो होना ही चाहिए (SDG 3.c)। लेकिन भारत में यह अनुपात अभी तक संभव नहीं किया जा सका है। भारत में प्रत्येक 1000 जनसंख्या पर मात्र 0.7 डॉक्टर ही हैं, मतलब भारत में सतत विकास लक्ष्य से लगभग 30% कम, डॉक्टरों की संख्या है। अगर भारत में ग़रीबी, बेरोज़गारी और अस्पतालों तक पहुँच जैसे आयामों को भी जोड़ दिया जाये तो स्थिति भयावह हो जाती है। लेकिन यह भयावहता भी ठीक ही थी क्योंकि कम से कम भारत धीमे ही सही, बढ़ तो रहा था। लेकिन तब क्या होगा अगर यह देश मेडिकल शिक्षा के मामले में पीछे की ओर बढ़ने लगे और सत्ता उसे प्रोत्साहित करने लगे? मेरी नज़र में यह किसी आपदा से कम तो नहीं होगा।

जम्मू कश्मीर के रियासी जिले का मामला देखें तो यह आपदा लगभग शुरू हो चुकी है। रियासी जिले के कटरा में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एक्सीलेंस की मान्यता ख़त्म कर दी गई है। ताज्जुब की बात यह है कि मान्यता ख़त्म करने के लिए एक संगठन श्री वैष्णो देवी संघर्ष समिति ने अभियान चलाया, विरोध प्रदर्शन किया और जब इस मेडिकल कॉलेज की मान्यता ख़त्म हो गई तो ढोल बजाए गए, गाना-बजाना किया गया और मिठाइयाँ बाँटी गईं। इसमें महिला पुरुष सभी ने भाग लिया, वे ऐसे खुश हो रहे थे जैसे उन्होंने कोई बड़ी जीत हासिल की हो। अब यहाँ सवाल यह है कि ऐसा क्यों किया गया? और सरकार की नियामक संस्था नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने एक संगठन के ऐसे अभियान में सहयोग क्यों किया और उनके विरोध से इतना बड़ा फ़ैसला क्यों ले लिया?
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यही वो पॉइंट है, यही वो बात है जो भारत में बढ़ रही आपदा की ओर इशारा करता है।

मुस्लिम छात्रों के प्रवेश का विरोध!

यह मेडिकल कॉलेज श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी (SMVDU) का हिस्सा है, और इसी विश्वविद्यालय से संबद्ध है। SMVDU की स्थापना 1998 में जम्मू कश्मीर विधान सभा के एक क़ानून द्वारा की गई थी। इस यूनिवर्सिटी को सरकार और श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। 2025-26 सत्र के लिए मेडिकल कॉलेज ने 50 MBBS सीटों के लिए आवेदन किया जिसे सितंबर में NMC द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी गई। लेकिन जैसे ही यह पता चला कि 50 में से 42 सीटों में मुस्लिम छात्रों का एडमिशन हो गया है, कुछ लोगों के सीने पर सांप लोटने लगे। जबकि इन सभी छात्रों का एडमिशन सरकारी नियमों और NEET की परीक्षा के माध्यम से हुआ था। इसके बावजूद श्री वैष्णो देवी संघर्ष समिति नाम के संगठन ने हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाकर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। मेडिकल छात्रों और राज्य के हित कोने में रख दिए गए। अनुच्छेद-370 हटाकर राज्य को जो आश्वासन दिया गया था उसे भुला दिया गया और नियमों के आधार पर दी गई मान्यता को उन्हीं नियमों का हवाला देकर ही रद्द कर दिया गया।

देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब छात्रों के धर्म को आधार बनाकर कॉलेज बंद कर दिया गया। मुसलमानों को लेकर बढ़ रही असहिष्णुता इतना भयानक रूप ले चुकी है कि कुछ लोग उनकी सफ़लता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, वे असलियत का सामना ही नहीं करना चाहते। 

जिस तरह पाकिस्तान में हिंदुओं को लेकर असहिष्णुता का दृष्टिकोण विकसित हुआ, उसी तरह, वही हाल भारत का किया जा रहा है।

जैसे ही मेडिकल कॉलेज के बंद होने की ख़बर आयी, देश में भाईचारे, देश की एकता, अखंडता को तोड़ने और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने की मानसिकता वाली इस संघर्ष समिति के संयोजक ने प्रेस से बात करते हुए कहा, “हम अपने आंदोलन की जीत का जश्न मनाने आए हैं। हम विशेष रूप से केंद्रीय गृह मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने हमारी भावनाओं का सम्मान किया। हमारा मानना है कि क़ानूनी प्रक्रिया के कारण इस फ़ैसले में समय लगा। हम उन सभी प्रमुख व्यक्तियों के भी आभारी हैं जो हमारे विरोध प्रदर्शनों में हमारे साथ जुड़े।’

प्रधानमंत्री की चुप्पी

हिंदू-मुस्लिम का ऐसा बेतुका मुद्दा ऐसे राज्य में बनाया गया जो देश की सरहद में स्थित है और बहुत अधिक संवेदनशील है। लेकिन देश का प्रधानमंत्री, जिस आदमी पर देश की एकता और अखंडता की जिम्मेदारी है वो हमेशा की तरह चुप है। न सिर्फ़ चुप है बल्कि उसके द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल इस मामले में शामिल रहे और देश के गृहमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने भी इस शर्मनाक मामले में प्रदर्शनकारियों का सहयोग किया।
विमर्श से और
मेडिकल कॉलेज की फँडिंग कहाँ से?
संघर्ष समिति का कहना था कि हिंदुओं के दान-दक्षिणा से बने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से इस कॉलेज को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है इसलिए यहाँ मुस्लिम छात्रों का एडमिशन नहीं होना चाहिए। पहली बात तो यह तथ्य ही ग़लत है। क्योंकि SMVDU को वित्तीय सहायता सिर्फ़ श्राइन बोर्ड से नहीं मिलती, इसे वित्तीय सहायता केंद्र सरकार, जम्मू कश्मीर सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से भी मिलती है। दूसरी बात यह कि यह कोई तर्क नहीं है कि अगर वित्तीय सहायता सिर्फ़ श्राइन बोर्ड से मिलती है तो इससे संबद्ध किसी कॉलेज या संस्थान में अल्पसंख्यक समुदाय को शामिल नहीं किया जाएगा। क्या इसके लिए संसद ने कोई कानून बनाया है? या SMVDU को धार्मिक शिक्षा के लिए अधिकृत किया गया है जहाँ मुस्लिम नहीं जा सकते?
 
सभी को पता है; नहीं पता है तो पता होना चाहिए कि किये जा रहे इन सभी दावो में सच्चाई नहीं है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत इस तरह का देश न कभी रहा है और न ही आज इसे ऐसा होना चाहिए।
 
देश के प्रधानमन्त्री और गृहमंत्री ऐसे लोगों और ऐसी बातों को हवा दे रहे हैं जिससे यह साफ़ संकेत जा रहा है कि इस देश का बहुसंख्यक इस देश के अल्पसंख्यक के साथ जो चाहे, जैसा चाहे वैसा व्यवहार कर सकता है। क्या वर्तमान सरकार सिर्फ़ हिंदुओं की सरकार है? 

क्या देश के 20 करोड़ मुसलमानों को वर्तमान सत्ता यह बताना चाहती है कि जिस देश को कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने आज़ाद करवाया आज उन मुसलमानों को उसी देश से धीरे-धीरे बेदख़ली की जाएगी, जिसकी शुरुआत हो चुकी है?

साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने से देश होगा खोखला

पीएम मोदी को सोचना पड़ेगा कि ‘संघर्ष समिति’ जैसे असामाजिक तत्वों के अनावश्यक और बेतुके मुद्दों को हवा देने से देश कमजोर होता है, ‘लव जेहाद’, और ‘यूपीएससी जेहाद’ जैसे झूठे और गढ़े गए साम्प्रदायिक शब्दों को बढ़ावा देने से देश खोखला हो जाता है, सिर्फ़ चुनाव जीतने की हवस के लिए अल्पसंख्यकों को ‘दूसरे दर्जे’ का नागरिक साबित करने से देश जर्जर हो जायेगा और जब देश कमज़ोर और जर्ज़र होता है, तब डोनाल्ड ट्रम्प जैसे व्यापारी सोच के राष्ट्रपति, भारत को, भारत के प्रधानमंत्री को अपमानित करने का साहस जुटा पाते हैं। आज़ादी के बाद और आज से पहले, दुनिया के किसी भी देश के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो भारत के पीएम को अपमानित कर सके, तब भी नहीं कर पाया जब भारत आर्थिक रूप से बहुत कमजोर था, खाने पीने तक के लाले पड़े थे।

फिर ऐसा क्या हुआ कि ट्रम्प जैसा आदमी, जिसको उसके देश के लोग ही पूरे भरोसे के साथ नहीं देखते, उसकी इतनी हिम्मत हो गयी कि भारत की लगातार बारम्बार बेइज्जती कर सके? शायद चीन, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देश जान गए हैं कि आज भारत को अंदर से तोड़ा जा रहा है, भारत के अंदर ही भारत के लोगों को, भारत की नागरिकता साबित करने के लिए यहाँ वहाँ, इधर उधर दौड़ाया जा रहा है, उन्हें अपमानित किया जा रहा है। यहाँ के अल्पसंख्यकों को अनायास ही बांग्लादेशी बताया जा रहा है, उनके घरों से उन्हें बेदखल किया जा रहा है, इन सब कारणों से देश के भीतरी धागे, अर्थात भाईचारे, देश की एकता और अखंडता में कमजोरी आई है।
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मुझे लगता है कि पीएम मोदी को आरएसएस या कट्टर हिंदूवादी संगठनों के तौर तरीकों से सोचना बंद कर देना चाहिए। अब उन्हें कुछ दिनों के लिए सम्पूर्ण भारत का प्रधानमन्त्री बनकर सोचना चाहिए, जैसे उनके पहले के प्रधानमंत्रियों ने देश और उसके नागरिकों के बारे में सोचा और काम किया, जिससे पूरी दुनिया को ये संदेश जाये कि भारत एक है। यहाँ का हर समुदाय सुरक्षित है, यहाँ सभी जाति और धर्मों के लिए जगह है, और यही एकता इस देश की ताक़त है।

फासीवादी ताक़तों से देश को नुक़सान

धार्मिक पहचान और कट्टरता का उद्देश्य लेकर बन रही तथाकथित संघर्ष समितियां भारत का भविष्य और भारत का क़द दोनों ही ख़राब और छोटा कर रही हैं। अगर धर्म के आधार पर डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज आदि को समझा और पहचाना जाने लगा तो देश को टूटने में वक्त नहीं लगेगा। अखंड भारत सभी के लिए है और यही भारत का संविधान कहता है, लेकिन सत्ता में आने के लिए और लगातार बने रहने के लिए जिन फ़ासीवादी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है उससे देश को बहुत नुकसान होगा। धनाढ्य और समर्थ लोग तो कोई भी संसाधन जुटा लेंगे लेकिन देश का गरीब? उसका क्या होगा? वो तो इलाज कराने, शिक्षा लेने विदेश नहीं जा सकेगा। धर्म के आधार पर देश के संस्थानों को बाँटने से इस देश को ही नुकसान होगा। असलियत यह है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर टिके रहने के लिए, मजबूत ताक़त बनने के लिए भारत को टैलेंट चाहिए। इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं हो सकता, यह टैलेंट चाहे जिस धर्म, जाति या लिंग से आए उसे स्वीकारना ही होगा।